Hindi · Girlfriend
yesterday
मेरा दिल कांच की तरह टूट चुका था। जब मैंने छवि को वसीम के साथ उस अंधेरी गली में देखा, तो मुझे लगा जैसे दुनिया थम गई हो। चावी, जिससे मैंने बेइंतहा मोहब्बत की थी, वह अब एक दूसरे मर्द की बाहों में थी, और वह मर्द कोई और नहीं बल्कि वसीम था। उसकी आंखों में मेरे लिए अब कोई प्यार नहीं था, बस एक घृणा थी। मैं वहीं खड़ा रहा, अपनी आंखों से अपने प्यार को किसी और का होते हुए देख रहा था। वह मुस्लिम टाउन की गलियां अब मुझे काटने को दौड़ रही थीं।
मैंने खुद से वादा किया कि मैं इस दर्द का हिसाब लूंगा। लेकिन एक साधारण इंसान होकर मैं वसीम से क्या मुकाबला करता? मुझे कुछ ऐसा चाहिए था जो दुनिया ने कभी न देखा हो। तभी मुझे दिशा के बारे में पता चला। लोग कहते थे कि वह एक ऐसी जादूगरनी है जो नामुमकिन को मुमकिन कर सकती है, लेकिन उसकी कीमत बहुत भारी होती है।
मैं भटकते हुए शहर के सबसे पुराने और सुनसान हिस्से में पहुँचा, जहाँ दिशा का ठिकाना था। उसका घर पुराना था, जिसमें से अजीब सी खुशबू आ रही थी—जले हुए कपूर और सूखी जड़ी-बूटियों का मिश्रण। जब मैं अंदर गया, तो दिशा एक अंधेरे कमरे में बैठी थी, उसकी आंखें चमक रही थीं।
"तो तुम हो वो, जिसका दिल टूटा है," दिशा ने अपनी भारी आवाज़ में कहा।
मैंने अपनी कांपती हुई आवाज़ में जवाब दिया, "मुझे बदला लेना है। मुझे ऐसा बना दो कि वह शख्स खुद मेरे कदमों में गिर जाए जिसने मुझे धोखा दिया।"
दिशा धीरे से हंसी, उसकी हंसी में एक अजीब सी कशिश थी। "बदला? बदला लेने के कई तरीके होते हैं, अंकित। तुम क्या चाहते हो?"
"मैं चाहता हूँ कि मैं इतना खूबसूरत बन जाऊं कि वसीम अपनी सारी दुनिया भूल जाए। मैं चाहता हूँ कि वह मुझसे प्यार करे और फिर मैं उसे बर्बाद कर दूँ। मुझे एक औरत बना दो, दिशा। एक ऐसी औरत जिसे देखकर कोई भी मर्द अपना होश खो दे।"
दिशा ने अपनी कुर्सी से उठकर मेरे करीब आकर मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। "तुम जानते हो कि यह बदलाव स्थायी नहीं होगा, लेकिन यह तुम्हारी आत्मा को बदल देगा? एक मर्द से औरत बनना सिर्फ शरीर का खेल नहीं है, यह अहसासों का खेल है।"
मैंने चिल्लाकर कहा, "मुझे परवाह नहीं है! बस मुझे बदल दो।"
दिशा ने एक बड़ा सा पीतल का कटोरा निकाला और उसमें कुछ काला तरल पदार्थ डाला। उसने मुझे उसमें अपनी उंगली डुबोकर मेरे माथे पर एक निशान बनाया। अचानक, मुझे महसूस हुआ कि मेरा शरीर जल रहा है। मेरी हड्डियां चटकने लगीं, मेरी मांसपेशियों में खिंचाव आया। मैं फर्श पर गिर गया और दर्द से चीखने लगा।
"चीखो, क्योंकि यह दर्द ही तुम्हारी नई पहचान की नींव है," दिशा ने ठंडे स्वर में कहा।
मैंने महसूस किया कि मेरी छाती भारी हो रही थी। मेरी त्वचा, जो पहले खुरदरी थी, अब मक्खन की तरह मुलायम होने लगी। मेरे कूल्हे चौड़े हो रहे थे और मेरी कमर पतली। मेरे जननांग धीरे-धीरे सिकुड़ रहे थे और एक नई, नम गहराई में बदल रहे थे। मेरे बाल लंबे होकर मेरी पीठ तक गिरने लगे। जब दर्द थमा, तो मैं हांफ रहा था।
मैंने पास रखे एक बड़े आईने में खुद को देखा और मेरी सांसें रुक गईं। सामने एक ऐसी लड़की खड़ी थी जिसकी खूबसूरती शब्दों से परे थी। मेरी आंखें बड़ी और नशीली थीं, होंठ सुर्ख लाल और भरे हुए थे। मेरा शरीर एकदम सुडौल था, और मेरी छातियां उभार ले रही थीं।
"अब तुम तैयार हो," दिशा ने एक रेशमी लिबास मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा।
मैंने पहली बार अपनी उंगलियों से उस कपड़े को छुआ। वह साटन का एक गाउन था, और उसके नीचे एक नाजुक रेशमी ब्रा और पैंटी थी। जब मैंने अपनी पुरानी शर्ट और पैंट उतारी, तो मुझे अपनी नई त्वचा का एहसास हुआ। वह इतनी कोमल थी कि हवा का एक झोंका भी मुझे उत्तेजित कर रहा था।
मैंने धीरे से वह रेशमी पैंटी पहनी। जैसे ही वह मेरे नए अंगों पर फिसली, मुझे एक अजीब सा सिहरन महसूस हुआ। वह रेशम मेरी योनि के नाजुक हिस्सों से रगड़ खा रहा था, और मुझे अहसास हुआ कि अब मुझे वह सुख मिल सकता है जो मैं पहले कभी नहीं जान पाया था। फिर मैंने वह ब्रा पहनी, जिसमें मेरे नए उभार सिमट गए थे। जब मैंने अपनी उंगलियों से अपने निप्पल को छुआ, तो मेरे पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई।
"यह... यह अहसास कितना अद्भुत है," मैंने धीमी और सुरीली आवाज़ में कहा।
दिशा मुस्कुराई, "बदले की आग अक्सर वासना में बदल जाती है, अंकित। याद रखना तुम यहाँ क्यों आए थे।"
लेकिन मेरा मन अब बदल रहा था। मुझे अपनी इस नई देह से प्यार होने लगा था। वह साटन का गाउन जब मेरे शरीर पर फिसला, तो मुझे लगा जैसे मैं किसी सपने में हूँ। मैं अब अंकित नहीं था, मैं एक ऐसी स्त्री थी जो किसी भी मर्द को अपना गुलाम बना सकती थी।
मैं उसी रात मुस्लिम टाउन की उन गलियों में वापस गया, जहाँ वसीम रहता था। मैंने अपनी चाल में एक नशा भर लिया था। मेरा गाउन मेरी चाल के साथ लहरा रहा था, और मेरे पैरों की पायल की आवाज़ सन्नाटे को चीर रही थी। वसीम एक चाय की दुकान के बाहर खड़ा अपने दोस्तों से बात कर रहा था। जैसे ही मैं उसके सामने से गुजरी, उसकी बातें रुक गईं।
उसकी नजरें मेरे शरीर पर जम गईं। वह मुझे ऐसे देख रहा था जैसे उसने अपनी जिंदगी में इतनी खूबसूरत औरत कभी न देखी हो। मैंने रुककर उसकी ओर देखा और अपनी पलकें धीरे से झपकाईं।
"नमस्ते," मैंने अपनी मखमली आवाज़ में कहा।
वसीम हक्का-बक्का रह गया। वह हकलाते हुए बोला, "आ... आप कौन हैं? मैंने आपको यहाँ पहले कभी नहीं देखा।"
मैंने एक शरारती मुस्कान के साथ उसके करीब जाकर अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। "मैं बस यहाँ नई आई हूँ। मुझे रास्ता नहीं मिल रहा, क्या आप मेरी मदद करेंगे?"
वसीम की सांसें तेज हो गई थीं। वह मेरी खुशबू से मदहोश हो रहा था। "जी, बिल्कुल। मैं आपकी पूरी मदद करूँगा। मेरा घर यहीं पास में है, अगर आप चाहें तो हम वहाँ चलकर बात कर सकते हैं।"
मैं मन ही मन हंसी। शिकार जाल में फंस चुका था। मैं उसके साथ उसके घर चली गई। जैसे ही उसने दरवाजा बंद किया, उसने मुझे दीवार से सटा दिया। उसकी आंखों में भूख थी, वही भूख जो कभी चावी के लिए थी।
"तुम इतनी खूबसूरत हो कि मुझे यकीन नहीं हो रहा," वसीम ने मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए कहा।
मैंने उसके गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसके होंठों के करीब जाकर कहा, "क्या तुम मुझे सच में पसंद करते हो, या सिर्फ मेरे इस शरीर को?"
"मुझे सब कुछ पसंद है। तुम्हारा हर हिस्सा," उसने जवाब दिया और मुझे जुनून के साथ चूमने लगा।
उसका चूमना आक्रामक था। उसकी जीभ मेरी जीभ से टकरा रही थी, और हमारे बीच लार का आदान-प्रदान हो रहा था। मैं उसके होंठों को चूस रही थी, और महसूस कर रही थी कि कैसे मेरा शरीर उसकी छुअन पर प्रतिक्रिया दे रहा था। उसने मेरे साटन के गाउन को ऊपर खींचना शुरू किया।
जब उसने मेरी रेशमी ब्रा को देखा, तो उसकी आंखें फैल गईं। उसने धीरे से मेरी ब्रा के हुक खोले और मेरी स्तन बाहर आ गए। वह मेरे निप्पलों को अपनी जीभ से सहलाने लगा, जिससे मेरी कमर अपने आप धनुष की तरह तन गई।
"आह... वसीम..." मैं सिसकी लेने लगी।
उसने मेरी पैंटी को नीचे खींच दिया। मेरी नई, गीली योनि अब उसके सामने पूरी तरह खुली थी। उसने देखा कि मैं कितनी उत्तेजित थी, मेरा रस उसकी उंगलियों पर लग रहा था। उसने अपनी उंगली मेरी योनि के अंदर डाली, और मुझे एक ऐसा सुख मिला जिसने मेरे दिमाग को सुन्न कर दिया।
"तुम बहुत गीली हो," वसीम ने हाफते हुए कहा।
उसने अपनी पैंट उतारी और उसका सख्त लिंग मेरे सामने था। मैंने उसे देखा और महसूस किया कि मेरा बदला अब एक अलग दिशा ले रहा है। मैं उसे बर्बाद करना चाहता था, लेकिन साथ ही मैं इस मर्दनापन को अपने अंदर महसूस करना चाहता था।
उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरे पैरों को फैला दिया। जब उसने अपना लिंग मेरी योनि के द्वार पर रखा, तो मैं उत्तेजना से कांपने लगी। उसने एक ही झटके में खुद को मेरे अंदर धकेल दिया।
"ओह गॉड!" मैं जोर से चिल्लाई।
वह अहसास इतना तीव्र था कि मुझे लगा जैसे मैं फट जाऊँगी। मेरी योनि की दीवारें उसके मोटे लिंग को कसकर जकड़ रही थीं। वह तेजी से धक्का दे रहा था, और हर धक्के के साथ एक गीली, चपचपाहट वाली आवाज़ आ रही थी—श्लिक, श्लिक, श्लिक।
वसीम पागल हो चुका था। वह मेरी छाती को जोर-जोर से दबा रहा था और मेरे होंठों को चूस रहा था। मैं उसकी कमर को अपनी टांगों से जकड़े हुए थी। मुझे महसूस हो रहा था कि उसका लिंग मेरे गर्भाशय के मुंह यानी सर्विक्स से टकरा रहा था, जिससे मुझे गहरे स्तर पर आनंद मिल रहा था।
"तुम... तुम लाजवाब हो! चावी तुम्हारे सामने कुछ भी नहीं है!" वसीम चिल्लाया।
यह सुनकर मुझे एक अजीब सी जीत महसूस हुई। मैंने चावी से अपना बदला ले लिया था। वसीम अब पूरी तरह से मेरा गुलाम बन चुका था।
हम घंटों तक एक-दूसरे में खोए रहे। वह बार-बार मेरा पोजीशन बदल रहा था। जब उसने मुझे पीछे मोड़ा और मेरे कूल्हों को ऊपर उठाया, तो मेरी योनि का द्वार और भी खुल गया। उसने पीछे से जोर-जोर से प्रहार करना शुरू किया। उसके अंडकोष मेरी त्वचा पर जोर-जोर से टकरा रहे थे—थैप, थैप, थैप।
मेरा शरीर पसीने से तरबतर था। मेरी साँसें उखड़ रही थीं। जैसे-जैसे वह अपनी गति बढ़ा रहा था, मुझे लगा कि मैं चरम सुख के करीब हूँ।
"वसीम... मैं... मैं आने वाली हूँ!" मैं चीखी।
तभी वसीम ने भी एक जोर का धक्का दिया और वह मेरे अंदर ही चरम पर पहुँच गया। मैंने महसूस किया कि उसका गर्म वीर्य मेरी योनि की दीवारों पर फुहारों की तरह गिर रहा था। वह तरल पदार्थ अंदर तक भर गया और कुछ हिस्सा बाहर निकलकर मेरी जांघों पर बहने लगा।
जब वह मेरे ऊपर ढह गया, तो मैं बस लेटा रहा और छत को देखती रही। मेरा शरीर अब पूरी तरह से एक औरत की तरह महसूस कर रहा था। मुझे वह दर्द, वह खिंचाव और वह संतुष्टि पसंद आ रही थी।
अगले कुछ दिनों तक, मैंने वसीम को अपनी उंगलियों पर नचाया। वह मेरे लिए महंगे तोहफे लाता, मेरे लिए नए रेशमी कपड़े खरीदता। वह चावी को पूरी तरह भूल चुका था। लेकिन मेरी भूख अब और बढ़ गई थी। मुझे एहसास हुआ कि सिर्फ एक मर्द से मेरा मन नहीं भरेगा। मुझे अपनी इस नई देह की सीमाओं को परखना था।
मैं मुस्लिम टाउन की उन तंग गलियों में घूमने लगी जहाँ गरीबी और गंदगी का साम्राज्य था। एक दिन, मैंने एक बूढ़े भिखारी को देखा जो मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठा था। उसके कपड़े फटे हुए थे, शरीर से बदबू आ रही थी, लेकिन उसकी आंखों में एक कच्ची वासना थी।
मैं उसके सामने जाकर खड़ी हो गई। मेरा रेशमी गाउन हवा में उड़ रहा था, और मेरी खुशबू उस गंदी जगह पर भी फैल रही थी।
"बाबा, क्या आप मेरी मदद करेंगे?" मैंने अपनी आवाज़ को और भी अधिक कामुक बनाते हुए कहा।
भिखारी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी जीभ उसके सूखे होंठों पर फिरि। "बेटी, मैं तो एक कंगाल हूँ, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ?"
मैं उसके करीब झुकी, जिससे मेरा स्तन उसके चेहरे के सामने आ गया। "मुझे पैसों की ज़रूरत नहीं है। मुझे बस कुछ ऐसा चाहिए जो सिर्फ आप जैसे तजुर्बेकार लोग दे सकते हैं।"
उसकी आंखों में चमक आ गई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसका हाथ खुरदरा और गंदा था, लेकिन वह स्पर्श मुझे उत्तेजित कर रहा था। वह मुझे एक अंधेरी, बदबूदार गली में ले गया जहाँ कचरे के ढेर लगे थे।
उसने बिना किसी औपचारिकता के मेरा गाउन ऊपर उठाया। उसने मेरी पैंटी को एक तरफ खिसकाया और अपनी गंदी उंगलियों को मेरी योनि के अंदर डाल दिया।
"आह... तुम तो बहुत महंगी लगती हो, लेकिन अंदर से तुम बिल्कुल हम जैसे प्यासे हो," उसने गंदी आवाज़ में कहा।
मुझे उसकी यह बात पसंद आई। वसीम के साथ वह सब कुछ सलीके से था, लेकिन यहाँ एक कच्चापन था। उसने अपनी पैंट उतारी। उसका लिंग वसीम जितना बड़ा नहीं था, लेकिन वह सख्त था।
उसने मुझे दीवार से सटाया और बिना किसी लुब्रिकेंट के खुद को मेरे अंदर घुसा दिया। घर्षण इतना तेज था कि मुझे हल्का दर्द हुआ, लेकिन वह दर्द ही मेरे लिए आनंद बन गया।
"उह... हाँ... और जोर से!" मैं सिसकने लगी।
वह मुझे एक जानवर की तरह इस्तेमाल कर रहा था। वह मेरे शरीर को ऐसे झटक रहा था जैसे मैं कोई खिलौना हूँ। उसकी सांसों से सड़ी हुई गंध आ रही थी, लेकिन मुझे वह गंध अब उत्तेजित कर रही थी। मेरी योनि उसके लिंग को कसकर पकड़े हुए थी, और हम दोनों के शरीर आपस में टकरा रहे थे।
जब उसने चरम सीमा प्राप्त की, तो उसने मेरा गला जोर से दबाया और अपना सारा वीर्य मेरे अंदर छोड़ दिया। वह वीर्य गर्म और गाढ़ा था।
जब वह हटा, तो मैंने अपनी पैंटी वापस पहनी और अपनी साड़ी ठीक की। मैंने उसे कुछ पैसे दिए और मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गई।
मुझे अब समझ आया कि मैं वास्तव में क्या चाहती थी। मैं बदला लेना चाहता था, लेकिन इस प्रक्रिया में मैंने अपनी असलियत खोज ली थी। मुझे एक औरत होना पसंद था। मुझे पसंद था कि मर्द मुझे देखें, मुझे चाहें और मुझे अपनी वासना का केंद्र बनाएं।
मैं अब इस शहर की सबसे रहस्यमयी और खूबसूरत औरत बन चुकी थी। कोई नहीं जानता था कि इस मखमली शरीर के अंदर कभी अंकित नाम का एक टूटा हुआ मर्द रहता था। अब मैं सिर्फ एक ऐसी स्त्री थी जो हर उस मर्द को अपनी गिरफ्त में लेना चाहती थी जो उसके सामने झुकने को तैयार हो।
मेरा सफर तो अभी शुरू हुआ था। वसीम तो बस एक शुरुआत थी। अब मुझे इस शहर के हर स्तर के मर्दों को आज़माना था—चाहे वह कोई अमीर व्यापारी हो या गली का कोई आवारा। मैं अपनी इस नई देह के हर एक रोम को सुख की चरम सीमा तक ले जाना चाहती थी।
मैंने आईने में खुद को देखा और अपनी जांघों के बीच बहते हुए वीर्य को महसूस किया। मैं धीरे से मुस्कुराई।
"अब खेल असली शुरू होगा," मैंने खुद से कहा।
मुस्लिम टाउन की उन संकरी गलियों में दोपहर की धूप भी दम तोड़ देती थी। हवा में सड़े हुए मांस, पुराने गटर और तीखे मसालों की एक मिली-जुली गंध तैर रही थी। अंकित, जो अब एक ऐसी स्त्री बन चुकी थी जिसकी खूबसूरती किसी अभिशाप से कम नहीं थी, अपनी मखमली चाल से उन गलियों में दाखिल हुई। उसने एक पारभासी शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जिसके नीचे उसका गोरा बदन किसी तराशे हुए संगमरमर की तरह चमक रहा था। उसके पैरों की पायल की छन-छन सन्नाटे को चीर रही थी, और हर कदम के साथ उसका शरीर एक लय में डोल रहा था।
जैसे ही वह मुख्य बाज़ार में पहुँची, वहाँ मौजूद मर्दों की बातचीत अचानक थम गई। उनकी नज़रें अंकित के उभारों पर गड़ गईं। उन आँखों में कोई सम्मान नहीं था, बस एक कच्ची, आदिम भूख थी।
एक कसाई की दुकान के सामने वह रुकी। कसाई, जिसका नाम ज़फर था, अपने हाथ में एक बड़ा सा छुरा लिए खड़ा था। उसके एप्रन पर ताजे खून के धब्बे थे और उसकी दाढ़ी गंदी थी। उसने अपनी छोटी, लाल आँखों से अंकित को ऊपर से नीचे तक देखा।
"अरे ओ रंडी! इस इलाके में रास्ता भटक गई है या अपनी किस्मत आज़माने आई है?" ज़फर की आवाज़ किसी फटे हुए ढोल जैसी थी।
अंकित ने अपनी पलकें धीरे से झुकाईं और एक शरारती मुस्कान के साथ उसके करीब गई। उसने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसकाया, जिससे उसके स्तन का एक हिस्सा हल्का सा झलक गया।
"रास्ता तो मुझे पता है, ज़फर भाई। बस सुना था कि यहाँ का गोश्त बहुत ताज़ा होता है। सोचा देख लूँ," अंकित की आवाज़ में एक नशीलापन था।
ज़फर ने छुरा मेज पर पटका और उसकी आँखों में वासना की आग जल उठी।
"गोश्त तो ताज़ा है, लेकिन तू... तू तो किसी हिंदू मंदिर की पवित्र मूर्ति जैसी दिखती है। पर तेरी ये चाल बता रही है कि तू अंदर से कितनी प्यासी है। क्या चाहती है? कुछ पैसे या फिर कुछ और?"
अंकित ने अपना हाथ धीरे से ज़फर के खून से सने हाथ पर रखा। वह स्पर्श उसे उत्तेजित कर गया।
"मुझे पैसे नहीं चाहिए। मुझे वो चाहिए जो सिर्फ एक ताकतवर मर्द दे सकता है।"
ज़फर ने एक झटके से अंकित की कलाई पकड़ी और उसे दुकान के पीछे एक अंधेरे कमरे में खींच ले गया। वहाँ चारों तरफ अधकटे जानवरों के अवशेष पड़े थे और हवा में लोहे जैसी खून की गंध थी। उसने अंकित को एक गंदी लकड़ी की मेज पर पटक दिया।
"तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आकर हमें उकसाने की, ऐ हिंदू रखैल? तुझे पता है इस बस्ती में तुम्हारी क्या जगह है?" ज़फर ने उसकी साड़ी को बेरहमी से फाड़ना शुरू किया।
अंकित ने विरोध करने के बजाय अपनी कमर को धनुष की तरह मोड़ा और सिसकी ली। "मुझे मेरी जगह पता है, ज़फर। मैं बस तुम्हारी गुलाम बनना चाहती हूँ।"
ज़फर ने उसकी ब्रा के हुक एक झटके में खोल दिए। उसके भारी स्तन बाहर आ गए। उसने अपने खुरदरे, खून लगे हाथों से उन कोमल उभारों को जोर-जोर से दबाया। अंकित के मुँह से एक तीखी चीख निकली, जो दर्द और सुख का मिश्रण थी।
"आह... हाँ! और जोर से दबाओ!" अंकित चिल्लाई।
ज़फर ने उसके निप्पलों को अपने दाँतों से काटा और उसे अपनी ओर खींचते हुए उसकी पैंटी को फाड़ दिया। उसकी नम और उत्तेजित योनि अब पूरी तरह खुली थी। ज़फर ने अपनी पैंट उतारी और उसका मोटा, सख्त लिंग बाहर निकला।
"देख इस रंडी की हालत! कितनी गीली हो चुकी है। तू तो बस इसी के लिए पैदा हुई है कि हम जैसे मर्द तुझे भर दें," ज़फर ने गंदी हँसी हँसते हुए कहा।
बिना किसी लुब्रिकेंट के, उसने एक ही झटके में खुद को अंकित के अंदर धकेल दिया।
"ओह गॉड! आह... ज़फर!" अंकित की आँखें पलट गईं।
वह घर्षण इतना तीव्र था कि अंकित को लगा जैसे उसका शरीर दो हिस्सों में बंट रहा हो। लेकिन वह दर्द ही उसे चरम सुख दे रहा था। ज़फर एक जानवर की तरह उसे झटक रहा था। उसके शरीर से आने वाली पसीने और खून की गंध अंकित को और भी अधिक उत्तेजित कर रही थी।
"बोल! तू किसकी रखैल है?" ज़फर ने उसके गले को जोर से दबाते हुए पूछा।
"मैं... मैं आपकी... आपकी रंडी हूँ!" अंकित ने हाफते हुए जवाब दिया।
ज़फर ने अपनी गति बढ़ा दी। हर धक्के के साथ मेज चरमरा रही थी और एक गीली चपचपाहट की आवाज़ आ रही थी—श्लिक, श्लिक, श्लिक। अंत में, ज़फर ने एक जोर का प्रहार किया और अपना सारा गर्म वीर्य अंकित के गर्भाशय के मुँह पर छोड़ दिया।
जब वह हटा, तो अंकित बस वहीं पड़ी रही, उसकी जांघों से सफेद तरल पदार्थ बह रहा था। उसने एक गहरी साँस ली और मुस्कुराई। उसे इस अपमान में एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।
वह दुकान से बाहर निकली और अपने कपड़े ठीक किए। उसकी चाल में अब और भी अधिक नशा था। वह अब इस शहर की उन गहराइयों को तलाशना चाहती थी जहाँ नैतिकता का कोई नामोनिशान नहीं था।
थोड़ी दूर पर एक दर्जी की दुकान थी। दुकान का मालिक, रहमान, एक दुबला-पतला आदमी था जिसकी आँखें हमेशा शक से भरी रहती थीं। वह अपनी मशीन पर एक रेशमी कपड़ा सिल रहा था।
अंकित उसकी दुकान में दाखिल हुई।
"नमस्ते रहमान भाई। मुझे एक नया लिबास सिलवाना है। कुछ ऐसा, जो शरीर से बिल्कुल चिपका रहे," अंकित ने अपनी मखमली आवाज़ में कहा।
रहमान ने चश्मा नीचे खिसकाया और अंकित को देखा। उसकी नज़रें अंकित की पतली कमर और भारी कूल्हों पर ठहर गईं।
"लिबास तो सिल दूँगा, लेकिन नाप लेना पड़ेगा। क्या तुम तैयार हो?" रहमान की आवाज़ में एक दबी हुई उत्तेजना थी।
"बिल्कुल। आप जैसा कहें," अंकित ने अपनी साड़ी का पल्लू हटाकर अपने कंधे से गिरा दिया।
रहमान ने इंच टेप उठाया और अंकित के करीब आया। जब उसने उसकी छाती का नाप लेना शुरू किया, तो उसने जानबूझकर टेप को उसके निप्पलों के ऊपर से घुमाया।
"तुम्हारी देह... यह तो किसी करिश्मे जैसी है। इतनी गोरी त्वचा और इतने सुडौल अंग। तुम इस इलाके की नहीं लगतीं," रहमान ने फुसफुसाते हुए कहा।
अंकित ने रहमान के कान के पास जाकर धीरे से कहा, "मैं वहीं से हूँ, जहाँ मुझे आपकी ज़रूरत है।"
रहमान ने मशीन बंद की और अंकित को अपनी गोद में खींच लिया। उसने उसके कपड़ों के अंदर हाथ डाला और उसकी योनि की नमी को महसूस किया।
"तुम तो पहले से ही तैयार हो। क्या किसी और ने तुम्हें छुआ है आज?" रहमान ने शरारत से पूछा।
अंकित ने उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया, "हाँ, लेकिन मुझे अभी भी और चाहिए। मुझे महसूस करना है कि एक दर्जी की उंगलियां कितनी सलीके से काम करती हैं।"
रहमान ने उसे अपनी मेज पर लिटाया और उसके पैर फैला दिए। उसने अपनी पैंट उतारी और अपने लिंग को अंकित की योनि के द्वार पर रगड़ा।
"आज मैं तुम्हें ऐसा नाप दूँगा कि तुम कभी यह शरीर नहीं भूलोगी, ऐ हिंदू रखैल," रहमान ने कहा और खुद को अंदर धकेल दिया।
वसीम के साथ वह प्यार था, ज़फर के साथ वह दरिंदगी थी, लेकिन रहमान के साथ यह एक तरह की कलात्मक वासना थी। वह धीरे-धीरे और गहराई से प्रहार कर रहा था। अंकित ने अपनी टांगों से उसकी कमर को जकड़ लिया।
"आह... रहमान... और अंदर... और गहरा!" अंकित सिसकने लगी।
रहमान उसकी त्वचा को चूम रहा था और उसकी साँसें तेज हो रही थीं। जब वह चरम पर पहुँचा, तो उसने अंकित के पेट पर अपना वीर्य बिखेर दिया।
अंकित ने खुद को साफ़ किया और दुकान से बाहर निकली। अब वह पूरी तरह से इस नई पहचान में ढल चुकी थी। उसे अब अपनी पुरानी मर्दानगी याद नहीं आती थी। उसे पसंद था कि मर्द उसे एक वस्तु की तरह देखें और इस्तेमाल करें।
शाम होते-होते वह टाउन के सबसे खतरनाक इलाके में पहुँची, जहाँ गुंडों का राज था। वहाँ एक पुरानी हवेली थी जिसे 'अड्डा' कहा जाता था। वहाँ शहर के सबसे खूंखार अपराधी और बलात्कारक जमा होते थे।
जैसे ही अंकित ने उस हवेली के दरवाजे पर कदम रखा, चार-पाँच मर्दों ने उसे घेर लिया। उनके हाथों में शराब की बोतलें थीं और उनकी आँखों में खून सवार था।
"देखो भाइयों! आज हमारे पास क्या आया है। एक ताज़ा, गोरी और बेहद खूबसूरत हिंदू रंडी!" उनमें से एक, जिसका नाम साकिब था, जोर से चिल्लाया।
साकिब शहर का जाना-माना गुंडा था, जिसे महिलाओं के साथ बर्बरता करने में मज़ा आता था। उसने अंकित के बाल पकड़े और उसका सिर पीछे की ओर झुका दिया।
"क्या तुझे पता है कि यहाँ आने का मतलब क्या है? यहाँ से कोई औरत अपनी मर्ज़ी से नहीं जाती," साकिब ने उसके चेहरे पर थूकते हुए कहा।
अंकित ने डरने का नाटक किया, लेकिन उसकी आँखों में उत्तेजना साफ़ दिख रही थी। "मुझे पता है। शायद इसीलिए मैं यहाँ आई हूँ।"
साकिब हैरान रह गया। उसने अपनी हंसी दबाई और उसे अंदर एक बड़े कमरे में ले गया जहाँ बाकी गुंडे इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने उसे बीच कमरे में फेंक दिया।
"इसे अपनी रखैल बना लेंगे। पहले हम सब इसका स्वाद चखेंगे, फिर तय करेंगे कि इसे कहाँ रखना है," एक दूसरे गुंडे ने कहा।
उन्होंने एक-एक करके अंकित के कपड़े फाड़ दिए। वह अब पूरी तरह नग्न थी, कमरे की मद्धम रोशनी में उसका शरीर किसी देवी की तरह चमक रहा था।
"देखो इसके निप्पल्स कैसे खड़े हो रहे हैं। इसे डर नहीं, बल्कि मज़ा आ रहा है," साकिब ने उसके स्तन को जोर से मरोड़ते हुए कहा।
अंकित ने अपनी आँखें बंद कर लीं और चरम आनंद महसूस किया। "हाँ... मुझे बर्बाद कर दो! मुझे अपना गुलाम बना लो!"
साकिब ने उसे दीवार से सटाया और बिना किसी चेतावनी के पीछे से उसके अंदर घुस गया। अंकित की एक जोरदार चीख गूँजी, लेकिन वह चीख दर्द की नहीं, बल्कि तृप्ति की थी।
"ओह... हाँ! यही चाहिए था मुझे!" अंकित चिल्लाई।
जैसे ही साकिब हटा, दूसरे गुंडे ने उसकी जगह ले ली। एक के बाद एक, उन सभी ने अंकित के शरीर का इस्तेमाल किया। कोई उसके मुँह में अपना लिंग डाल रहा था, तो कोई उसकी योनि को फाड़ देने वाली गति से प्रहार कर रहा था।
कमरे में गालियों और सिसकियों का शोर था।
"ऐ रंडी! बोल, तुझे कैसा लग रहा है जब पांच मर्द तुझे एक साथ भर रहे हैं?" साकिब ने उसकी कमर को पकड़कर झटकते हुए पूछा।
"मुझे... मुझे बहुत अच्छा लग रहा है! मैं आप सबकी रखैल बनना चाहती हूँ!" अंकित ने हाफते हुए जवाब दिया।
उनका व्यवहार बर्बर था। उन्होंने उसे पटक दिया, उसे घसीटा और उसे एक खिलौने की तरह इस्तेमाल किया। लेकिन अंकित के लिए यह एक आध्यात्मिक अनुभव बन गया था। वह महसूस कर रही थी कि उसका पुराना अहंकार, उसका पुराना 'अंकित' रूप, पूरी तरह मर चुका है। अब वह सिर्फ एक शरीर थी, एक ऐसी योनि जो केवल भरने के लिए बनी थी।
जब वे सब थक गए, तो उन्होंने अंकित को वहीं फर्श पर छोड़ दिया। उसका शरीर पसीने, लार और वीर्य से तरबतर था। वह पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी।
तभी कमरे में एक आदमी दाखिल हुआ। वह इस इलाके का सबसे खूंखार अपराधी था, जिसे लोग 'शिकारी' कहते थे। वह अपनी क्रूरता और बलात्कार के किस्सों के लिए मशहूर था। उसकी आँखें ठंडी और निर्दयी थीं।
उसने अंकित को देखा और एक कुटिल मुस्कान दी।
"तो यह है वह रंडी जिसने मेरे लड़कों को पागल कर दिया," शिकारी की आवाज़ भारी और डरावनी थी।
वह अंकित के पास आया और अपने जूते से उसके चेहरे को हल्का सा दबाया।
"सुना है तुझे अपनी देह से बहुत प्यार है। लेकिन असली दर्द तो अभी शुरू हुआ है।"
उसने अंकित को अपने साथ एक अंधेरे तहखाने में ले गया। वहाँ सिर्फ एक लोहे की जंजीर और एक गंदा बिस्तर था। उसने अंकित के हाथों को जंजीरों से बाँध दिया।
"यहाँ कोई चीखने वाला नहीं है। यहाँ सिर्फ मैं हूँ और तू है," शिकारी ने फुसफुसाते हुए कहा।
उसने अंकित की योनि में अपनी उंगलियाँ डालीं और उन्हें इतनी जोर से घुमाया कि अंकित दर्द से तड़प उठी।
"आह... छोड़ दो मुझे... नहीं, मत छोड़ो!" अंकित की मानसिक स्थिति अब पूरी तरह बदल चुकी थी।
शिकारी ने अपना लिंग निकाला। वह असामान्य रूप से बड़ा और सख्त था। उसने अंकित की टांगों को पूरा फैलाया और एक ही प्रहार में खुद को उसके अंदर तक धकेल दिया।
"ओह गॉड! मैं... मैं फट रही हूँ!" अंकित चिल्लाई।
वह प्रहार इतना गहरा था कि उसे लगा जैसे उसका सर्विक्स टूट गया हो। लेकिन उस असहनीय दर्द के साथ एक ऐसा सुख आया जिसने उसके दिमाग की सारी नसें खोल दीं।
"तू अब मेरी गुलाम है। मैं तुझे तब तक नहीं छोड़ूँगा जब तक मैं तुझे अपने बच्चों से भर न दूँ," शिकारी ने उसके कान में कहा।
"हाँ... मुझे गर्भवती कर दो! मुझे अपना बच्चा चाहिए!" अंकित ने पागलपन में चिल्लाकर कहा।
शिकारी ने उसे पागलों की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया। वह उसे पलटता, उसे घुटनों के बल खड़ा करता और हर संभव तरीके से उसके शरीर में अपना वीर्य उतारता। घंटों तक यह सिलसिला चलता रहा। अंकित का शरीर अब पूरी तरह से समर्पित हो चुका था। उसे अब अपनी पहचान, अपने धर्म या अपने अतीत की कोई परवाह नहीं थी।
जब शिकारी ने अंततः अपना काम पूरा किया और उसे छोड़ दिया, तो अंकित फर्श पर गिर पड़ी। उसकी जांघों के बीच से वीर्य का एक झरना बह रहा था।
उसने छत की ओर देखा और धीरे से मुस्कुराई।
"अब मैं वास्तव में एक स्त्री हूँ," उसने खुद से कहा।
वह समझ गई थी कि बदला लेने की उसकी इच्छा अब एक नई भूख में बदल गई थी। वह अब वसीम से बदला नहीं लेना चाहती थी, बल्कि वह इस पूरी दुनिया के मर्दों के लिए एक नर्क और एक स्वर्ग बनना चाहती थी।
वह उस तहखाने से बाहर निकली, अपनी फटी हुई साड़ी को लपेटा और एक बार फिर उन गलियों में चल पड़ी। उसकी आँखों में अब एक नई चमक थी—एक ऐसी भूख जो कभी नहीं मिट सकती थी।
वह जानती थी कि अब वह इस शहर की सबसे बड़ी 'रंडी' बन चुकी थी, लेकिन यह उसके लिए हार नहीं, बल्कि सबसे बड़ी जीत थी। उसने अपनी देह को एक हथियार बना लिया था, और वह इस हथियार से हर उस मर्द को बर्बाद करना चाहती थी जो उसके पास आने की हिम्मत करता।
उसने आईने में अपना चेहरा देखा। उसके होंठ सूजे हुए थे, उसकी आँखों में वासना थी और उसके शरीर पर नीले निशान थे। वह अपनी इस नई सूरत से प्यार करने लगी थी।
"खेल तो अब शुरू हुआ है," उसने अपनी मखमली, लेकिन अब और भी अधिक कामुक आवाज़ में कहा।
वह फिर से मुस्लिम टाउन की उन अंधेरी गलियों में ओझल हो गई, इस उम्मीद में कि कोई और उसे ढूंढ ले, उसे पकड़ ले और उसे फिर से उसी दर्दनाक सुख की गहराई में ले जाए