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The proposal

The kitchen of their four-bedroom, multi-level bungalow in an expensive, gated neighborhood of Mumbai was stiflingly hot. The heavy monsoon air pressed against the large glass windows, trapping the heat from the six-burner gas stove inside. Arjun stood before the largest burner, stirring a thick, …

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Hindi · Family yesterday

नई शुरुआत — विद्या के रूप में

नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम सागर है और मैं मध्य प्रदेश का रहने वाला हूँ। मेरी उम्र 40 साल है। कहानी शुरू करने से पहले मैं आपको अपने बारे में थोड़ा बताना चाहता हूँ, क्योंकि आगे जो कुछ हुआ, उसे समझने के लिए मेरी जिंदगी का यह हिस्सा जानना जरूरी है। मेरी बॉडी हमेशा से थोड़ी अलग रही है। मैं काफी स्लिम हूँ, रंग बहुत गोरा है और सिर के अलावा मेरे शरीर पर लगभग कहीं भी बाल नहीं हैं। मेरी हाइट करीब 5 फीट 4 इंच है। मेरा चेहरा और शरीर की बनावट भी कुछ ऐसी है कि कई बार लोग मुझे पहली नजर में लड़की समझ लेते थे। मेरी छाती भी सामान्य पुरुषों जैसी नहीं थी। वह काफी उभरी हुई थी और देखने में ब्रेस्ट जैसी लगती थी। जवान होने के बाद से ही मुझे अपनी इस बनावट को लेकर काफी झिझक रहती थी। जब मैं करीब 20 साल का था, तब मुझे लड़कियों में दिलचस्पी थी। लेकिन मेरे अंदर एक और ऐसी पसंद थी, जिसके बारे में मैंने कभी किसी को नहीं बताया। मुझे क्रॉस-ड्रेसिंग बहुत पसंद थी। जब भी मैं घर में अकेला होता, मैं चुपके से बाथरूम में जाकर अपनी बहन की ब्रा और पैंटी पहन लिया करता था। उन कुछ पलों में मुझे अजीब-सी खुशी मिलती थी, लेकिन साथ ही मन में एक डर भी रहता था—अगर किसी ने मुझे देख लिया तो? सोचकर ही शर्म से चेहरा गर्म हो जाता था। इसी डर की वजह से मैंने यह बात हमेशा अपने तक ही रखी। फिर एक दिन ऐसा मौका आया, जिसने मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। मेरी पसंदीदा फिल्म रिलीज होने वाली थी। मैं उसे किसी भी हालत में मल्टीप्लेक्स में जाकर देखना चाहता था। मैंने अपने पैरेंट्स को काफी मनाया और आखिरकार उन्होंने मुझे जाने की इजाजत दे दी। मैंने सोचा, दोस्तों को भी साथ ले जाता हूँ। मैंने एक-एक करके कई दोस्तों को फोन किया, लेकिन किसी के पास समय नहीं था। सबने मना कर दिया। कुछ देर के लिए मेरा मूड खराब हुआ, लेकिन फिल्म इतनी खास थी कि मैंने आखिरकार अकेले जाने का फैसला कर लिया। अगली सुबह करीब आठ बजे मैं घर से निकल पड़ा। मॉल मेन सिटी में था और वहां पहुंचने में लगभग दो घंटे लगते थे। रास्ते भर मैं फिल्म को लेकर एक्साइटेड था। करीब दस बजे मैं मॉल पहुंचा, जल्दी से टिकट लिया और फिल्म देखने चला गया। फिल्म खत्म होते-होते दोपहर के करीब एक बज चुके थे। मैंने घड़ी देखी और सोचा, "अभी तो काफी समय है। घर मैंने रात नौ बजे तक पहुंचने को कहा है।" इसलिए मैं कुछ देर मॉल में ही घूमने लगा। तभी अचानक मुझे तेज पेशाब लगी। मैं जल्दी से चौथी मंजिल के बाथरूम की तरफ चला गया। वह हिस्सा फूड सेक्शन के पास था और उस समय वहां ज्यादा भीड़ भी नहीं थी। मैं अंदर गया। बाथरूम लगभग खाली था। लेकिन तभी मेरी नजर एक आदमी पर पड़ी। वह पहले से वहां मौजूद था। उसकी उम्र करीब तीस साल रही होगी। शरीर काफी हट्टा-कट्टा था और रंग बहुत गहरा था। वह चुपचाप अपने फोन में कुछ देख रहा था। शायद वह दरवाजा बंद करना भूल गया था। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला, उसने अचानक अपना फोन नीचे किया और सीधे मेरी तरफ देखने लगा। उसकी नजरें कुछ पल के लिए मुझ पर ही टिकी रहीं। मैं असहज हो गया। मैंने बिना कुछ कहे वहां से बाहर निकलने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही मैं मुड़ा... मुझे महसूस हुआ कि उसकी नजरें अब भी मेरे पीछे थीं। उस पल मेरे कदम अपने आप धीमे पड़ गए। आखिर वह मुझे इतनी देर तक क्यों देख रहा था? मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। वह अब भी मुझे ही देख रहा था। और तभी मुझे पहली बार एहसास हुआ कि शायद उस बाथरूम में मेरा जाना महज एक संयोग नहीं था... मैंने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा, वह आदमी अब अपनी सीट से उठ चुका था। मेरे दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई। मैंने खुद को समझाया, "शायद मैं बेवजह सोच रहा हूँ।" मैं तेजी से बाथरूम से बाहर निकलने लगा। लेकिन जैसे ही मैं दरवाजे तक पहुंचा, पीछे से उसकी आवाज आई— "सुनिए..." मैं रुक गया। कुछ सेकंड तक मेरे पैर वहीं जम गए। मन कह रहा था कि पीछे मत देखो, लेकिन न जाने क्यों मैंने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई। वह आदमी अब मुझसे कुछ दूरी पर खड़ा था। "जी?" मैंने घबराते हुए पूछा। उसने मेरी तरफ देखा और बोला, "आपको कहीं देखा हुआ लग रहा है।" मेरे चेहरे पर हैरानी आ गई। "मुझे नहीं लगता," मैंने तुरंत जवाब दिया। वह कुछ पल चुप रहा। फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला, "शायद मेरी गलती है।" मैंने राहत की सांस ली और वहां से बाहर निकल गया। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। जैसे ही मैं फूड कोर्ट की तरफ पहुंचा, मुझे पीछे किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी। मैंने पीछे देखा। वही आदमी। वह कुछ दूरी पर चल रहा था। मेरे मन में अजीब-सा डर पैदा होने लगा। मैंने अपनी चाल तेज कर दी। वह भी तेज चलने लगा। अब मुझे यकीन होने लगा था कि वह मेरा पीछा कर रहा है। मैंने तुरंत अपना फोन निकाला और पापा का नंबर देखने लगा। तभी अचानक सामने एक बड़ी भीड़ आ गई। कुछ लोग एक दुकान के बाहर खड़े थे। मैं उसी भीड़ में घुस गया। कुछ सेकंड बाद पीछे देखा तो वह आदमी दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने राहत की सांस ली। "शायद मैं गलत समझ रहा था," मैंने खुद से कहा। लेकिन तभी मेरे फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया। मैंने स्क्रीन देखी। सिर्फ एक लाइन लिखी थी— "आप मुझसे भाग क्यों रहे हैं?" मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने तुरंत पीछे मुड़कर पूरे फूड कोर्ट को देखा। वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। फिर दूसरा मैसेज आया— "डरिए मत। मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है।" अब मेरे दिमाग में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था— आखिर वह आदमी था कौन... और उसे मेरा नंबर कैसे मिला? मैंने तय किया कि अब बिना देर किए मॉल से बाहर निकल जाऊंगा। लेकिन जैसे ही मैं एग्जिट की तरफ बढ़ा, सामने वही आदमी खड़ा था। इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। उसने बस मेरी तरफ देखा और कहा— "सागर... हमें बात करनी होगी।" मैं उसके सामने खड़ा था और मेरे मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही थी। उसने एक बार फिर मेरा नाम लिया— "सागर... घबराइए मत।" मैंने तुरंत पूछा, "आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?" वह कुछ पल चुप रहा। फिर उसने अपनी जेब से फोन निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया। स्क्रीन पर एक पुरानी तस्वीर खुली हुई थी। तस्वीर देखते ही मेरे होश उड़ गए। वह तस्वीर मेरी थी। लेकिन वह कोई हाल की तस्वीर नहीं थी। मैं करीब बीस साल का था। मैंने कांपती आवाज में पूछा, "ये तस्वीर आपके पास कहां से आई?" उसने मेरी तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा— "क्योंकि मैं उस समय से आपको जानता हूँ।" मेरे दिमाग में जैसे कुछ टूट-सा गया। "लेकिन मैंने आपको पहले कभी नहीं देखा।" वह हल्का-सा मुस्कुराया। "आपने नहीं देखा होगा। मैंने आपको देखा था।" मैंने एक कदम पीछे हटते हुए पूछा, "कहां?" उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। वह मेरी तरफ देखता रहा, जैसे वह तय कर रहा हो कि मुझे कितना सच बताया जाए। फिर उसने कहा— "करीब बीस साल पहले... आपके घर के पास एक शादी हुई थी। याद है?" मेरी सांस रुक गई। मुझे वह शादी याद थी। बहुत धुंधली-सी, लेकिन याद थी। उस दिन मैं पहली बार ऐसी चीजें पहनने की कोशिश कर रहा था जिन्हें लेकर मुझे हमेशा डर लगता था। मैं किसी के सामने नहीं आना चाहता था। मैंने धीरे से पूछा— "आप उस शादी में थे?" उसने सिर हिलाया। "हां।" मेरे भीतर डर और जिज्ञासा दोनों बढ़ते जा रहे थे। मैंने कहा, "लेकिन तब तो हम कभी मिले ही नहीं।" वह बोला— "मुलाकात नहीं हुई थी। लेकिन मैंने आपको उस दिन देखा था। और उसके बाद आपकी जिंदगी के बारे में कुछ ऐसी बातें पता चलीं, जिन्हें शायद आप खुद भी भूल चुके हैं।" मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। "आप कहना क्या चाहते हैं?" उसने आसपास देखा। फूड कोर्ट में अब भी लोग थे, लेकिन हमारे आसपास का शोर मुझे अचानक बहुत दूर का लगने लगा था। वह थोड़ा करीब आया और धीमी आवाज में बोला— "यहां नहीं।" "तो कहां?" उसने मॉल की ऊपरी मंजिल की तरफ इशारा किया। "वहां एक जगह है जहां हम आराम से बात कर सकते हैं।" मैंने तुरंत सिर हिला दिया। "नहीं। मैं आपके साथ कहीं नहीं जा रहा।" वह कुछ पल मुझे देखता रहा। फिर उसने अपने फोन में एक और तस्वीर खोली। "अगर आप मेरे साथ नहीं आए, तो शायद यह तस्वीर किसी और के फोन में चली जाएगी।" मेरे पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई। मैंने फोन की स्क्रीन को घूरकर देखा। तस्वीर ऐसी थी जिसे देखकर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। मैंने फुसफुसाकर पूछा— "आपके पास ये कैसे आई?" उसने जवाब दिया— "यही बताने के लिए मैं यहां आया हूं।" कुछ सेकंड तक हमारे बीच खामोशी रही। फिर उसने कहा— "आपके पास दो रास्ते हैं। या तो अभी यहां से चले जाइए और जिंदगी भर डरते रहिए कि यह तस्वीर किसके पास पहुंचेगी... या मेरी बात सुन लीजिए।" मैंने उसकी आंखों में देखा। पहली बार मुझे लगा कि शायद यह आदमी मुझे डराने नहीं आया था। शायद वह किसी ऐसे राज का दरवाजा खोलने आया था, जिसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था। मैंने धीमे से पूछा— "आपको मुझसे आखिर चाहिए क्या?" उसने फोन जेब में रखा और कहा— "मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए।" फिर वह कुछ क्षण रुका। "मैं सिर्फ चाहता हूं कि आपको सच पता चले।" "कौन-सा सच?" उसने मेरी तरफ देखा। उसके अगले शब्दों ने मेरे होश उड़ा दिए— "जिस राज को आप बीस साल से अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा डर समझते रहे हैं... वह राज सिर्फ आपका नहीं है।" मैं कुछ बोल नहीं पाया। वह मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ चलने लगा। कुछ कदम आगे जाकर उसने पीछे देखा। "अगर सच जानना है तो मेरे पीछे आइए।" मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे सामने दो रास्ते थे। एक रास्ता बाहर जाने का था। दूसरा उस अजनबी आदमी के पीछे जाने का। और मुझे नहीं पता था कि इन दोनों में से कौन-सा रास्ता मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाला था। राकेश ने मॉल की पार्किंग में खड़ी अपनी कार की तरफ इशारा किया। "मेरे साथ चलो। यहां बात करना ठीक नहीं रहेगा।" इस बार न जाने क्यों मुझे उस पर भरोसा हो गया। मैं बिना ज्यादा झिझक के कार में जाकर बैठ गया। कुछ पल बाद राकेश भी ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। कार स्टार्ट हुई और हम मॉल की पार्किंग से बाहर निकल गए। कार के अंदर एक अजीब-सी खामोशी थी। मैंने उसकी तरफ देखा। मेरे मन में अभी भी सैकड़ों सवाल घूम रहे थे। तभी अचानक मैंने उसकी तरफ झुककर उसके गाल पर एक बार फिर किस कर दिया। राकेश कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया। उसने मेरी तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। फिर उसने धीरे से अपना परिचय दिया। "मेरा नाम राकेश है।" मैंने पूछा, "और आपके परिवार में कौन-कौन है?" उसके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई। उसने कुछ सेकंड तक सामने सड़क को देखा और फिर धीमी आवाज में कहा— "अब कोई नहीं।" मैं चुप रहा। उसने आगे कहा— "मेरी शादी हुई थी। मेरी पत्नी थी... लेकिन अब वह इस दुनिया में नहीं है।" उसकी आवाज में ऐसा दर्द था कि मैंने आगे कोई सवाल नहीं किया। कार कुछ देर तक खामोशी से चलती रही। फिर मैंने धीरे से पूछा— "क्या हुआ था उन्हें?" राकेश ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने कार की स्पीड कम की और खिड़की से बाहर देखने लगा। "ये कहानी इतनी आसान नहीं है, सागर।" मैंने उसकी तरफ देखा। "तो फिर मुझे पूरी कहानी बताइए।" उसने मेरी ओर देखा। उसकी आंखों में पहली बार मुझे डर दिखाई दिया। "अगर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूं," उसने कहा, "तो शायद तुम मुझ पर भरोसा करना बंद कर दोगे।" मैंने पूछा— "और अगर नहीं बताया तो?" वह हल्का-सा मुस्कुराया। "तब तुम जिंदगी भर सोचते रहोगे कि उस दिन मॉल में तुमसे मिलने वाला आदमी आखिर कौन था।" कार आगे बढ़ती रही। लेकिन अब मुझे महसूस हो रहा था कि मैं सिर्फ राकेश के साथ कार में नहीं बैठा था। मैं धीरे-धीरे उसकी जिंदगी के एक ऐसे रहस्य में प्रवेश कर चुका था, जिसका संबंध मेरी अपनी जिंदगी से भी था। और शायद उसकी पत्नी की मौत... उस रहस्य की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थी। राकेश ने धीरे से मेरा घूंघट उठाया। कुछ क्षणों तक वह मुझे देखता ही रहा। उसकी आंखों में हैरानी, खुशी और शायद बीते हुए समय की कोई पुरानी याद एक साथ दिखाई दे रही थी। मैं दुल्हन के रूप में उसके सामने बैठा था। कुछ घंटे पहले तक मैं सागर था—एक ऐसा इंसान जो अपनी पहचान और अपनी इच्छाओं को लेकर हमेशा डरता रहा था। लेकिन आज मेरे सामने जिंदगी का एक बिल्कुल नया अध्याय खुल चुका था। राकेश ने धीमे स्वर में कहा— "आज तुम्हें देखकर मुझे विद्या की याद आ रही है।" मैंने उसकी आंखों में देखा। "मैं विद्या नहीं हूं, राकेश। मैं सागर हूं। लेकिन अगर तुमने मुझे स्वीकार किया है, तो मैं तुम्हारे साथ पूरी ईमानदारी से यह जिंदगी जीना चाहता हूं।" राकेश कुछ पल चुप रहा। फिर उसने मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया। "मुझे तुम्हारे अतीत से कोई परेशानी नहीं है। मैं सिर्फ चाहता हूं कि तुम मेरे साथ खुश रहो।" मेरी आंखें नम हो गईं। इतने वर्षों तक जिस पहचान को लेकर मैं लोगों से छिपता रहा था, आज पहली बार मुझे लगा कि शायद कोई मुझे उसी रूप में स्वीकार कर रहा था, जैसा मैं खुद को महसूस करता था। मैंने धीरे से कहा— "आज से मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगा।" राकेश मुस्कुराया। लेकिन तभी बाहर से किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आई। हम दोनों एकदम चौंक गए। राकेश ने तुरंत दरवाजे की तरफ देखा। "तुम यहीं रहो," उसने कहा। वह कमरे से बाहर निकल गया। कुछ सेकंड बाद घर में फिर से सन्नाटा छा गया। मैं बिस्तर पर बैठा रहा। तभी मेरी नजर कमरे की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी। मैं उठकर उसके पास गया। तस्वीर में राकेश अपनी पत्नी विद्या के साथ खड़ा था। लेकिन तस्वीर को ध्यान से देखते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। तस्वीर के पीछे एक और तस्वीर लगी थी। उसमें एक बहुत पुराना घर दिखाई दे रहा था। मैं उस घर को पहचानता था। वह मेरा अपना पुश्तैनी घर था। मेरे हाथ कांपने लगे। तभी पीछे से राकेश की आवाज आई— "तुमने वह तस्वीर देख ली?" मैंने धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़कर पूछा— "राकेश... विद्या का मेरे परिवार से क्या संबंध था?" राकेश के चेहरे का रंग उड़ चुका था। उसने दरवाजा बंद किया और धीमी आवाज में कहा— "अब वक्त आ गया है कि मैं तुम्हें पूरी सच्चाई बता दूं।" कमरे में अचानक ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे पूरा घर किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा हो। और फिर राकेश ने जो बताया... उससे मेरी पूरी जिंदगी की कहानी बदलने वाली थी। राकेश कुछ देर तक चुप खड़ा रहा। फिर उसने गहरी सांस ली और मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गया। "विद्या की मौत कोई साधारण हादसा नहीं था, सागर।" मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। "तो फिर क्या हुआ था?" राकेश ने अपनी नजरें नीचे कर लीं। "करीब छह साल पहले की बात है। उस रात विद्या मेरे साथ इसी घर में थी। हम दोनों के बीच किसी बात को लेकर बहस हुई थी। वह गुस्से में घर से निकल गई।" "फिर?" "करीब आधे घंटे बाद मुझे पुलिस का फोन आया। उसकी कार का एक्सीडेंट हो गया था। अस्पताल पहुंचने से पहले ही..." वह आगे नहीं बोल पाया। कमरे में खामोशी फैल गई। मैंने धीरे से पूछा, "लेकिन इसका मेरे परिवार से क्या संबंध है?" राकेश ने मेरी तरफ देखा। "यही सबसे बड़ा सवाल है।" उसने अलमारी खोली और उसमें से एक पुरानी फाइल निकालकर मेज पर रख दी। फाइल के अंदर कुछ पुराने कागज, तस्वीरें और एक डायरी थी। उसने डायरी मेरी तरफ बढ़ाई। "यह विद्या की डायरी है। उसकी मौत के बाद मुझे यह उसके सामान में मिली थी।" मैंने कांपते हाथों से डायरी खोली। पहले कुछ पन्नों पर सामान्य बातें थीं। लेकिन एक जगह आकर मेरी नजर एक नाम पर टिक गई— सागर। मैंने घबराकर राकेश की तरफ देखा। "ये... मेरा नाम है।" राकेश ने सिर हिलाया। "हां।" मैंने अगला पन्ना पढ़ा। विद्या ने लिखा था कि करीब बीस साल पहले उसने एक ऐसे लड़के को देखा था जो अपने परिवार और समाज के डर की वजह से अपनी असली पसंद और पहचान छिपाकर जी रहा था। वह लड़का मैं था। लेकिन मुझे विद्या के बारे में कुछ भी याद नहीं था। राकेश ने बताया— "विद्या उस समय तुम्हें सिर्फ दूर से जानती थी। उसने कभी तुमसे सीधे बात नहीं की। लेकिन उसने तुम्हारी जिंदगी से जुड़ी कुछ बातें अपनी डायरी में लिखी थीं।" मैंने पूछा— "लेकिन उसने मेरे बारे में इतना सब क्यों लिखा?" राकेश ने डायरी का आखिरी हिस्सा खोला। वहां एक तारीख लिखी थी। वही तारीख, जिस दिन विद्या की मौत हुई थी। उसके नीचे सिर्फ एक वाक्य था— 'अगर मुझे कुछ हो जाए, तो सागर को सच जरूर बताना।' मेरी सांस अटक गई। "कौन-सा सच?" राकेश ने मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में आंसू थे। "मुझे नहीं पता था कि वह किस सच की बात कर रही है। मैंने कई सालों तक उसकी डायरी पढ़ी, लेकिन जवाब नहीं मिला।" "फिर आज मुझे यहां क्यों लाए?" राकेश कुछ पल चुप रहा। "क्योंकि आज सुबह मुझे एक लिफाफा मिला।" उसने जेब से एक छोटा-सा लिफाफा निकाला। उस पर मेरा नाम लिखा था। सागर। मैंने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। अंदर सिर्फ एक तस्वीर थी। तस्वीर देखते ही मेरा चेहरा सफेद पड़ गया। उसमें मैं करीब बीस साल की उम्र में खड़ा था। लेकिन मेरे साथ जो व्यक्ति खड़ा था... उसे देखते ही मेरे मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला— "विद्या..." राकेश ने धीरे से कहा— "अब समझे? विद्या तुम्हें सिर्फ जानती नहीं थी। वह तुम्हें बीस साल से ढूंढ रही थी।" मैंने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया। मेरे दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था— आखिर विद्या मुझे क्यों ढूंढ रही थी? और उससे भी बड़ा सवाल— क्या उसकी मौत वास्तव में एक दुर्घटना थी? राकेश ने मेरी तरफ देखा और कुछ देर तक कुछ नहीं बोला। मैंने बेचैनी से पूछा— "आखिर विद्या मुझे क्यों ढूंढ रही थी?" राकेश ने मेज पर रखी डायरी मेरी तरफ बढ़ा दी। "इसका जवाब तुम्हें खुद पढ़ना होगा।" मैंने डायरी का वह पन्ना खोला, जिस पर विद्या की लिखावट थी। उसमें लिखा था— "सागर, अगर कभी तुम तक यह डायरी पहुंचे, तो समझना कि मैंने तुम्हें ढूंढना इसलिए शुरू किया था क्योंकि तुम्हारे अतीत से जुड़ा एक सच मुझे पता चला था।" मेरे हाथ कांपने लगे। मैं अगली पंक्ति पढ़ने लगा। "बीस साल पहले मैं तुम्हारे परिवार के बेहद करीब थी। उस समय मैंने तुम्हें देखा था और समझ गई थी कि तुम अपने भीतर की एक ऐसी पहचान छिपा रहे हो, जिसे दुनिया शायद स्वीकार न करे। लेकिन मुझे तुम्हारे बारे में इससे भी बड़ा सच पता चला था।" मैंने घबराकर राकेश की तरफ देखा। "कौन-सा सच?" राकेश ने सिर हिलाया। "आगे पढ़ो।" डायरी में लिखा था— "तुम्हारे परिवार में उस समय एक बड़ा विवाद हुआ था। तुम्हारे जन्म और तुम्हारी पहचान से जुड़ी कुछ बातें तुमसे छिपाई गई थीं। मुझे लगा था कि जब तुम बड़े हो जाओगे, तब तुम्हें सच जानने का अधिकार होगा।" मेरी सांसें तेज हो गईं। "मेरे जन्म से जुड़ी बातें?" राकेश ने धीरे से कहा— "हां।" मैंने अगला पन्ना पलटा। लेकिन वह पन्ना फटा हुआ था। सिर्फ नीचे कुछ शब्द बचे थे— "...अगर सागर को सच पता चल गया, तो कई लोगों के चेहरे बेनकाब हो जाएंगे।" मेरे हाथ से डायरी लगभग छूट गई। मैंने राकेश से पूछा— "क्या विद्या को इसी वजह से मारा गया?" राकेश ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी खामोशी ही मेरे लिए सबसे डरावना जवाब थी। फिर उसने अपनी जेब से एक पुराना मोबाइल निकाला। "विद्या ने मरने से कुछ घंटे पहले मुझे एक वीडियो भेजा था। मैंने उसे कभी नहीं देखा था।" उसने वीडियो चलाया। स्क्रीन पर विद्या दिखाई दी। वह घबराई हुई थी। उसने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा— "राकेश, अगर तुम यह वीडियो देख रहे हो, तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं हूं। सागर को ढूंढना। उसे उस आदमी से बचाना।" वीडियो अचानक बंद हो गया। मैंने स्तब्ध होकर पूछा— "कौन-सा आदमी?" राकेश ने मेरी तरफ देखा। "यही तो मैं पिछले छह साल से पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं।" कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। तभी बाहर मुख्य दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई। हम दोनों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। राकेश धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ा। दस्तक दोबारा हुई। इस बार पहले से ज्यादा तेज। राकेश ने दरवाजा खोला। बाहर कोई नहीं था। सिर्फ जमीन पर एक छोटा-सा लिफाफा पड़ा था। राकेश ने उसे उठाया। उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी— "तुम दोनों ने जितना जानना चाहिए था, उससे ज्यादा जान लिया है।" मैंने वह संदेश पढ़ा तो मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। क्योंकि लिफाफे के अंदर एक और चीज थी— मेरे घर की चाबी। अब मुझे समझ आ गया था। यह रहस्य सिर्फ विद्या की मौत का नहीं था। कोई ऐसा व्यक्ति था जो बीस साल से मेरे अतीत पर नजर रखे हुए था। और शायद... वह व्यक्ति अभी भी हमारे बहुत करीब था। राकेश ने मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब तक का सबसे गहरा तनाव था। मैंने पूछा, "तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो, राकेश?" उसने कुछ पल आंखें बंद रखीं, फिर धीरे से बोला— "हां। एक बात है जो मैंने तुम्हें अभी तक नहीं बताई।" मैं चुपचाप उसकी तरफ देखता रहा। राकेश ने कहा— "तुमने मुझसे पूछा था कि विद्या कौन थी और वह तुम्हें क्यों ढूंढ रही थी। लेकिन सच यह है कि तुम्हारी मुलाकात मुझसे होने से बहुत पहले ही विद्या की कहानी तुम्हारी जिंदगी से जुड़ चुकी थी।" मैंने हैरानी से पूछा— "कैसे?" राकेश ने डायरी मेरी तरफ बढ़ा दी। "इसमें विद्या ने तुम्हारे बारे में बहुत कुछ लिखा है।" मैंने डायरी खोली। एक पन्ने पर लिखा था— "जिस दिन सागर को अपनी असली कहानी पता चलेगी, उस दिन उसे समझ आएगा कि मैं उससे इतनी सालों तक क्यों जुड़ी रही।" मैंने राकेश की ओर देखा। "लेकिन मैं तो विद्या को जानता तक नहीं था।" राकेश ने धीरे से कहा— "तुम उसे नहीं जानते थे। लेकिन वह तुम्हें जानती थी।" मैंने पूछा— "क्या वह मेरे परिवार के किसी सदस्य को जानती थी?" राकेश ने सिर हिलाया। "हां। और यही वजह है कि उसकी मौत के पीछे का सच इतना खतरनाक है।" मैंने बेचैनी से डायरी का अगला पन्ना पलटा। वहां सिर्फ एक वाक्य लिखा था— "मैंने सागर को कभी धोखा नहीं दिया। मैंने सिर्फ उसे उस दिन से बचाने की कोशिश की, जिस दिन उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने आने वाला था।" मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। "राकेश, आखिर वह सच क्या था?" राकेश ने मेरी आंखों में देखा। फिर उसने धीमी आवाज में कहा— "सागर... जिस विद्या को तुम मेरी दिवंगत पत्नी समझ रहे हो, उसकी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।" मेरे हाथ से डायरी छूट गई। "क्या मतलब?" राकेश ने कमरे की खिड़की बंद की और फुसफुसाकर कहा— "क्योंकि विद्या की मौत के बारे में जो कुछ मुझे बताया गया था... वह पूरा सच नहीं था।" उस पल मुझे पहली बार लगा कि शायद छह साल पहले हुई मौत के पीछे कोई ऐसा रहस्य छिपा है, जिसने हम तीनों की जिंदगी को एक-दूसरे से जोड़ रखा है। और अब... उस रहस्य का अगला दरवाजा मेरे सामने खुलने वाला था। राकेश ने कमरे की बत्ती धीमी कर दी। उसने डायरी बंद की और मेरी तरफ देखा। "सागर, जो मैं अब तुम्हें बताने जा रहा हूं, उसके बाद शायद तुम्हारी जिंदगी पहले जैसी नहीं रहेगी।" मैंने घबराकर पूछा— "क्या हुआ था विद्या के साथ?" राकेश ने धीमी आवाज में कहा— "विद्या की कार का एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन वह हादसा नहीं था।" मेरी आंखें फैल गईं। "क्या मतलब?" "उसकी कार के ब्रेक के साथ छेड़छाड़ की गई थी। पुलिस को उस समय कोई ठोस सबूत नहीं मिला। मामला बंद हो गया। लेकिन विद्या ने मरने से कुछ दिन पहले मुझे बताया था कि उसे किसी से खतरा है।" "किससे?" राकेश ने मेरी तरफ देखा। "वह नाम उसने कभी मुझे नहीं बताया। लेकिन उसने एक बात जरूर कही थी—'जिस व्यक्ति से मैं डर रही हूं, उसका संबंध सागर के परिवार से है।'" मैं कुछ बोल नहीं पाया। राकेश ने मेज की दराज से एक पुराना लिफाफा निकाला। "यह मुझे विद्या की मौत के छह महीने बाद मिला था।" लिफाफे में एक पुरानी फोटो और एक कागज था। फोटो देखकर मैं सन्न रह गया। उसमें मेरा परिवार था। लेकिन तस्वीर में एक ऐसा व्यक्ति भी खड़ा था, जिसे मैंने अपने परिवार की किसी पुरानी तस्वीर में कभी नहीं देखा था। मैंने पूछा— "यह आदमी कौन है?" राकेश ने कहा— "यही वह आदमी है जिसे विद्या ढूंढ रही थी।" "नाम?" राकेश ने जवाब देने से पहले कमरे का दरवाजा देखा। फिर उसने कहा— "विक्रम।" मैंने नाम सुनते ही सिर हिलाया। "मैं किसी विक्रम को नहीं जानता।" "तुम नहीं जानते," राकेश बोला, "लेकिन तुम्हारे परिवार के लोग जानते थे।" मैंने कागज उठाया। उस पर विद्या की लिखावट में सिर्फ तीन शब्द थे— "विक्रम को रोको।" नीचे एक तारीख लिखी थी। वही तारीख... जिस दिन विद्या की मौत हुई थी। मैंने कांपती आवाज में पूछा— "क्या विक्रम ने विद्या को मारा?" राकेश ने कहा— "मुझे नहीं पता।" फिर वह अचानक खिड़की के पास गया। बाहर अंधेरा था। उसने पर्दा थोड़ा हटाया और बाहर देखा। कुछ सेकंड बाद उसका चेहरा बदल गया। "सागर..." "क्या हुआ?" उसने धीरे से कहा— "वह यहां है।" मैं खिड़की की तरफ दौड़ा। सड़क के दूसरी तरफ एक काली कार खड़ी थी। उसकी हेडलाइट बंद थी। लेकिन ड्राइविंग सीट पर कोई बैठा हुआ था। और उस व्यक्ति की नजरें सीधे हमारे घर की तरफ थीं। राकेश ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "अब हमें पता चल गया है कि विद्या तुम्हें क्यों ढूंढ रही थी।" मैंने पूछा— "क्यों?" राकेश ने मेरी तरफ देखा। "क्योंकि वह जानती थी कि विक्रम अगला निशाना तुम्हें बनाएगा।" राकेश ने मेरी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज में कहा— "क्योंकि विक्रम को तुमसे नहीं... तुम्हारे अतीत से डर लगता है।" मैं कुछ समझ नहीं पाया। "मेरे अतीत में ऐसा क्या है?" राकेश ने टेबल पर रखी पुरानी तस्वीर मेरी तरफ बढ़ा दी। "यह तस्वीर बीस साल पुरानी है। तुम्हें याद है, उस समय तुम्हारे परिवार में एक बड़ा झगड़ा हुआ था?" मैंने सिर हिलाया। "मुझे बहुत कुछ याद नहीं है।" "विद्या को याद था।" राकेश ने डायरी खोली और एक पन्ने पर उंगली रखी। "विद्या ने पता लगा लिया था कि तुम्हारे परिवार की एक पुरानी संपत्ति और उससे जुड़े दस्तावेजों में विक्रम का नाम छिपा हुआ था।" मैंने पूछा— "लेकिन उसका मुझसे क्या संबंध?" राकेश ने जवाब दिया— "तुम उस राज के सबसे महत्वपूर्ण गवाह हो। भले ही तुम्हें खुद उसकी याद नहीं है।" मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। "मैंने क्या देखा था?" राकेश कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने कहा— "बीस साल पहले एक रात तुमने कुछ ऐसा देखा था, जिसे विक्रम किसी भी कीमत पर दुनिया के सामने नहीं आने देना चाहता। विद्या ने उसी रात से तुम्हारी सुरक्षा पर नजर रखनी शुरू कर दी थी।" मैंने डायरी के पन्ने पलटे। आखिरी पन्ने पर एक वाक्य लिखा था— "सागर को उसकी याददाश्त वापस दिलानी होगी, वरना विक्रम जीत जाएगा।" मेरे हाथ कांपने लगे। "मुझे कुछ याद क्यों नहीं है?" राकेश ने मेरी तरफ देखा। "क्योंकि उस रात तुम्हारे साथ कुछ ऐसा हुआ था, जिसके बाद तुम्हारे दिमाग ने उस घटना को भूल जाना ही बेहतर समझा।" तभी बाहर खड़ी काली कार की हेडलाइट अचानक जल उठी। हम दोनों खिड़की की तरफ देखने लगे। कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी और अंधेरे में गायब हो गई। राकेश ने मेरी तरफ देखा। "अब हमें तुम्हारी याददाश्त वापस लानी होगी।" मैंने पूछा— "कैसे?" उसने डायरी बंद की। "उस जगह जाकर, जहां यह सब शुरू हुआ था।" "कहां?" राकेश ने जवाब दिया— "तुम्हारे पुराने घर में।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। क्योंकि मुझे अचानक एहसास हुआ— बीस साल पहले का वह रहस्य शायद मेरे सामने नहीं, बल्कि मेरे अपने घर की दीवारों के भीतर छिपा हुआ था। राकेश की बात सुनकर मैं कुछ देर तक बिल्कुल चुप रहा। "मेरे पुराने घर में?" राकेश ने सिर हिलाया। "हां। विद्या ने अपनी डायरी में उस घर का जिक्र कई बार किया था। उसका मानना था कि वहां कुछ ऐसा छिपा है, जिसे तुम्हारे परिवार ने बीस साल से किसी से छिपाकर रखा है।" अगली सुबह हम दोनों मेरे पुराने घर के लिए निकल पड़े। करीब दो घंटे बाद हमारी कार उस पुराने मोहल्ले में पहुंची। घर को देखते ही मेरे भीतर अजीब-सी बेचैनी पैदा हो गई। बाहर से सब कुछ वैसा ही था। वही पुराना दरवाजा। वही बरामदा। वही खिड़की... लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे घर मुझे पहचान रहा हो। हम अंदर दाखिल हुए। धूल की मोटी परत हर चीज पर जमी थी। राकेश ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई और हम एक-एक कमरे को देखने लगे। अचानक मैं एक कमरे के सामने रुक गया। "यह कमरा..." राकेश ने पूछा, "क्या हुआ?" मैंने अपना माथा पकड़ लिया। मेरे दिमाग में अचानक एक धुंधली तस्वीर उभरी। मैं बीस साल का था। रात का समय था। मैं इसी कमरे में खड़ा था। और मेरे सामने एक आदमी चिल्ला रहा था। मैंने आंखें बंद कर लीं। "मुझे... कुछ याद आ रहा है।" राकेश तुरंत मेरे पास आया। "क्या?" मैंने कांपती आवाज में कहा— "एक आवाज... वह आदमी कह रहा था—'अगर यह बात बाहर गई तो सब खत्म हो जाएगा।'" राकेश का चेहरा गंभीर हो गया। "क्या तुम उसका चेहरा देख सकते हो?" मैंने कोशिश की। लेकिन चेहरा धुंधला था। फिर अचानक मेरी नजर कमरे की पुरानी अलमारी पर पड़ी। "वहां!" हम दोनों अलमारी के पास पहुंचे। अलमारी के पीछे दीवार में एक छोटा-सा लकड़ी का पैनल था। राकेश ने उसे दबाया। पैनल खुल गया। अंदर एक छोटा लोहे का डिब्बा रखा था। मेरे हाथ कांपने लगे। "यह यहां क्यों छिपाया गया था?" राकेश ने डिब्बा बाहर निकाला। उसमें कुछ पुराने कागज, एक पेन ड्राइव और एक फोटो थी। फोटो देखते ही मैं सन्न रह गया। उसमें मैं था। मेरी उम्र करीब बीस साल थी। और मेरे बगल में... विद्या खड़ी थी। मैंने राकेश की तरफ देखा। "लेकिन तुमने कहा था कि विद्या मुझे सिर्फ दूर से जानती थी।" राकेश ने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने फोटो पलटी। पीछे विद्या की लिखावट में सिर्फ एक वाक्य था— "सागर को सच बताने का सही समय आने तक यह सुरक्षित रखना।" कमरे में अचानक बाहर से किसी के कदमों की आवाज आई। हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। कदमों की आवाज धीरे-धीरे हमारे कमरे के करीब आ रही थी। राकेश ने फुसफुसाकर कहा— "कोई हमारे साथ घर के अंदर आया है।" और तभी दरवाजे के बाहर किसी ने बहुत धीमी आवाज में मेरा नाम पुकारा— "सागर..." मैंने आवाज पहचानी। वह वही आवाज थी... जो मेरी धुंधली याद में बीस साल पहले सुनाई दी थी। दरवाजे के बाहर से फिर आवाज आई— "सागर... मुझे पता है तुम अंदर हो।" मेरी धड़कन तेज हो गई। राकेश ने मेरी तरफ देखा और होंठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया। लेकिन तभी मेरे दिमाग में एक तरकीब आई। मैंने अपनी आवाज बदलकर बिल्कुल औरत की आवाज में जवाब दिया— "सागर यहां नहीं है। आप कौन हैं?" बाहर अचानक सन्नाटा छा गया। शायद मेरी आवाज सुनकर वह आदमी पूरी तरह भ्रमित हो गया था। कुछ सेकंड बाद उसने पूछा— "कौन... कौन बोल रहा है?" मैंने उसी आवाज में कहा— "मैं विद्या हूं।" राकेश ने मेरी तरफ हैरानी से देखा। बाहर खड़ा आदमी भी जैसे कुछ समझ नहीं पा रहा था। "विद्या?" उसकी आवाज में अचानक घबराहट आ गई। "लेकिन... तुम तो..." वह आगे कुछ बोलते-बोलते रुक गया। मैंने तुरंत पूछा— "मैं तो क्या?" कोई जवाब नहीं आया। अब मुझे यकीन हो गया था कि वह आदमी विद्या को जानता था। मैंने फिर पूछा— "तुम्हें किसने भेजा है?" बाहर कुछ सेकंड तक खामोशी रही। फिर उसने बहुत धीमी आवाज में कहा— "अगर तुम सच में विद्या हो... तो तुम्हें वह बात पता होगी जो सिर्फ हम दोनों जानते हैं।" मेरे दिमाग में खतरे की घंटी बज उठी। मैंने बिना घबराए जवाब दिया— "पहले तुम अपना नाम बताओ।" दरवाजे के बाहर खड़ा आदमी चुप रहा। फिर अचानक उसके कदम पीछे हटने लगे। राकेश ने फुसफुसाकर कहा— "वह जा रहा है!" मैंने तुरंत दरवाजा खोला। लेकिन बाहर कोई नहीं था। सिर्फ फर्श पर एक छोटा-सा कागज पड़ा था। मैंने उसे उठाया। उस पर लिखा था— "विद्या मर चुकी है। अगर तुम सच में विद्या हो, तो कल रात पुराने मंदिर में आना। अकेली।" मैंने कागज राकेश को दिखाया। उसने उसे पढ़ते ही गंभीर आवाज में कहा— "यह जाल है।" मैंने पूछा— "लेकिन उसे कैसे पता कि विद्या मर चुकी है?" राकेश कुछ नहीं बोला। उसकी खामोशी ने मेरे मन में एक नया सवाल पैदा कर दिया। अगर सामने वाला विद्या की मौत के बारे में इतना कुछ जानता था... तो वह आखिर था कौन? और सबसे बड़ा सवाल— क्या वह बीस साल पुरानी उस घटना का वही आदमी था, जिसकी आवाज मुझे अभी-अभी अपनी यादों में सुनाई दी थी उस कागज को हाथ में लेते ही मेरे भीतर कुछ जैसे टूट गया। अचानक मेरे दिमाग में तेज दर्द उठा। मैंने अपना सिर पकड़ लिया। और फिर... बीस साल पुरानी सारी यादें एक-एक करके मेरे सामने साफ होने लगीं। वह घर। वह कमरा। वह रात। और... विद्या। मुझे सब कुछ याद आ गया था। विद्या मेरे लिए कोई अनजान औरत नहीं थी। बीस साल पहले मैं उससे मिल चुका था। वह मेरे परिवार के एक करीबी परिचित की बेटी थी और उसने मुझे उस समय समझने की कोशिश की थी, जब मैं अपनी पहचान और अपनी पसंद को लेकर खुद से ही लड़ रहा था। उसे मेरे बारे में बहुत कुछ पता था, लेकिन उसने कभी मेरा मजाक नहीं उड़ाया। उसने हमेशा कहा था— "सागर, तुम्हें जिस तरह खुद को महसूस होता है, उसके लिए तुम्हें शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।" मुझे अब यह भी याद आ गया कि उसने मुझे एक रात कुछ ऐसा देखने से बचाया था, जिसे मेरे परिवार के कुछ लोग छिपाना चाहते थे। वह पुराना विवाद... वह रहस्यमय आदमी... और वह गुप्त दस्तावेज। सब मेरी आंखों के सामने साफ हो गया। मैंने राकेश की तरफ देखा। "मुझे सब याद आ गया है।" राकेश स्तब्ध रह गया। "क्या?" मैंने धीमे स्वर में कहा— "विद्या मुझे पहले से जानती थी। उसने मेरी मदद की थी। और उसे पता था कि मेरे परिवार के पुराने राज का संबंध विक्रम से है।" राकेश की आंखों में आंसू आ गए। "तो विद्या सच कह रही थी..." मैंने सिर हिलाया। "हां। और अब मुझे यह भी याद है कि उसकी मौत से कुछ दिन पहले उसने मुझसे संपर्क करने की कोशिश की थी।" राकेश ने तुरंत पूछा— "फिर तुमने उससे बात क्यों नहीं की?" मैं कुछ पल चुप रहा। "क्योंकि मुझे उसका संदेश मिला ही नहीं था। किसी ने उसे मुझ तक पहुंचने से पहले रोक दिया था।" कमरे में सन्नाटा छा गया। तभी मुझे डिब्बे में रखी पेन ड्राइव याद आई। मैंने उसे उठाया। "शायद इसका जवाब इसमें है।" राकेश ने लैपटॉप निकाला और पेन ड्राइव लगाई। स्क्रीन पर सिर्फ एक वीडियो फाइल दिखाई दी। नाम था— VIDYA_FINAL हम दोनों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। राकेश ने वीडियो चलाया। स्क्रीन पर विद्या दिखाई दी। उसका चेहरा गंभीर था। उसने कैमरे की तरफ देखकर कहा— "अगर यह वीडियो सागर तक पहुंच गया है, तो इसका मतलब है कि मेरी योजना सफल हुई... या मैं असफल हो चुकी हूं।" मेरी सांस रुक गई। विद्या आगे बोली— "सागर, तुम्हें अब सब याद आ गया होगा। लेकिन एक बात अभी भी तुम्हें नहीं पता..." वीडियो अचानक रुक गया। स्क्रीन काली हो गई। राकेश ने कई बार उसे चलाने की कोशिश की, लेकिन वीडियो आगे नहीं बढ़ा। मैंने घबराकर कहा— "यह अधूरा क्यों है?" तभी स्क्रीन पर एक आखिरी लाइन दिखाई दी— "बाकी सच उस व्यक्ति के पास है, जिस पर तुम सबसे ज्यादा भरोसा करते हो।" मैंने धीरे-धीरे राकेश की तरफ देखा। राकेश ने भी मेरी तरफ देखा। हम दोनों के चेहरों पर एक ही सवाल था— हममें से किसका भरोसा अब टूटने वाला था? मैंने राकेश की तरफ देखा और मेरे भीतर एक अजीब-सी शांति उतर आई। अब मेरी याददाश्त पूरी तरह लौट चुकी थी। मुझे विद्या की जिंदगी, उसकी बातें और राकेश के साथ उसका रिश्ता—सब कुछ साफ-साफ याद आने लगा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सिर्फ सागर नहीं रहा था। मैं खुद को विद्या की तरह महसूस कर रहा था। मैंने आईने के सामने जाकर खुद को देखा। मेरी आंखें, चेहरा, हेयरस्टाइल और मेरा पूरा रूप इतना बदल चुका था कि कुछ पल के लिए मैं खुद भी चौंक गया। मैंने धीमी आवाज में कहा— "राकेश..." राकेश ने मेरी आवाज सुनी और पलटकर मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे का रंग अचानक उड़ गया। वह कुछ कदम पीछे हट गया। "विद्या...?" मैंने उसकी तरफ देखा। मेरी आंखों में आंसू आ गए। "हां, राकेश। मैं वही हूं... तुम्हारी विद्या।" राकेश कुछ बोल नहीं पाया। वह बस मुझे देखता रहा। उसकी आंखों में अविश्वास, सदमा और पुरानी यादें एक साथ उमड़ आईं। "लेकिन... विद्या तो..." उसकी आवाज टूट गई। मैं उसके पास गया और धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। "मुझे पता है तुमने क्या सहा है। मुझे यह भी पता है कि तुमने मुझे कभी भुलाया नहीं।" राकेश की आंखों से आंसू निकल पड़े। "मैंने तुम्हें छह साल तक मृत समझकर जीया है।" मैंने उसका हाथ दबाया। "और मैंने भी तुम्हें कभी नहीं भुलाया।" कुछ क्षणों तक हम दोनों कुछ नहीं बोले। फिर राकेश ने कांपती आवाज में पूछा— "अगर तुम सच में विद्या हो... तो मुझे वह बात बताओ जो सिर्फ हम दोनों जानते थे।" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए वह पुरानी बात दोहरा दी। राकेश की आंखें फैल गईं। अब उसके पास शक करने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन तभी मेरे चेहरे पर गंभीरता आ गई। "राकेश, मेरी मौत का सच अभी बाकी है।" वह चौंक गया। "क्या मतलब?" मैंने धीरे से कहा— "मेरा एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन जिसने मेरी कार के ब्रेक के साथ छेड़छाड़ की थी, वह अकेला नहीं था।" राकेश ने पूछा— "कौन था उसके साथ?" मैंने दरवाजे की तरफ देखा। "जिसे तुम इतने सालों से अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त समझते रहे हो।" राकेश का चेहरा सफेद पड़ गया। "नहीं... ऐसा नहीं हो सकता।" मैंने उसकी तरफ देखा। "हो सकता है, राकेश। और अब हमें उसके सामने जाकर सच जानना होगा।" तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज आई। मैंने राकेश का हाथ कसकर पकड़ लिया। कदम दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए। फिर किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। और एक परिचित आवाज आई— "राकेश... दरवाजा खोलो।" राकेश ने मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था। क्योंकि वह आवाज... उसके सबसे पुराने दोस्त की थी। राकेश ने धीरे-धीरे दरवाजा खोला। सामने उसका पुराना दोस्त खड़ा था। राकेश ने सामान्य दिखने की कोशिश करते हुए पूछा— "क्या बात है? इतनी रात को यहां कैसे?" लेकिन जैसे ही उस आदमी की नजर मेरे ऊपर पड़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह एकदम पीछे हट गया। उसकी आंखें फैल गईं और उसके मुंह से मुश्किल से शब्द निकले— "ये... ये कैसे हो सकता है?" राकेश ने तुरंत उसकी तरफ देखा। "क्या हुआ? तुम उसे देखकर इतने डर क्यों गए?" वह कुछ बोल नहीं पाया। उसकी नजरें लगातार मुझ पर टिकी थीं, जैसे वह किसी भूत को देख रहा हो। मैंने शांत आवाज में कहा— "मुझे देखकर हैरान हो?" उसने कांपते हुए पूछा— "तुम... तुम कौन हो?" मैं एक कदम आगे बढ़ा। "तुम मुझे पहचानते नहीं?" उसने सिर हिला दिया, लेकिन उसके चेहरे से साफ था कि वह मुझे पहचान चुका था। राकेश ने उसकी तरफ देखा। "सच-सच बताओ। तुम इसे जानते हो?" वह चुप रहा। मैंने कहा— "बीस साल पहले तुम इसी घर में आए थे।" उसका चेहरा और भी सफेद पड़ गया। राकेश ने हैरानी से मेरी तरफ देखा। "तुम्हें याद आ गया?" मैंने सिर हिलाया। "सब कुछ।" उस आदमी ने अचानक दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया। लेकिन राकेश ने उसका रास्ता रोक लिया। "अब तुम कहीं नहीं जाओगे।" वह घबराकर बोला— "राकेश, मेरी बात सुनो। तुम्हें नहीं पता कि तुम किस मुसीबत में पड़ रहे हो।" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा— "मुसीबत तो तुमने बीस साल पहले शुरू की थी।" वह बिल्कुल शांत हो गया। फिर मैंने आखिरी सवाल पूछा— "विद्या की कार के ब्रेक किसने काटे थे?" उसका चेहरा देखते ही मुझे जवाब मिल गया। वह कुछ नहीं बोला। लेकिन उसकी खामोशी सब कुछ कह चुकी थी। राकेश ने अविश्वास से उसकी तरफ देखा। "तुम...?" उसने नजरें झुका लीं। कमरे में कुछ सेकंड तक बिल्कुल सन्नाटा रहा। फिर उसने धीमी आवाज में कहा— "मैंने ब्रेक नहीं काटे थे।" मैंने चौंककर पूछा— "तो फिर किसने?" उसने मेरी तरफ देखा। और उसके अगले शब्दों ने हम दोनों को हिला दिया— "जिस आदमी ने विद्या को मरने से कुछ दिन पहले धमकी दी थी... वह कोई बाहर का आदमी नहीं था।" राकेश ने पूछा— "कौन था?" उसने कांपती आवाज में जवाब दिया— "वह तुम्हारे अपने परिवार का सदस्य था।" राकेश के दोस्त ने सिर झुका लिया। कमरे में इतनी खामोशी थी कि उसकी सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी। मैंने आगे बढ़कर पूछा— "मेरे परिवार का वह सदस्य आखिर कौन था?" उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में डर था। फिर उसने आखिरकार कहा— "तुम्हारा बड़ा भाई।" मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। "भैया...?" राकेश भी स्तब्ध रह गया। "तुम यह क्या कह रहे हो?" उस आदमी ने कांपती आवाज में कहा— "बीस साल पहले तुम्हारे भाई को पता चल गया था कि विद्या तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानती है। उसे डर था कि अगर विद्या ने वह पुराना राज तुम्हें बता दिया, तो परिवार की बहुत-सी बातें सामने आ जाएंगी।" मैंने पूछा— "कौन-सा राज?" उसने गहरी सांस ली। "तुम्हारे परिवार की संपत्ति और पैसों से जुड़ा एक बड़ा धोखा। तुम्हारे भाई ने कुछ दस्तावेजों में हेराफेरी की थी। विद्या को इसके सबूत मिल गए थे।" मेरी आंखों के सामने अपने भाई का चेहरा घूम गया। वह आदमी आगे बोला— "विद्या ने उसे धमकी नहीं दी थी। वह सिर्फ तुम्हें सच बताना चाहती थी। लेकिन तुम्हारे भाई ने उसे रोकने की कोशिश की।" राकेश ने गुस्से में पूछा— "और एक्सीडेंट?" उसने सिर झुका लिया। "ब्रेक के साथ छेड़छाड़ तुम्हारे भाई ने करवाई थी। लेकिन कार चलाने वाला मैं नहीं था। मैं सिर्फ उसके कहने पर उस रात विद्या पर नजर रख रहा था।" मेरी आंखों में आंसू आ गए। "तो विद्या ने मरने से पहले मुझे ढूंढने की कोशिश क्यों की?" उसने जवाब दिया— "क्योंकि उसे पता चल गया था कि तुम्हारे भाई की अगली चाल तुम्हारे खिलाफ थी। उसने तुम्हें बचाने के लिए सारे सबूत छिपा दिए थे।" मैंने तुरंत पूछा— "कहां?" उसने मेरी तरफ देखा और पुराने कमरे की दीवार की ओर इशारा किया। "यहीं। इसी घर में।" राकेश ने तुरंत उस दीवार की तरफ देखा। मैं धीरे-धीरे वहां गया। दीवार के एक हिस्से पर हाथ रखते ही मुझे फिर वही पुरानी याद दिखाई दी। बीस साल पहले विद्या मेरे सामने खड़ी थी। उसने मेरे हाथ में एक छोटा डिब्बा देते हुए कहा था— "सागर, इसे तब तक मत खोलना जब तक तुम्हें मुझ पर पूरा भरोसा न हो।" मेरी आंखें खुल गईं। "वह डिब्बा..." मैंने दीवार के पीछे छिपे उसी पुराने स्थान की तरफ देखा। राकेश ने पूछा— "क्या हुआ?" मैंने धीमी आवाज में कहा— "विद्या ने मुझे यह जगह पहले ही बताई थी।" हमने दीवार का पैनल खोला। अंदर एक छोटा-सा डिब्बा था। मैंने उसे बाहर निकाला। डिब्बे पर सिर्फ एक नाम लिखा था— सागर। लेकिन उसे खोलने से पहले मेरी नजर राकेश पर पड़ी। मुझे पहली बार एहसास हुआ कि बीस साल पुराना सच अब हमारे हाथ में था। और उस सच में सिर्फ मेरे परिवार का राज नहीं... मेरी पूरी जिंदगी का जवाब छिपा था। मैंने कांपते हाथों से वह डिब्बा खोला। अंदर कुछ पुराने कागज, एक छोटी-सी चाबी और विद्या की लिखावट वाला एक पत्र था। मैंने पत्र खोला। पहली ही लाइन पढ़कर मेरी सांस रुक गई— "सागर, अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो तुम्हें यह जानना जरूरी है कि तुम्हारे बड़े भाई का नाम मेरी मौत की साजिश में जरूर आया था... लेकिन वह अकेला दोषी नहीं है।" मैंने राकेश की तरफ देखा। "मतलब?" राकेश ने चुपचाप पत्र पढ़ना शुरू किया। विद्या ने आगे लिखा था— "तुम्हारे भाई ने मेरे साथ धोखा किया। उसने मुझे धमकाया और मेरी कार के ब्रेक खराब करवाने की योजना में शामिल था। लेकिन आखिरी समय पर उसने मुझे मारने का फैसला नहीं किया था।" मेरे हाथ कांपने लगे। पत्र में आगे लिखा था— "जिस रात मेरी कार का एक्सीडेंट हुआ, उस रात तुम्हारे भाई को भी किसी ने धोखा दिया था। असली योजना किसी और की थी।" मैंने हैरानी से पूछा— "तो असली मास्टरमाइंड कौन था?" पत्र के आखिरी हिस्से में सिर्फ एक नाम लिखा था— विक्रम। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। वही विक्रम, जिसका नाम पिछले कई घंटों से हमारे सामने बार-बार आ रहा था। लेकिन पत्र में अभी एक और रहस्य बाकी था। विद्या ने लिखा था— "विक्रम ने तुम्हारे भाई को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उसने उसे यकीन दिलाया कि वह सिर्फ मुझे डराएगा, लेकिन असली मकसद मेरी हत्या था। तुम्हारे भाई को सच्चाई बहुत देर से पता चली।" राकेश ने गुस्से में मुट्ठी भींच ली। "तो तुम्हारे भाई ने बाद में सच क्यों नहीं बताया?" मैंने पत्र का अगला पन्ना पढ़ा। वहां लिखा था— "क्योंकि विक्रम के पास तुम्हारे भाई के खिलाफ भी सबूत थे। वह उसे ब्लैकमेल कर रहा था।" अब पूरी तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो रही थी। मेरे बड़े भाई ने गलत काम किया था। वह विद्या को डराने की योजना में शामिल था। लेकिन विद्या की हत्या का अंतिम फैसला उसने नहीं लिया था। असल साजिशकर्ता विक्रम था। मैंने पत्र नीचे रखा। तभी उस कमरे के बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी। राकेश ने तुरंत मेरी तरफ देखा। हम दोनों समझ गए। कोई घर के अंदर था। और तभी अंधेरे से एक आवाज आई— "तुम लोगों ने आखिर वह पत्र ढूंढ ही लिया।" मैंने दरवाजे की तरफ देखा। वहां एक आदमी खड़ा था। उसकी आंखों में अजीब-सी ठंडक थी। राकेश ने उसे देखते ही कहा— "विक्रम..." वह हल्का-सा मुस्कुराया। "अब मेरी बारी है तुम्हें पूरी कहानी बताने की।" विक्रम धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया। राकेश उसके सामने खड़ा हो गया। "तुमने विद्या के साथ क्या किया था?" राकेश ने गुस्से में पूछा। विक्रम कुछ पल चुप रहा। फिर उसने मेरी तरफ देखा। "तुम्हें लगता है कि तुम्हें अपनी पूरी याददाश्त वापस आ गई है, सागर?" मैंने कहा— "हां।" वह हल्का-सा मुस्कुराया। "नहीं। तुम्हें अभी भी सबसे जरूरी बात याद नहीं आई।" मेरे चेहरे पर हैरानी छा गई। विक्रम ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली और मेरे सामने रख दी। तस्वीर देखते ही मेरे हाथ कांपने लगे। उसमें मैं, विद्या और मेरा बड़ा भाई एक साथ खड़े थे। लेकिन तस्वीर के पीछे लिखी तारीख देखकर मैं स्तब्ध रह गया। यह तस्वीर मेरी याददाश्त में दर्ज घटना से कई महीने पहले की थी। विक्रम बोला— "तुम्हारे भाई ने विद्या को सिर्फ धमकाया था। लेकिन विद्या तुम्हारी दुश्मन नहीं थी। वह तुम्हें बचाना चाहती थी।" मैंने पूछा— "तो फिर असली रहस्य क्या है?" विक्रम ने राकेश की तरफ देखा। "राकेश को भी यह बात नहीं पता।" राकेश ने कहा— "सीधे-सीधे बताओ।" विक्रम ने गहरी सांस ली। "विद्या की मौत हुई ही नहीं थी।" कमरे में जैसे समय रुक गया। मैंने अविश्वास से कहा— "क्या?" विक्रम ने कहा— "जिस महिला की मौत की खबर राकेश को मिली थी, वह विद्या नहीं थी।" राकेश पीछे हट गया। "तुम झूठ बोल रहे हो। मैंने खुद उसकी पहचान की थी।" विक्रम ने सिर हिलाया। "तुमने चेहरा नहीं देखा था। अस्पताल में हालत इतनी खराब थी कि पहचान सिर्फ कागजों और सामान से हुई थी।" मेरी आंखों के सामने अंधेरा-सा छाने लगा। विक्रम ने आगे कहा— "विद्या जिंदा थी। उसने अपनी मौत का नाटक इसलिए किया क्योंकि उसे पता चल गया था कि विक्रम..." वह अचानक रुक गया और मेरी तरफ देखने लगा। "क्योंकि उसे पता चल गया था कि उसके पीछे सिर्फ तुम्हारा भाई नहीं, बल्कि एक पूरा गिरोह पड़ा है।" मैंने कांपती आवाज में पूछा— "अगर विद्या जिंदा थी... तो वह कहां थी?" विक्रम ने मेरी तरफ इशारा किया। "यही तो सबसे बड़ा रहस्य है।" मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। फिर उसने कहा— "सागर, तुम्हारे साथ बीस साल पहले जो हुआ था, उसमें विद्या ने तुम्हारी जिंदगी बचाने के लिए तुम्हें एक नई पहचान दी थी।" मैंने अपना चेहरा छुआ। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। विक्रम ने आखिरी बात कही— "तुम्हें लगता है कि तुम विद्या बन गए हो..." वह कुछ पल रुका। "लेकिन सच यह है कि विद्या की आखिरी इच्छा थी कि उसकी पहचान और उसकी यादें तुम्हारे अंदर जिंदा रहें।" मैं स्तब्ध रह गया। राकेश भी मुझे देखता रह गया। अब तक मुझे लग रहा था कि मैं विद्या को याद कर रहा हूं। लेकिन शायद... मैं सिर्फ उसकी यादें नहीं जी रहा था। मैं उसकी अधूरी कहानी को पूरा कर रहा था। विक्रम की बात सुनकर मैं बिल्कुल स्तब्ध था। मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था— "लेकिन यह सब हुआ कैसे?" तभी राकेश ने धीरे से मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में आंसू थे। "सागर... अब मुझे भी तुम्हें एक सच बताना होगा।" मैंने उसकी तरफ देखा। "कौन-सा सच?" राकेश ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा— "तुम्हें लगता है कि तुम विद्या बन गई हो। लेकिन असली बात यह है कि विद्या ने कभी तुम्हें अपनी पहचान नहीं दी थी।" मैं चौंक गया। "तो फिर मुझे उसकी सारी बातें और यादें कैसे याद हैं?" राकेश ने मेज पर रखा पुराना डिब्बा उठाया। उसमें से उसने एक छोटा-सा उपकरण निकाला। "बीस साल पहले विद्या ने तुम्हारे साथ एक प्रयोग किया था।" मैंने हैरानी से पूछा— "कैसा प्रयोग?" राकेश ने बताया कि विद्या मनोविज्ञान और स्मृति पर शोध करती थी। उसने मेरी मदद से मेरे पुराने अनुभवों और यादों को रिकॉर्ड किया था। उसका उद्देश्य मेरी पहचान बदलना नहीं था, बल्कि मुझे अपने बारे में स्वीकार करने में मदद करना था। "लेकिन उस रिकॉर्डिंग का एक हिस्सा तुम्हारे भाई के हाथ लग गया," राकेश ने कहा। "उसने उसका गलत इस्तेमाल किया।" मैंने घबराकर पूछा— "तो जो कुछ मुझे अभी याद आ रहा है...?" "उसमें तुम्हारी अपनी यादें भी हैं और विद्या के साथ बिताए पुराने समय की यादें भी। तुम्हारा दिमाग लंबे समय से दबे हुए अनुभवों को जोड़ रहा है। इसी वजह से तुम्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे तुम विद्या हो।" मैं कुछ देर तक बिल्कुल शांत रहा। फिर राकेश मेरे पास आया और बोला— "लेकिन मेरे लिए सबसे जरूरी बात यह है कि तुम कौन हो, यह फैसला कोई दूसरा नहीं करेगा।" मैंने उसकी आंखों में देखा। उस पल मुझे पहली बार समझ आया कि यह कहानी सिर्फ विद्या की मौत का रहस्य नहीं थी। यह मेरी अपनी पहचान, मेरे अतीत और उन लोगों की कहानी थी जिन्होंने मेरी जिंदगी के फैसले मेरे लिए लेने की कोशिश की थी। राकेश ने मेरा हाथ पकड़कर कहा— "अब हमें आखिरी काम करना है।" मैंने पूछा— "क्या?" उसने विक्रम की तरफ देखा। "विद्या की मौत का सच दुनिया के सामने लाना।" विक्रम ने सिर झुका लिया। लेकिन तभी उसके फोन पर एक मैसेज आया। उसने स्क्रीन देखी और अचानक घबरा गया। मैंने पूछा— "क्या हुआ?" विक्रम ने फोन हमारी तरफ बढ़ा दिया। मैसेज में सिर्फ एक लाइन थी— "तुमने सच्चाई बता दी। अब अगला नंबर राकेश का है।" कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। और इस बार खतरा हमारे सामने नहीं... हमारे पीछे खड़ा था। कमरे में सन्नाटा छा गया। तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी। इस बार आवाज किसी अजनबी की नहीं थी। वह आवाज मेरे लिए जानी-पहचानी थी। दरवाजा खुला। और सामने खड़े आदमी को देखते ही मेरी सांस रुक गई। वह मेरा बड़ा भाई था। राकेश भी उसे देखकर अवाक रह गया। "तुम?" भैया ने अंदर आते हुए कहा— "हां। इतने सालों से जिस आदमी को तुम ढूंढ रहे थे, वह मैं ही था।" मेरी आंखों में आंसू आ गए। "तुमने विद्या के साथ ऐसा क्यों किया?" भैया ने कुछ देर तक मुझे देखा। फिर उसने कहा— "क्योंकि मुझे डर था कि अगर विद्या ने तुम्हें सच्चाई बता दी, तो हमारा पूरा परिवार बर्बाद हो जाएगा।" राकेश ने गुस्से में पूछा— "और उसकी मौत?" भैया ने सिर झुका लिया। "मैंने उसे मारने की योजना नहीं बनाई थी। मैंने सिर्फ उसे डराने के लिए विक्रम की मदद ली थी। लेकिन विक्रम ने मेरी बात का गलत इस्तेमाल किया।" विक्रम तुरंत बोला— "झूठ! तुम जानते थे कि कार के ब्रेक खराब किए जा रहे हैं।" भैया ने उसकी तरफ देखा। "और तुमने मुझे ब्लैकमेल किया था।" अब धीरे-धीरे पूरा सच सामने आने लगा। बीस साल पहले परिवार की संपत्ति को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। भैया ने गलत तरीके से कुछ दस्तावेज अपने नाम करवाने की कोशिश की थी। विद्या को इसकी जानकारी मिल गई थी और उसने सबूत इकट्ठे कर लिए थे। लेकिन असली चौंकाने वाली बात अभी बाकी थी। भैया ने मेरी तरफ देखा और कहा— "सागर, विद्या तुम्हें इसलिए बचाना चाहती थी क्योंकि उसे पता चल गया था कि तुम पर भी खतरा है।" मैंने पूछा— "मुझ पर क्यों?" उसने कहा— "क्योंकि उस संपत्ति के असली वारिस तुम थे।" मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। "क्या?" राकेश भी हैरान रह गया। भैया ने आगे बताया— "तुम्हारे पिता ने अपनी वसीयत में तुम्हारे नाम पर संपत्ति का बड़ा हिस्सा रखा था। लेकिन यह बात परिवार में सिर्फ कुछ लोगों को पता थी। विद्या ने वह वसीयत देख ली थी।" अब मुझे समझ आया कि विद्या मुझे क्यों ढूंढ रही थी। क्योंकि वह सिर्फ मेरी पहचान या मेरे अतीत की वजह से मेरे करीब नहीं आई थी। वह मुझे उस सच्चाई से बचाना चाहती थी, जिसके कारण मेरे अपने परिवार के लोग मेरे खिलाफ हो गए थे। भैया ने आखिरी बार मेरी तरफ देखा। "मैंने बहुत बड़ी गलती की थी। लेकिन मैं चाहता था कि तुम्हें कभी सच न पता चले।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा— "सच छिपाकर तुमने मेरी जिंदगी के बीस साल छीन लिए।" कमरे में कोई जवाब नहीं था। राकेश मेरे पास आकर खड़ा हो गया। और पहली बार मुझे लगा कि इतने वर्षों से चल रहा यह रहस्य आखिर खत्म होने वाला है। लेकिन तभी विक्रम ने धीरे से कहा— "एक बात अभी भी बाकी है।" हम सब उसकी तरफ देखने लगे। विक्रम ने कहा— "वह वसीयत असली नहीं थी।" मेरे चेहरे पर फिर वही सवाल उभर आया— "तो फिर असली वसीयत आखिर कहां है?" विक्रम की बात सुनते ही कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। मैंने बेचैनी से पूछा— "अगर असली वसीयत घर में नहीं है, तो आखिर कहां है?" विक्रम ने मेरी तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा— "तुम्हारे पिता ने उसे ऐसी जगह रखा था, जहां परिवार का कोई लालची इंसान आसानी से पहुंच ही नहीं सकता था।" राकेश ने पूछा— "कहां?" विक्रम ने जवाब दिया— "तुम्हारे कुलदेवता के मंदिर में।" मेरे चेहरे पर हैरानी छा गई। "मंदिर में?" उसने सिर हिलाया। "हां। तुम्हारे पिता को अंदाजा था कि एक दिन परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद होगा। इसलिए उन्होंने असली वसीयत मंदिर के पुजारी को सौंप दी थी।" अगली सुबह हम चारों उस पुराने मंदिर की ओर निकल पड़े। मंदिर गांव से काफी दूर था। रास्ते भर मेरे मन में एक ही सवाल घूम रहा था— क्या वहां सच में मेरे पिता की असली वसीयत होगी? मंदिर पहुंचते ही मुझे बचपन की कुछ धुंधली यादें आने लगीं। घंटियों की आवाज... धूप की खुशबू... और पिता का हाथ पकड़कर इसी मंदिर में आना। मंदिर के पुजारी ने हमें देखते ही पहचान लिया। उन्होंने मेरी तरफ गौर से देखा और बोले— "तुम इतने सालों बाद लौटे हो। तुम्हारे पिता ने कहा था कि जब तुम खुद यहां आओगे, तभी वह चीज तुम्हें दी जाए।" मेरी सांस रुक गई। "आपको मेरे पिता ने क्या दिया था?" पुजारी हमें मंदिर के पीछे एक छोटे कमरे में ले गए। उन्होंने एक पुराना लकड़ी का संदूक खोला। अंदर कपड़े में लिपटा हुआ एक दस्तावेज रखा था। पुजारी ने उसे मेरे हाथ में देते हुए कहा— "यह तुम्हारे पिता की अंतिम वसीयत है।" मेरे हाथ कांपने लगे। मैंने कागज खोला। पहली कुछ पंक्तियां पढ़ते ही मेरी आंखें फैल गईं। राकेश ने पूछा— "क्या लिखा है?" मैंने धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया। लेकिन वसीयत में संपत्ति का बंटवारा ही नहीं था। उसमें मेरे परिवार से जुड़ा एक ऐसा सच लिखा था, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। आखिरी पन्ने पर मेरे पिता के हस्ताक्षर थे और नीचे एक लाइन लिखी थी— "सागर को यह सच्चाई उसकी चालीसवीं वर्षगांठ के बाद ही बताई जाए।" मैंने तारीख देखी। मेरे हाथ सुन्न पड़ गए। क्योंकि वह दिन... आज ही था। मैंने राकेश की तरफ देखा। "पापा जानते थे कि आज क्या होने वाला है?" पुजारी ने गंभीर आवाज में कहा— "तुम्हारे पिता को बहुत कुछ पहले से पता था।" मैंने वसीयत का आखिरी पन्ना पलटा। और वहां लिखा अगला वाक्य पढ़कर मेरी सांस थम गई— "सागर, अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझो कि विद्या का सच अब तुमसे छिपा नहीं रह सकता।" मैंने राकेश की तरफ देखा। अब हमें सिर्फ वसीयत नहीं मिली थी। हमें उस रहस्य की आखिरी चाबी मिल चुकी थी, जिसने बीस साल से हमारी जिंदगी उलझा रखी थी। मैंने कांपते हाथों से वसीयत का आखिरी पन्ना पलटा। पुजारी, राकेश, विक्रम और मेरा बड़ा भाई—चारों मेरी तरफ देख रहे थे। मैंने पढ़ना शुरू किया। लेकिन कुछ पंक्तियां पढ़ते ही मेरे हाथ रुक गए। "यह... यह क्या है?" राकेश मेरे पास आया। "क्या लिखा है?" मैंने कागज उसकी तरफ बढ़ा दिया। उसने पढ़ा और उसका चेहरा भी बदल गया। वसीयत में लिखा था— "मेरे बेटे सागर को यह जानना आवश्यक है कि उसके जीवन से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य उसकी संपत्ति नहीं, बल्कि उसकी पहचान है।" मेरी सांसें तेज हो गईं। नीचे लिखा था— "बीस वर्ष पहले मैंने सागर की सुरक्षा के लिए उसकी जिंदगी की कुछ सच्चाइयों को उससे छिपाया था। विद्या इस रहस्य की गवाह थी।" मैंने हैरानी से पूछा— "लेकिन मेरी पहचान का इस सब से क्या संबंध है?" पुजारी ने धीरे से कहा— "वसीयत का अगला पन्ना पढ़ो।" मैंने पन्ना पलटा। वहां सिर्फ एक वाक्य था— "सागर, तुम्हें जिस नाम से दुनिया जानती है, वह तुम्हारी पूरी कहानी नहीं है।" मेरे हाथ कांपने लगे। अचानक मुझे बचपन की कुछ धुंधली यादें आने लगीं। मेरी मां मुझे गोद में लिए हुए थी। पिता किसी से बहस कर रहे थे। और एक महिला बार-बार कह रही थी— "इस बच्चे को अभी सच मत बताना।" मैंने सिर पकड़ लिया। "मुझे... यह सब याद क्यों आ रहा है?" राकेश ने मेरा हाथ पकड़ लिया। तभी विक्रम ने धीरे से कहा— "क्योंकि अब तुम्हारा दिमाग उन यादों को स्वीकार करने के लिए तैयार है।" मैंने उसकी तरफ देखा। "तुम्हें पहले से पता था?" विक्रम ने सिर झुका लिया। "हां।" "और तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?" उसने कहा— "क्योंकि तुम्हारे पिता ने हम सभी से वादा लिया था कि तुम्हारे चालीस साल पूरे होने से पहले यह सच तुम्हें कोई नहीं बताएगा।" मैंने वसीयत फिर से देखी। नीचे मेरे पिता के हस्ताक्षर थे। और उनके ठीक नीचे एक आखिरी लाइन लिखी थी— "जिस व्यक्ति को सागर अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य समझता है, वही व्यक्ति वास्तव में उसके अतीत की आखिरी कड़ी है।" मैंने धीरे-धीरे राकेश की तरफ देखा। राकेश भी मुझे देख रहा था। उसके चेहरे पर अचानक ऐसा भाव आया जैसे उसे भी कुछ समझ आ गया हो। "सागर..." "क्या?" उसने बहुत धीमी आवाज में कहा— "शायद अब हमें उस इंसान से मिलना होगा, जिसके बारे में तुम्हारे पिता ने लिखा है।" मैंने पूछा— "कौन?" राकेश ने मंदिर के बाहर खड़े एक बुजुर्ग व्यक्ति की तरफ इशारा किया। वह आदमी काफी देर से हमें देख रहा था। पुजारी ने उसे देखते ही सिर झुका दिया। फिर उन्होंने कहा— "यही वह व्यक्ति है, जिसके पास तुम्हारे अतीत का आखिरी जवाब है।" मैं उसकी तरफ बढ़ा। बुजुर्ग ने मुझे देखते ही कहा— "सागर... तुम्हें बहुत देर हो गई।" मैं वहीं रुक गया। क्योंकि उसकी आवाज... मुझे कहीं सुनी हुई लग रही थी। बहुत साल पहले। बुजुर्ग ने मेरी तरफ देखा और धीमे से कहा— "सागर... अब तुम्हें वह सच जानना ही होगा, जिसे विद्या ने अपनी आखिरी सांस तक छिपाकर रखा था।" मैंने पूछा— "विद्या का इस सब से क्या संबंध है?" बुजुर्ग कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने कहा— "विद्या की कहानी उसकी मौत के साथ खत्म नहीं हुई थी।" मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। राकेश ने बेचैनी से पूछा— "आप कहना क्या चाहते हैं?" बुजुर्ग ने मेरी तरफ इशारा किया। "विद्या का पुनर्जन्म हुआ था।" मंदिर में मौजूद हर व्यक्ति स्तब्ध रह गया। मैंने अविश्वास से पूछा— "किसका... पुनर्जन्म?" बुजुर्ग ने कहा— "विद्या का।" मेरी सांस अटक गई। उन्होंने आगे कहा— "लेकिन पुनर्जन्म के बाद उसे अपने पिछले जन्म की कोई याद नहीं थी। समय के साथ कुछ घटनाओं, लोगों और जगहों ने उसकी पुरानी यादों को जगाना शुरू किया।" राकेश की आंखों में आंसू आ गए। "तो वह... अभी कहां है?" बुजुर्ग ने मेरी तरफ देखा। "तुम्हारे सामने।" मेरे हाथ-पैर सुन्न पड़ गए। "मैं?" उन्होंने सिर हिलाया। "तुम्हारे भीतर जो विद्या की यादें जागी हैं, वे सिर्फ कल्पना नहीं हैं। तुम्हारे पिता और विद्या ने वर्षों पहले कुछ ऐसे प्रमाण छोड़े थे, जिनसे उन्हें विश्वास था कि विद्या दोबारा जन्म लेगी और एक दिन अपने पुराने जीवन की सच्चाई तक पहुंचेगी।" राकेश मुझे देखता रह गया। "लेकिन अगर यह सच है... तो सागर कौन है?" बुजुर्ग मुस्कुराए। "सागर अपनी जगह सागर है। विद्या की आत्मा का पुनर्जन्म होना उसकी पहचान मिटा नहीं देता।" मैंने पहली बार इस बात को समझने की कोशिश की। मैं विद्या की यादों से जुड़ा हो सकता था, लेकिन मेरा वर्तमान जीवन और मेरी अपनी पहचान भी उतनी ही वास्तविक थी। बुजुर्ग ने वसीयत की तरफ इशारा किया। "तुम्हारे पिता ने यही बात लिखी थी। उन्होंने कहा था कि जब तुम्हें विद्या की यादें लौटें, तब तुम्हें अपने अतीत और वर्तमान में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं होगी।" राकेश की आंखों से आंसू बह निकले। उसने मेरी तरफ देखकर कहा— "तो विद्या कहीं गई नहीं थी..." मैंने उसकी तरफ देखा और धीरे से जवाब दिया— "शायद वह सिर्फ एक नई जिंदगी में लौट आई थी।" मंदिर की घंटियां बजने लगीं। और उसी क्षण मुझे लगा कि बीस साल से अधूरी पड़ी कहानी आखिर अपने आखिरी अध्याय तक पहुंच चुकी थी। अंतिम अध्याय — अधूरी कहानी का अंत मंदिर की घंटियां लगातार बज रही थीं। मैं चुपचाप खड़ा था। मेरे भीतर सागर की यादें भी थीं और विद्या की भी। बीते बीस वर्षों के सारे सवाल जैसे एक साथ मेरे सामने खड़े थे। राकेश मेरे पास आया। उसकी आंखों में आंसू थे। उसने कहा— "मुझे नहीं पता कि इसे क्या नाम दूं। लेकिन एक बात जानता हूं... मैंने विद्या को कभी भुलाया नहीं था।" मैंने उसका हाथ थाम लिया। "और मैंने भी तुम्हें कभी नहीं भुलाया।" पुजारी ने हमारे सामने मेरे पिता की वसीयत रखी। अब उसमें छिपी आखिरी बात भी साफ हो चुकी थी। संपत्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण मेरे पिता की इच्छा थी—वह चाहते थे कि परिवार का सच सामने आए और किसी की पहचान या जिंदगी को लालच के कारण नुकसान न पहुंचे। मेरे बड़े भाई ने सिर झुका लिया। उसने स्वीकार किया कि उसने लालच और डर में गलत फैसले लिए थे। विक्रम ने भी अपने अपराधों की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली। लेकिन विद्या की मौत का सच सामने लाने के बाद भी एक सवाल बाकी था— राकेश और मेरा भविष्य क्या होगा? मंदिर से बाहर निकलते समय राकेश मेरे पास आया। "अब तुम क्या करना चाहते हो?" मैंने कुछ देर आसमान की तरफ देखा। फिर मुस्कुराकर कहा— "मैं अब किसी और की पहचान बनकर नहीं जीना चाहता।" राकेश ने मेरी तरफ देखा। मैंने आगे कहा— "अगर मेरे भीतर विद्या की यादें हैं, तो मैं उन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा मानूंगा। लेकिन मैं यह भी स्वीकार करूंगा कि मेरा वर्तमान मेरा अपना है।" राकेश मुस्कुराया। "और हमारा रिश्ता?" मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। "वह भी हमारा अपना फैसला होगा—किसी पुराने रहस्य, किसी वसीयत या किसी और के दबाव से नहीं।" हम दोनों मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। पीछे मुड़कर मैंने आखिरी बार मंदिर को देखा। बीस साल पहले शुरू हुई वह कहानी आज खत्म हो चुकी थी। विद्या की मौत का सच सामने आ चुका था। परिवार का रहस्य खुल चुका था। वसीयत मिल चुकी थी। और मेरे भीतर चल रहा सबसे बड़ा संघर्ष भी खत्म हो चुका था। अब मुझे समझ आ गया था कि इंसान की पहचान सिर्फ उसके अतीत से तय नहीं होती। वह उन फैसलों से भी बनती है, जो वह अपने वर्तमान में लेता है। मैं सागर था। मेरी यादों में विद्या भी थी। और दोनों सच्चाइयों को स्वीकार करके ही मैं पहली बार खुद को पूरी तरह समझ पाया। राकेश ने मेरा हाथ थामा। हम आगे बढ़ गए। पीछे मंदिर की घंटी आखिरी बार बजी। और मुझे लगा... इस बार किसी कहानी का अंत नहीं हुआ था। इस बार मेरी जिंदगी की एक नई शुरुआत हुई थी। नई शुरुआत — विद्या के रूप में मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए मैंने आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा। बीस साल पुराने सारे राज अब मेरे पीछे थे। लेकिन मेरे सामने एक नई जिंदगी खड़ी थी। मैंने धीरे से राकेश का हाथ पकड़ा। "राकेश..." वह मेरी तरफ मुड़ा। मैंने मुस्कुराकर कहा— "अब मैं सिर्फ तुम्हें विद्या की याद दिलाने वाला इंसान नहीं हूं। मैं अपनी जिंदगी को उसी रूप में जीना चाहती हूं, जिसमें मेरा दिल खुद को सबसे ज्यादा सच महसूस करता है।" राकेश की आंखों में आंसू आ गए। "तो आज से?" मैंने सिर हिलाया। "आज से।" मैंने आईने में खुद को देखा। साड़ी, माथे की बिंदी और मांग में सिंदूर देखकर मुझे अजीब-सी शांति महसूस हुई। यह किसी और की नकल करने जैसा नहीं था। यह मेरे लिए अपनी जिंदगी को एक नए तरीके से स्वीकार करने का क्षण था। राकेश मेरे पास आया। "क्या मैं तुम्हें विद्या कह सकता हूं?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए मुस्कुराकर कहा— "हां। लेकिन इस बार यह नाम किसी पुराने रहस्य की वजह से नहीं होगा। यह मेरा अपना फैसला होगा।" राकेश ने मेरा हाथ थाम लिया। हम दोनों घर की ओर चल पड़े। दरवाजे के सामने पहुंचकर मैं कुछ पल रुकी। यही वह घर था जहां कभी डर, झूठ और रहस्य छिपे थे। आज उसी घर में मैं एक नई पहचान के साथ प्रवेश करने जा रही थी। राकेश ने दरवाजा खोला। मैंने अंदर कदम रखा और मन ही मन कहा— "आज से मेरा अतीत मेरी कहानी है... लेकिन मेरा भविष्य मेरा अपना है।" और उस दिन से मेरी जिंदगी की एक नई कहानी शुरू हुई— विद्या के रूप में। श्रीमती विद्या राकेश कुमार अब यह नाम उसके लिए सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उसकी नई जिंदगी और उसके अपने चुने हुए भविष्य का प्रतीक था।

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Hindi · Family yesterday

राकेश की पत्नी

नमस्ते दोस्तो, मेरा नाम सागर है और मैं मध्य प्रदेश का रहने वाला हूँ. मेरी उम्र 40 साल है. आगे बढ़ने से पहले मैं आपको अपनी बॉडी के बारे में थोड़ा बता देता हूँ. मेरी बॉडी बिल्कुल स्लिम है, मैं बहुत गोरा हूँ और पूरे शरीर में सिर के अलावा कहीं पर भी बाल नहीं हैं. मेरी छाती लड़की जैसी है। यानी मेरी छाती ब्रेस्ट जैसी दिखती है. मेरी हाइट 5 फीट 4 इंच है और मेरा चेहरा लड़कियों जैसा है.मेरी बनावट भी बिल्कुल किसी लड़की जैसी है. तब की है जब मैं जवान हुआ ही था जब मेरी उम्र 20 साल थी. मुझे लड़कियों में इंटरेस्ट था. लेकिन मुझे क्रॉस ड्रेसिंग करना बहुत पसंद था.जब मैं अकेला होता था तो बाथरूम में जाकर अपनी बहन की ब्रा-पैंटी पहनता लेकिन डर भी लगता था कि अगर किसी को पता चल गया तो बहुत बेइज्जती होगी. इसीलिए मैं ये बात अपने तक ही रखता था. एक दिन मेरी फेवरेट मूवी रिलीज होने वाली थी और मुझे वह मल्टीप्लेक्स में देखनी ही थी. मैंने अपने पैरेंट्स को मनाया, तो वे मान गए.फिर मैंने कुछ दोस्तों को भी कॉल किया ताकि वे भी चलें और मैं बोर न होऊं.लेकिन सबने मना कर दिया. फिर भी वह मेरी फेवरेट फिल्म थी तो मैंने सोच लिया कि मैं अकेले ही जाकर देखूँगा. अगली सुबह मैं 8 बजे निकल गया.मूवी देखने के लिए मुझे मॉल जाना था जो मेन सिटी में था.वहां पहुंचने में मुझे 2 घंटे लगे. मैंने जल्दी से टिकट लिया और मूवी एंजॉय करने लगा. दोपहर एक बजे मूवी खत्म हुई तो मैं सोचने लगा कि अब क्या किया जाए. मैंने पेरेंट्स को बोल रखा था कि मैं रात 9 बजे तक आऊंगा. फिर मैं मॉल में थोड़ा घूमने लगा.तभी मुझे जोर से पेशाब आई. मैं जल्दी से चौथी मंजिल के बाथरूम में गया, जो फूड सेक्शन में था. वहां ज्यादा भीड़ नहीं रहती थी. मैं वहां पहुंचा और अन्दर गया तो देखा कि एक आदमी पहले से वहां बैठा था. उसकी उम्र करीब 30 साल रही होगी.वह बहुत हट्टा-कट्टा और बिल्कुल काला था.वह अपने फोन देख रहा था. शायद वह दरवाजा बंद करना भूल गया था.मैंने जैसे ही दरवाजा खोला तो वह मुझे घूरकर देखने लगा था.मैं उसे देखकर वहां से जाने लगा और ‘सॉरी भईया’ बोलने लगा. तभी उसने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया. मैंने मुड़कर देखा तो उसने मुझे आंख मारी और खींचकर अपनी गोद में बिठा लिया. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मैंने उठने की कोशिश की लेकिन उसने मुझे कमर से इतनी जोर से पकड़ लिया कि मैं उठ नहीं पाया. मैंने उससे कहा- ये आप क्या कर रहे हो?उसने कहा- तुम बहुत सेक्सी हो. प्लीज, मेरा एक बार मुँह में ले लो, फिर तुम चले जाना! मैंने मना किया और कहा- तुम ये क्या बोल रहे हो? उसका लंड अब फिर से धीरे-धीरे खड़ा होने लगा और मुझे अपनी गांड में फील होने लगा. मैंने सोचा कि इसी से शुरू कर लेता हूँ, वैसे भी मुझे मुँह में लेने का बड़ा मन था और अपनी पसंद को आज पूरी करने का सही अवसर भी था.थोड़ा सोचकर मैंने कहा- ठीक है. लेकिन मैं सिर्फ चूसूँगा और शर्त ये है कि तुम्हें मुझे 300 रुपये देने होंगे.उसने तुरंत हां कर दी. मैंने कहा- तुम इसकी वीडियो नहीं बनाओगे! उसने अपना फोन तुरंत स्विच ऑफ करके रख दिया.अब हम दोनों के चेहरों पर मुस्कान थी.वह टॉयलेट सीट पर बैठा था.मैं लंड चूसने के लिए नीचे बैठने लगा तो उसने मेरा कंधा पकड़ा और मुझे फिर से अपनी गोद में बिठाकर एक छोटा-सा किस किया.मैं उसकी आंखों में देखने लगा.थोड़ी देर बाद उसने फिर से एक छोटा-सा किस किया.अब मैं भी गर्म हो चुका था. मैंने उसे जोर से गले लगाया और उसके होंठों को जंगली जानवर की तरह चूसने और काटने लगा. मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में डाली, तो वह अपनी जीभ से मेरी जीभ को घुमा-घुमाकर फेर रहा था.मुझे बहुत अच्छा फील हो रहा था क्योंकि मेरा ये पहला अनुभव था. मेरी धड़कनें तेज हो रही थीं. उसने मुझे 5 मिनट तक जमकर किस किया.फिर मैं उठा और घुटनों के बल नीचे बैठ गया.वह जल्दी से खड़ा हुआ, अपनी पैंट नीचे की और फिर से बैठ गया.जब मैंने उसका लंड देखा तो मेरी आंखें फट गईं. उसका लंड 8 इंच लंबा, 4 इंच मोटा और बिल्कुल काला था.उसमें हल्की-हल्की झांटें भी थीं. उस लंड से बहुत अजीब और आकर्षक स्मेल आ रही थी.मुझे वह स्मेल इतनी अच्छी लगी कि मैंने उसका लंड हाथ में पकड़ा और कुत्ते की तरह सूँघने लगा.फिर मैंने उसके लंड को अपने हाथ में लेकर आगे-पीछे करने लगा.उसने आंखें बंद कर लीं और मुस्कुराते हुए बैठा रहा. मैंने उसके टोपे को एक बड़ा-सा चुम्मा दिया, फिर उसे मुँह में लिया. वह बहुत गर्म लग रहा था. मैं थूक लगाकर चूसने लगा और उसके काले लंड को अपने मुँह में अन्दर-बाहर करने लगा. कुछ मिनट तक मैं अपने हिसाब से उसका लंड चूसता रहा. मैं सिर्फ 4 इंच तक ही अन्दर ले पा रहा था.फिर उसने अपना लंड मेरे मुँह से निकाला और मुझे टॉयलेट सीट पर बिठाया. वह खड़ा हो गया और मुझे लंड चाटने को कहा.मैंने उसका लंड बाहर से पूरा चाटा, वह पूरी तरह गीला हो गया.फिर मैंने उसके आंडों को सहलाया और एक को मुँह में भर कर चूसने लगा. उसके एक्सप्रेशन से लग रहा था कि उसे बहुत मजा आ रहा है.मैंने 5 मिनट तक उसके आंडों को अच्छे से चूसा.उसने कहा- अब मैं तुम्हें अच्छे से लंड चुसवाऊंगा! मैंने सिर्फ हां में सिर हिलाया. उसने मेरे सिर को जोर से पकड़ा, मेरा मुँह खुलवाया और लंड सीधे मेरे मुँह में डाल दिया.उसका लंड 5 इंच तक अन्दर चला गया और मेरे गले तक पहुंच रहा था.मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी तो मैंने मुश्किल से नाक से सांस लेना शुरू किया.वह लंड अन्दर-बाहर करने लगा. उसने मेरा सिर ऊपर की तरफ उठाया और फिर से लंड अन्दर डाला.इस बार उसका पूरा लंड मेरे गले में था. मैं हैरान था कि ये कैसे हो गया. मुझे लगा कि शायद भईया को चुसवाने का अच्छा अनुभव है. फिर वह जोर-जोर से मेरा मुँह चोदने लगा.मैं खुद को अंकल की रंडी मानने लगा और खुश होने लगा. करीब 20 मिनट तक उसने मेरा मुँह चोदा. फिर उसने कहा- मेरा माल निकलने वाला है, अन्दर ही निकालूँ? मैं बहुत गर्म था तो जोश में मैंने अन्दर डालने का इशारा कर दिया. वह खुश हो गया कि मैं उसका माल पीने को भी तैयार हूँ. उसने मेरा सिर जोर से पकड़ा और मेरे मुँह में अपना माल भर दिया. उसका माल इतना ज्यादा था कि मेरा पूरा मुँह भर गया. मैं जल्दी-जल्दी निगल रहा था ताकि एक बूँद भी बर्बाद न हो. मैंने उसका सारा माल पी लिया. फिर मैंने उसे बैठने के लिए सीट दी और खुद जमीन पर बैठने लगा. उसने मुझे अपनी गोद में छोटे बच्चे की तरह बिठा लिया. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. वह मुझे देख रहा था, मैं उसे देख रहा था. हम दोनों बहुत खुश थे.अब हम दोनों 15 मिनट तक एक-दूसरे से गले लगकर बैठे रहे. फिर हम बाहर निकले.मॉल के बाहर हम एक साथ आए. उसने मुझे अपनी कार में बैठने को कहा.मैं बिना झिझक के बैठ गया और उसे फिर से एक बार किस किया. उसने बताया कि उसका नाम राकेश है और उसकी बीवी मर चुकी है. उसने कई सालों से सेक्स नहीं किया था और न ही मास्टरबेट किया था. इसीलिए उसका माल इतना ज्यादा निकला था. मैंने उसे अपने बारे में बताया.उसने मुझे अपने घर ले जाने की बात कही और बोला- हम वहां और अच्छे से मजा करेंगे! मैंने हां कर दी. वह मुझे अपने घर ले जाने लगा. फिर हम दोनों भईया के घर के अन्दर आ गए. उसका घर बहुत बड़ा था और किसी होटल से कम नहीं था. बहुत लग्जरी हाउस था. उसने मुझे कोल्ड ड्रिंक ऑफर की. मैंने वह पी और वह मुझे अपना घर दिखाने लगा. राकेश ने मुझे अपने बारे में बताया कि वो इस घर में अकेला रहता है। मैंने कहा अब वो अकेला नहीं रहेगा । मैं तुम्हारी बीवी बनुगा. क्या तुम मुझे अपनी बीवी बनाने के लिए तैयार हो? राकेश ने हा कह दिया. मैंने कहा तुम्हारी बीवी का नाम क्या था उसने मुझे बताया कि विद्या का नाम था मेरी बीवी का। मैंने कहा कि ठीक है आज मैं बनूंगा तुम्हारी विद्या। राकेश: हमें शादी करनी होगी। मैने हा कह दी. फिर हम दोनों मंदिर गए वहां पंडित ने हमारी शादी कर वई मैं पूरी दुल्हन के रूप में थी। अब मेरी पहचान महिला के रूप में बन गई थी। फिर हम कोर्ट गए वहां हमने शादी को रजिस्टर्ड कराया। अब हम कानूनी तौर पर पति और पत्नी बन गए थे। मैं दुल्हन के रूप में राकेश के बेडरूम में सज धज के बैठी थी राकेश कमरे में आये और मेरा घूंघट उठाय और मुझे गोद में उठाया धक्का देते हुए लिटा दिया.मैं सेक्स में मस्त हो रही थी.उसने तुरंत अपने कपड़े उतारे और मेरे कपड़े भी उतारने लगा.सब कपड़े उतार कर उसने नीचे फेंक दिए.वह सीधे मेरे ऊपर चढ़ गया और मेरे निप्पल्स चूसने लगा. वह एक हाथ से मेरी गांड दबा रहा था.मैं पूरी तरह गर्म था.हम दोनों चुदाई की तैयारी में जुट गए थे. मैं उसकी गोद में उसका मुँह अपनी तरफ करके बैठ गई थी मैंने अपना एक निप्पल उसके मुँह से सटाया. वह तुरंत मेरे पिंक निप्पल को मुँह में लेकर चूसने लगा. मुझे बहुत गुदगुदी हो रही थी और मजा भी आ रहा था..मैं उसके सामने नंगी बाती थी. वह मुझे भूखे शेर की तरह देख रहा था. मुझे मंगल सूत्र और मांग में सिन्दूर सिर्फ ये दो है मेरे शरीर पर रह गया था। क्यों की मैं ऊस की पत्नी थी मैंने उसे हल्की-सी स्माइल दी. आख़िर आज हमारी सुहागरात थी, मैं पूरी रात उसकी की होना चाहती थी। वह मेरा इशारा समझ गया और तुरंत पीछे आ गया.वह मुझे लेटाकर किस करने लगा. मैं भी उसका पूरा साथ दे रही थी मैं एक हाथ से उसके लंड को सहला रही थी उसका शरीर भी अब गर्म होने लगा था. उसने मुझे पेट के बल लिटाया और मेरी गांड को थोड़ा ऊपर उठाकर अपना मुँह सीधे मेरी गांड में डाल दिया. मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था. चुदने की खुजली अब मेरी गांड सहन नहीं कर पा रही थी. वह मेरे चूतड़ों को जोर से दबा रहा था और मेरी गांड चाट रहा था. मैं उसके सिर को अपने हाथों से अपनी गांड में धकेल रही थी. फिर अपना लंड मेरी गांड में डाल दिया बहुत दर्द हुआ पर मैंने सह लिया और उस रात हमने 4 बार सेक्स किया और मेरी गांड पूरी तरह से खुल गई थी। फिर मैं अगले डिंग अपने घर गई। अपने माता-पिता को बताया कि मैंने एक लड़की के रूप में शादी केर ली है। शुरू में वो गुस्सा हुए पर जेबी मैंने राकेश के बारे में बताया तब वो मान गए। ओस्स दिन के बाद माई राकेश की पत्नी बीएन के हमेशा के लिए राकेश के घर पर रहने लगी हूं आज मेरी उम्र 40 है, मेरे 2 बच्चे हैं और मैं अब सागर नहीं विद्या हूं राकेश की पत्नी।

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