In Progress
|
0
|
0
|
170
Part 1
रेशमी साड़ी का राज़
किरण पन्द्रह साल का था। माँ-बाप के तलाक़ के बाद उसका घर सूना और चुप-चाप हो गया था। माँ, राजश्री, ने नौकरी करना शुरू कर दिया ताकि घर का खर्च चल सके। सुबह जल्दी वह ऑफिस निकल जाती और देर शाम थकी-हारी लौटती।
खाली घर में अकेला रहते हुए किरण की नज़र अक्सर माँ की आलमारी पर पड़ती। उसमें रंग-बिरंगी साड़ियाँ सजी रहतीं – लाल, हरी, सुनहरी, बैंगनी। रेशम की मुलायम चमक उसे खींचती। पहले तो वह सिर्फ़ हाथ लगाकर देखता, फिर धीरे-धीरे इच्छा बढ़ने लगी।
एक दिन उसने हिम्मत करके माँ की साड़ी पहन ली। आईने में जब उसने खुद को देखा तो उसे एक अजीब-सी शांति मिली। मानो वह असली "खुद" से मिल रहा हो। यह उसका छोटा-सा राज़ बन गया। जब-जब माँ घर पर नहीं होती, वह साड़ी पहन कर आईने के सामने खड़ा हो जाता।
लेकिन एक दिन राज़ टूट गया।
राजश्री को दफ़्तर से जल्दी छुट्टी मिल गई। दरवाज़ा खोला तो कमरे से चूड़ियों की हल्की खनक सुनाई दी। वह भीतर गई और अचानक ठिठक गई।
उसके सामने किरण खड़ा था – नीली साड़ी में, आँखों में काजल, चेहरे पर डर और शर्म।
किरण घबरा गया, "म-माँ… मैं माफ़ी चाहता हूँ…" उसकी आँखों में आँसू आ गए।
राजश्री कुछ पल चुप रही। उसके मन में आश्चर्य और चिंता थी, पर बेटे की आँखों में उसने दर्द भी देखा।
धीरे से बोली, "किरण… यह तुम मुझसे छुपाते क्यों रहे?"
किरण ने सिर झुका लिया। "मुझे अच्छा लगता है माँ… लेकिन मुझे डर था कि आप मुझसे नफ़रत करने लगेंगी।"
राजश्री का दिल पिघल गया। उसने उसके गाल पर हाथ रखा, "बेटा, मैं तुमसे नफ़रत कैसे कर सकती हूँ? तुम मेरे हो… बस तुम्हारी यह चाहत मुझे समझनी होगी।"
किरण की आँखों से राहत के आँसू बह निकले। माँ ने उसे गले से लगा लिया।
उस दिन माँ-बेटे के बीच एक नया रिश्ता बना – भरोसे और स्वीकार का।
Part 2
कमरे में गहरी चुप्पी छा गई थी। घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। राजश्री और किरण दोनों मौन थे।
राजश्री ने धीरे से कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा,
“किरण, बेटा… मैं तुझसे नाराज़ नहीं हूँ। लेकिन मुझे सच्चाई जाननी है। तू ये सब क्यों करता है?”
किरण के गले में जैसे शब्द अटक गए। कुछ देर वह काँपती आवाज़ में बोला,
“माँ… मुझे हमेशा से औरतों के कपड़े देखने में खिंचाव लगता है। जब मैं आपकी साड़ी छूता हूँ या पहनता हूँ… तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि मैं पूरा हूँ… मैं असली मैं हूँ।”
राजश्री ध्यान से सुन रही थी। उसका चेहरा गंभीर था, लेकिन आँखों में कोमलता थी।
“तो ये सिर्फ़ खेल नहीं है, है न?” उसने धीरे से पूछा।
किरण ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“नहीं माँ। ये मेरा शौक़… मेरा पैशन है। मैं इससे भाग नहीं सकता। जब मैं साड़ी या सलवार पहनता हूँ तो मुझे अपने अंदर शांति मिलती है।”
राजश्री ने गहरी सांस ली। उसके मन में सवाल भी थे, चिंता भी। लेकिन उसने महसूस किया कि यह उसके बेटे का सच है।
वह पास आई और बोली,
“किरण, अगर ये तेरा पैशन है… तो मुझे तेरी बात सुननी और समझनी होगी। तू मेरा बेटा है, और मैं तुझे कभी खोना नहीं चाहती।”
किरण की आँखों में राहत की चमक आ गई। पहली बार उसने अपना राज़ पूरी तरह माँ से साझा कर दिया था
Part 3
राजश्री ने बेटे की बात सुनने के बाद कई दिन सोचा। उसका मन अब भी उलझन में था, लेकिन एक माँ होने के नाते उसका प्यार ज़्यादा मज़बूत था।
एक शाम उसने किरण को पास बुलाया और बोली,
“किरण, मैं तुझे मना नहीं करूँगी। लेकिन सुन… ये सब सिर्फ़ घर के अंदर ही रहेगा। बाहर किसी को पता चला तो लोग हमें अपमानित करेंगे, ताने देंगे। मैं नहीं चाहती कि तुझे समाज की नज़रों में शर्मिंदगी झेलनी पड़े।”
किरण ने आँखों में चमक लिए धीरे से सिर हिला दिया।
“हाँ माँ, मैं वादा करता हूँ।”
धीरे-धीरे घर के भीतर किरण का रूप बदलने लगा। वह माँ की साड़ियाँ, सलवार, दुपट्टे पहनकर आईने के सामने संकोच से मुस्कुराने लगा। राजश्री उसे देखती तो उसके मन में अब भी अजीब-सा डर रहता, पर बेटे की खुशी देखकर उसके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती।
धीरे-धीरे किरण माँ की मदद भी करने लगा। कभी रसोई में सब्ज़ी काटता, कभी कपड़े तह करता, कभी माँ के साथ झाड़ू-पोछा कर देता। वह इन कामों को भी उसी सौम्यता से करता जैसे कोई लड़की करती।
राजश्री उसे देखते हुए सोचती, “ये रास्ता आसान नहीं होगा… पर अगर मेरा बेटा खुश है, तो मुझे उसके साथ खड़ा रहना ही होगा।”
Part 4
राजश्री को शुरू में लगा था कि यह सिर्फ़ किरण का एक शौक़ है, एक तरह का आकर्षण। लेकिन समय बीतने के साथ उसने कुछ और ही देखा।
जब भी किरण स्त्री-वस्त्र पहनता, उसकी आँखों में चमक आ जाती। जो लड़का हमेशा चुप-चुप और संकोची रहता था, वही साड़ी या सलवार पहनते ही हँसमुख और चंचल बन जाता। उसकी चाल, उसकी बातें, सब बदल जाते। मानो उसके भीतर सोई हुई कोई नई पहचान जाग उठी हो।
राजश्री हैरान होकर उसे देखती रहती।
“ये सिर्फ़ कपड़ों का मामला नहीं है… कपड़े पहनते ही मेरा बेटा बदल क्यों जाता है? क्यों उसकी उदासी मिट जाती है और वह एक खिलखिलाती लड़की बन जाता है?”
धीरे-धीरे राजश्री के मन में भी बदलाव आने लगा। उसने हमेशा एक बेटी की चाह रखी थी, लेकिन किस्मत ने उसे बेटा दिया। अब जब वह किरण को लड़की के रूप में देखती, तो उसे अपनी खोई हुई इच्छा पूरी होती सी लगती।
वह कभी अनजाने में किरण को “बेटी” की तरह बुला देती, कभी उसे चुनरी ठीक करके देती, कभी उसकी चोटी गूँथ देती। पहले जो भ्रम और उलझन थी, उसकी जगह धीरे-धीरे एक स्वीकृति ने ले ली।
राजश्री सोचती, “शायद भगवान ने मुझे बेटी नहीं दी… लेकिन शायद मेरी बेटी मेरे बेटे के अंदर ही छुपी थी।”
Part 5
राजश्री कई दिनों से बेचैन थी। किरण की इच्छा ने उसे झकझोर दिया था।
“क्या यह सिर्फ़ उसका मन है, या उसके शरीर में भी कोई बदलाव है?”
आख़िरकार, उसने किरण को लेकर एक मनोचिकित्सक (psychiatrist) से परामर्श लेने का निर्णय लिया।
जाँच-पड़ताल और बातचीत के बाद डॉक्टर ने धीरे से कहा –
“आपका बेटा… नहीं, आपका बच्चा, लगभग 75% महिला हार्मोन लिए हुए है। यानी उसके अंदर स्त्रीत्व सिर्फ़ मानसिक नहीं, शारीरिक रूप से भी गहरा है। यह कोई बीमारी नहीं है, यह उसकी असली पहचान है।”
राजश्री के कानों में यह शब्द गूंजते रहे। बाहर निकलकर वह लंबे समय तक चुप रही। उसके मन में डर भी था, समाज की चिंता भी… पर साथ ही एक गहरी करुणा भी।
“मेरा किरण… उसे कितनी मुश्किलें झेलनी होंगी। यह रास्ता कठिन है। पर अगर मैं ही उसके साथ न रही तो वह अकेला पड़ जाएगा।”
उस रात उसने किरण को पास बुलाया।
“किरण,” उसने आँखों में आँसू लिए कहा, “मुझे अब सब समझ में आ रहा है। तेरे लिए ज़िंदगी आसान नहीं होगी… लेकिन मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी। अगर तू लड़की बनकर जीना चाहता है, तो मैं तेरे साथ रहूँगी।”
किरण की आँखें भर आईं। उसने माँ को कसकर गले लगा लिया।
“माँ, तुमने मुझे स्वीकार किया… मुझे अब डर नहीं लगता।”
दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उस पल माँ-बेटे का रिश्ता बदलकर माँ-बेटी के गहरे बंधन में ढल गया।
No comments yet.