मेरे जीवन में हमेशा एक ही समीकरण काम करता था: सीधापन बराबर आसानी. बीस साल की उम्र तक मेरी दुनिया कोटा के उन दो कमरों तक ही सीमित थी, जहाँ मैं अपनी बहन नदिया और पत्नी स्नेहा के साथ रहता था. तब तक मेरा सबसे बड़ा रोमांच बस स्टैंड से लौटते समय गलती से रिक्शा वाले को पचास रुपये ज़्यादा दे देना था. लेकिन जब गोवा की फैमिली ट्रिप कैंसिल हो गई और नदिया ने पास के शहर रावतभाटा जाने का प्लान बनाया, तो मुझे लगा कि शायद ज़िंदगी में थोड़ी उत्तेजना ठीक भी है. मैंने एक पुरानी टैक्सी किराए पर ली, जिसकी सीटों पर सिंथेटिक लेदर उधड़ रहा था और डैशबोर्ड पर गणेशजी की मूर्ति के नीचे टेप लगा हुआ था.
रावतभाटा का रास्ता शुरू से ही खतरनाक था. जैसे-जैसे टैक्सी आगे बढ़ी, जंगल का घनापन बढ़ता गया, मानो कोई हरा साया धीरे-धीरे हम पर छा रहा हो. पक्की सड़क कच्ची पगडंडी में बदल गई, जहाँ गड्ढे इतने गहरे थे कि टैक्सी का सस्पेंशन हर झटके पर चीख़ उठता था. स्नेहा ने बैकसीट से चिपककर मेरा हाथ पकड़ लिया, "यार, तुमने ऐसी टैक्सी क्यों ली? लगता है किसी भी मिनट गिर जाएगी!" मैंने स्टीयरिंग को कसकर पकड़ा, मेरी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं. वही मेरा पुराना सीधापन - मैंने ड्राइवर को टोकने की हिम्मत नहीं की, जो गाने पर ताली बजाते हुए बेपरवाही से गाड़ी चला रहा था.
तभी आसमान फट पड़ा. बारिश की बूँदें टैक्सी की छत पर ऐसे गिरीं जैसे कोई पत्थर बरसा रहा हो. पानी का एक झोंका खिड़की से अंदर आया और मेरे चेहरे पर जा लगा. ड्राइवर ने जल्दी से खिड़की बंद की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. टैक्सी की छत से पानी की एक धार सीधे मेरे सिर पर टपकने लगी - टप... टप... टप. मैंने ऊपर देखा तो छत पर रस्सी से बँधा मेरा कपड़ों का बैग भीग रहा था. "अरे नहीं!" मेरी आवाज़ घबराहट में डूब गई. एक ज़ोरदार झटके के साथ टैक्सी एक गड्ढे में गिरी और बैग की गाँठ खुल गई. बैग उछलकर सीधे सड़क पर जा गिरा और तुरंत कीचड़ में गायब हो गया.
मेरा दिल बैठ गया. मैं पीछे मुड़ा तो नदिया और स्नेहा की चिंतित आँखें मुझे घूर रही थीं. "भैया, तुम्हारा सारा कपड़ा!" नदिया ने खिड़की से झाँककर कहा. स्नेहा के होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी, जैसे वह इस अजीब हालात को पचाने की कोशिश कर रही हो. मैंने ड्राइवर को रुकने के लिए कहा, लेकिन मेरी आवाज़ बारिश के शोर में दब गई. टैक्सी तेज़ी से भाग रही थी, और मेरा बैग पीछे कीचड़ में डूबा एक छोटा सा धब्बा बनकर रह गया. मैंने अपनी ओर देखा - मेरी सफ़ेद बनियान और निकर पूरी तरह भीग चुकी थी और शरीर से चिपक रही थी. ठंडी हवा का झोंका आया तो मुझे एक अजीब सी कंपकंपी महसूस हुई.
टैक्सी अचानक रुकी. ड्राइवर ने बाहर झाँककर कहा, "साहब, आगे रास्ता टूट गया है. बारिश ने सब बहा दिया. यहीं रुकना पड़ेगा." उसने इंजन बंद कर दिया. चारों तरफ़ सिर्फ़ जंगल की घनी हरियाली और बारिश का शोर था. मैंने खुद को सिकोड़ लिया. मेरी निकर इतनी भीगी हुई थी कि वह टाँगों से चिपक गई थी और बनियान से मेरे सीने का आकार साफ़ दिख रहा था. ठंड के मारे मेरे दाँत किटकिटा रहे थे. नदिया ने अपने बैग में हाथ डाला और एक लाल रंग की ब्रा और मैचिंग पैंटी निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाई. "भैया, पहन लो ये. तुम्हें निमोनिया हो जाएगा," उसने आँखें मटकाते हुए कहा.
मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया. "अरे... ये क्या?" मैं ऐसे पीछे हट गया जैसे मुझे ज़हर दिया जा रहा हो. मेरी आँखें फैल गईं और हाथ हवा में काँपने लगे. "मैं लड़कियों के कपड़े कैसे पहन सकता हूँ? ये तो..." मेरी आवाज़ घुट गई. नदिया ने आँखें घुमाईं और स्नेहा ने मुस्कुराकर कहा, "पागलपन मत करो. अभी जंगल में कोई देखने वाला भी तो नहीं है." मुझे याद आया कि मेरे स्तन पहले से ही थोड़े बढ़े हुए थे और पाँच फुट पाँच इंच की हाइट भी मुझे शर्मिंदा करती थी. आखिरकार, ठंड और दोनों के ज़ोर देने पर मैं झिझकते हुए ब्रा और पैंटी लेकर टैक्सी से बाहर भागा. पेड़ के पीछे छिपकर मैंने कपड़े बदले. ब्रा का हुक लगाने में मुझे पाँच मिनट लग गए और पैंटी मेरी कमर पर बहुत टाइट थी. जब मैं वापस टैक्सी में लौटा तो मेरे हाथ काँप रहे थे.
फिर स्नेहा ने अपना बैग खोला और एक चमकदार लाल सलवार सूट निकाला. उसने इसे मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, "ये पहनो. ये ब्रा से मैच करेगा." मेरी आँखें फिर से फैल गईं. "बस... बस नहीं हो सकता?" मेरी आवाज़ में गुहार थी. नदिया ने हँसकर कहा, "भैया, तुम्हारे शरीर पर सिर्फ अंडरवियर है. अगर कोई गाँव वाला आ जाए तो?" मैंने कुछ देर लाल कमीज के चमकदार कपड़े को छुआ, फिर झिझकते हुए उसे ले लिया. जब मैं वापस आया तो कुर्ती मेरे सीने पर कसी हुई थी और मेरे छोटे मगर उभरे हुए स्तन साफ़ झलक रहे थे. मैंने अपनी बाँहों को सीने पर कसकर बाँध लिया. मेरी गर्दन और कान शर्म से लाल हो गए थे.
तभी नदिया ने अपनी पर्स से एक लाल जालीदार दुपट्टा se निकाला. "इसे लो भैया. अपने स्तन और सिर ढक लो." मैंने फुर्ती से दुपट्टा पकड़ लिया और तुरंत उसे अपने सिर और छाती पर लपेट लिया, जैसे कोई चोर छिपने की कोशिश कर रहा हो.
अब वे दोनों मुझे औरतों की तरह ट्रीट करने लगीं. स्नेहा ने मेरे गीले बालों को अपनी उँगलियों से सँवारते हुए कहा, "अब तुम्हारा नया नाम सोनिया रखते हैं. देखो न कितनी सुंदर लग रही हो." मैंने मुँह फेर लिया. मेरी आँखों में पानी आ गया. "मत करो ये सब," मैंने फुसफुसाते हुए कहा. लेकिन नदिया ने मेरे गाल पर थपकी दी और हँसते हुए कहा, "चुप रहो सोनिया, मेरी बहन."
तभी दूर से एक कार के हॉर्न की आवाज़ आई. एक सफ़ेद कार हमारी तरफ़ आ रही थी. कार रुकी और उसमें से तीन लड़के उतरे. ड्राइवर सीट से उतरा कैफ़, जिसकी आँखें तुरंत स्नेहा पर टिक गईं. स्नेहा ने मेरी और नदिया की ओर इशारा करते हुए कैफ़ से कहा, "हम यहाँ फँस गए हैं, मेरा नाम स्नेहा है और ये मेरी दोनों बहनें हैं, सोनिया और नदिया." मुझे कैफ़ से चिढ़ होने लगी. मैं जानता था कि वह स्नेहा से फ़्लर्ट कर रहा था. मैंने अपने दुपट्टे को और कसकर खींच लिया. मुझे लगा जैसे मेरी छाती में कुछ भारी सा दब गया हो.
हम अब कैफ़ की कार में बैठ गए. स्नेहा और नदिया पीछे वाली सीट पर बैठीं और मुझे बीच वाली सीट पर बैठाया गया. बीच में बैठने के कारण मुझे अब अपने स्तनों पर हाथ रखने में भी शर्म आने लगी थी. मैं बेचैनी से अपनी सलवार को समेटने लगा. स्नेहा मेरी तरफ़ देख भी नहीं रही थी, वह कैफ़ से बात करने में मग्न थी. मुझे लगा जैसे मैं उसके लिए अब कोई मायने ही नहीं रखता.
कुछ देर में हम सब एक फार्म हाउस पर पहुँच गए.
हमें एक बड़े कमरे में ले जाया गया. स्नेहा ने अपना बैग खोलते हुए मेरी ओर देखा, "आप मेरी काली साड़ी पहन लीजिए. ये सिल्क है, गीली नहीं होगी." मैंने मना करने के लिए मुँह खोला, पर नदिया ने मेरे हाथ से दुपट्टा छीनकर फेंक दिया. फिर स्नेहा ने रेजर से मेरे चेहरे के बाल साफ़ किए, जबकि नदिया ने मेरी ब्रा को एडजस्ट किया. शेव होने पर मेरा चेहरा चमकने लगा. फिर काले ब्लाउज और पेटीकोट के बाद मुझ पर काली साड़ी लपेटी गई. नदिया ने मेरे होंठों पर हल्की लिपस्टिक लगाई और आँखों में काजल लगाया. अब मैं सच में एक सुंदर औरत लग रहा था.
तभी नदिया और स्नेहा ने मेरे सामने ही कपड़े बदले. स्नेहा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "हम सब लड़कियाँ ही तो हैं, हमें कैसी शर्म? अब तो बिल्कुल बहन जैसे लग रहे हो न?" उनकी हँसी कमरे में गूँज उठी. मैंने शीशे में देखा - मेरी परछाई के पीछे दो और औरतें खड़ी थीं. मुझे लगा जैसे कोई दूसरा मेरे शरीर में घुस गया हो. शीशे में सोनिया की आँखों से आँसू छलक रहे थे.
बाहर से दरवाज़े पर दस्तक हुई. कैफ़ का सिर अंदर झाँका, "खाना लग गया है." उसकी आवाज़ में एक चिकनी मिठास थी जो मेरे पेट में मरोड़ सी डाल गई. हम सब नीचे चले गए. मुझे बीच में बैठाया गया, मेरे सामने रोहित था जिसकी आँखें मेरे चेहरे से नीचे मेरी साड़ी के नेकलाइन की ओर सरक रही थीं. मैंने अपनी साड़ी का पल्लू घसीटकर छाती को ढँकने की कोशिश की. अचानक मेरी नज़र टेबल के नीचे गई, जहाँ कैफ़ और स्नेहा के पैर आपस में टकरा रहे थे. मेरे मुँह का स्वाद कड़वा हो गया.
रोहित ने अचानक मेरा हाथ छुआ, "सोनिया जी, आपकी साड़ी बहुत खूबसूरत है." मैंने अपना हाथ ऐसे झटक दिया जैसे कोई कीड़ा चढ़ गया हो. "धन्यवाद," मेरी आवाज़ एकदम बेजान थी. दूसरी तरफ़, कैफ़ ने स्नेहा की थाली में कुछ डालते हुए कहा, "तुम्हारे हाथों की खुशबू तो इत्र से भी ज़्यादा मीठी है." स्नेहा ने शरमाते हुए नीचे देखा.
रात में मैं बिस्तर पर करवटें बदल रहा था. मेरे कानों में कैफ़ के शब्द गूँज रहे थे. आधी रात को जब मैं एक डरावने सपने से चौंककर उठा, तो मैंने महसूस किया कि बिस्तर का दूसरा हिस्सा खाली है. स्नेहा गायब थी. मेरी साँसें तेज़ हो गईं.