दीपक, 17 साल का लड़का था, मुंबई की एक तंग गली में रहता था। बाहर से वह बाकी लड़कों जैसा—स्कूल की वर्दी, गली में क्रिकेट, दोस्तों के साथ ठहाके। लेकिन अंदर से वह अलग था। उसे लड़कियों के कपड़े, मेकअप और उनकी हरकतें पसंद थीं। घर खाली होने पर वह अपनी दीदी रिया की अलमारी से सलवार-कमीज, स्कर्ट, या साड़ी चुपके से पहनता। रिया का मेकअप किट उसका खजाना था—लिपस्टिक, काजल, नेल पॉलिश लगाकर वह शीशे के सामने खड़ा रहता, जैसे वह कोई और हो। उसे लगता था, ये उसका छोटा सा राज है।
एक दोपहर, दीपक ने रिया की गुलाबी अनारकली पहनी, चटक लाल लिपस्टिक, झुमकियाँ, और शीशे के सामने ठुमके लगा रहा था। तभी उसकी माँ, अनीता, कमरे में आ गईं। दीपक का दिल धड़क गया। अनीता ने चिल्लाया, “ये क्या बेशर्मी है? लड़का होकर ये सब?” दीपक सिर झुकाए खड़ा रहा, आँखों में आँसू। उस रात घर में कोहराम मच गया। उसके पिता, संजय, ने गुस्से में कहा, “नामर्द! मोहल्ले में मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा!” पड़ोस के चाचा-चाची ने ताने मारे, “अरे, ये तो हिजड़ा बन गया!” रिया ने बीच-बचाव किया, लेकिन उसे चुप करा दिया गया।
मोहल्ले में बात फैल गई। गली के लड़के चिल्लाते, “दीपाली, लिपस्टिक लगाके आया कर!” स्कूल में दोस्तों ने WhatsApp ग्रुप में उसकी तस्वीर डालकर लिखा, “दीपक अब दीपाली बन गई!” कुछ ने “छक्का” कहकर चिढ़ाया। रिश्तेदारों ने अपमान किया। एक कजिन की शादी में चाचा-ताई ने तंज कसे, “दीपक, दुल्हन बनने लायक है! चल बायली, छम्मक छल्लो पे नाच!” कुछ ने स्टेज पर खींचकर नाचने को कहा। “नामर्द, लड़कियों की नकल करता है! इसे तो लहंगा पहनाके नचवाओ शादियों में” एक चाचा ने नशे में चिल्लाया। दीपक रोता रहा, लेकिन चुप रहा। इतने में चाची ने आके दीपक के हाथों में चूड़ियाँ पहना दी। सब रिश्तेदार हंस रहे थे तभी बुआ ने पर्स से बिंदी निकाल के आईब्रो के बीच में लगा दी और बोली अब अच्छी लग रही है दीपाली चूड़ियाँ बिंदी में। वैसे भी अब इसे दीपक बोलना ठीक नहीं दीपाली ही सूट करता है। मौसी भी कहाँ पीछे रहने वाली थी, उन्होंने भी मौक़े का फ़ायदा उठाते मेरे सामने आके लिपस्टिक लगाने लगी मेरे होठोंपर वह भी पिंक शेड की जो चूड़ियों से मैच हो रहा था। मौसा भी बोले की “वाह अब लग रही है दीपाली प्रॉपर बायली, चूड़ियाँ लिपस्टिक बिंदी में, पर कुछ missing है।” तभी मौसी ने मेरे सिर पर दुपट्टा डाल के मूजे स्टेज पर ले गई और नचवाने लगी। सब लोग चिल्ला रहे थे “दीपाली छक्का … दीपाली छक्का...“ और मेरे पापा शर्म से पानी पानी हो रहे थे।
रिया ने हिम्मत नहीं हारी। उसने माँ को समझाया, “दीपक ऐसा क्यों है, हमें समझना चाहिए।” उसने ट्रांसजेंडर लोगों के बारे में पढ़ा और एक काउंसलर से मिलवाया। दीपक ने बताया, “मुझे हमेशा लगता है कि मैं लड़की हूँ। लड़कियों के कपड़े और मेकअप में सुकून मिलता है।मूजे नाचना पसंद है, और मूजे ना लड़का ना पूरी लड़की बनना है” काउंसलर ने कहा कि दीपक किन्नर हो सकता है। संजय और अनीता को समझने में वक्त लगा, लेकिन रिया और काउंसलर की सलाह पर उन्होंने दीपक को सपोर्ट किया। अनीता ने घर में लड़कियों के कपड़े पहनने की इजाजत दी। रिया ने अपनी ड्रेसेज और मेकअप टिप्स दिए। दीपक ने बाल बढ़ाए और नाम “दीपाली” ही रख लिया जो उसकी बुआ ने रखा था उसका कजिन की शादी में।
बाहर की दुनिया क्रूर थी। गली में स्कर्ट पहनकर निकली, तो लड़के चिल्लाए, “दीपक छक्का बन गई! बाजार में नाच!” कुछ ने कपड़े खींचे तो किसी ने छाती दबाई। पड़ोस की औरतें फुसफुसातीं, “संजय का लड़का बिगड़ गया।” रिश्तेदारों की पार्टी में चचेरे भाई ने चिढ़ाया, “दीपाली, ठुमका लगा!” कुछ ने फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर डाल दी, गंदे कमेंट्स के साथ। स्कूल में टीचर ने कहा, “ये ड्रामेबाजी बंद कर, वरना निकाल देंगे।” लेकिन दीपाली ने हार नहीं मानी। रिया और कुछ दोस्तों ने हिम्मत दी। एक स्कूल इवेंट में उसने लहंगा पहनकर डांस किया। कुछ हँसे, कुछ ने तालियाँ बजाईं।
समय बीता। दीपाली ने हार्मोन थेरेपी शुरू की, उसका शरीर उसकी आत्मा से मेल खाने लगा। पढ़ाई पूरी कर वह मेकअप आर्टिस्ट बनी। रिया की दोस्त, कावेरी, से उसकी मुलाकात हुई। कावेरी टॉमबॉय थी—छोटे बाल, जींस-शर्ट, बाइक चलाने वाली। वह दीपाली की हिम्मत से प्रभावित हुई। उनकी दोस्ती प्यार में बदली। कावेरी ने कहा, “तू जैसी है, मुझे वैसी ही अच्छी लगती है।” और मूजे पहले से ही ऐसे नामर्द टाइप लड़का ही चाहिए था जो मेरी बीवी बनके रहे। तुम्हें में लड़की की तरह रखूँगी और तेरे सपने पूरे करूँगी। कावेरी के परिवार ने दीपाली को अपनाया। दोनों की शादी हुई। दीपाली ने लाल जोड़ा, मांग में सिन्दूर, मेहंदी, और बिन्दी के साथ दुल्हन बनी। कुछ रिश्तेदारों ने ताने मारे, “लड़का दुल्हन कैसे बन गया?” लेकिन कावेरी ने कहा, “तू मेरी दुल्हन है, मुझे तुझ पर गर्व है।”
शादी के बाद दीपाली कावेरी के ससुराल चली गई। वह गृहिणी बन गई। रोज सुबह साड़ी पहनती—कभी नीली, कभी गुलाबी, चूड़ियाँ, बिन्दी, और हल्का मेकअप। वह सास-ससुर की सेवा करती—चाय बनाना, घर साफ करना, खाना पकाना। सास, शीला, को पहले अजीब लगा, लेकिन दीपाली के प्यार और सेवा ने उनका दिल जीत लिया। ससुर, राकेश, ने कहा, “बेटी, तूने घर को रोशनी दी।” दीपाली रोज कावेरी के लिए पराठा, दाल-रोटी, और उसकी पसंद की सब्जी बनाती। कावेरी ऑफिस जाती, और दीपाली घर संभालती। कावेरी दीपाली की साड़ी और चूड़ियों की खनक पर फिदा थी।
मोहल्ले में ताने मिलते। पड़ोस की औरतें फुसफुसातीं, “कावेरी ने लड़के को बहू बनाया?” रिश्तेदारों ने बर्थडे पार्टी में चिढ़ाया, “दीपाली, छमियाँ वाला ठुमका दिखा!” कुछ ने नवजात बच्चों के फंक्शन में बुलाकर कहा, “दीपाली नाच और बधाई दे! वैसे भी तू है तो हिजड़ा ही, और तुम्हारा आशीर्वाद भगवान सुनता है।” दीपाली ने ना सिर्फ़ नाचा पर ताली बजाके आशीर्वाद दुआ दी। घर पे आकर कावेरी को बताया। कावेरी ने दीपाली को प्रोत्साहित किया, “तू छक्का है, ये तेरी ताकत है।” दीपाली ने किट्टी पार्टियों में जाना शुरू किया, साड़ी और मेकअप में सजकर। कुछ औरतें अजीब नजरों से देखतीं, लेकिन कुछ ने अपनाया। फंक्शन्स में वह नाचती, ताली बजाती, और बधाई देती। लोग तालियाँ बजाते। कावेरी कहती, “अपने डांस और ताली से बता कि तू कितनी खास है।”
शादी के कुछ साल बाद, कावेरी को घर में अकेले बोरियत होने लगी। बच्चे पैदा न कर पाने की कमी उसे उदास करती। वह सोचती, “काश, मेरा भी बच्चा होता।” कावेरी ने उसकी उदासी देखी और पूछा, “दीपाली, क्या बात है?” दीपाली ने कहा, “घर में अकेले रहना खलता है।” कावेरी ने सुझाव दिया, “कुछ काम शुरू कर।” दीपाली ने कहा, “मैंने ज्यादा पढ़ाई नहीं की, नौकरी कहाँ मिलेगी?” कावेरी ने पड़ोसियों और दोस्तों से बात की, और दीपाली के लिए घरेलू काम का इंतजाम किया। दीपाली ने पड़ोस के घरों में दोपहर को काम शुरू किया—झाड़ू-पोछा, बर्तन धोना, कपड़े धोना, और प्रेस करना। वह साड़ी पहनकर, चूड़ियाँ खनकाती, मेकअप में काम पर जाती। कुछ पड़ोसी ताने मारते, “हिजड़ा से घर में काम करवाते हो?” लेकिन कई लोग दीपाली की मेहनत से खुश थे। इस काम से दीपाली को पैसे मिलने लगे और वक़्त कटने लगा।
एक दिन, दीपाली की मुलाकात एक ट्रांसजेंडर टोली से हुई। वे शादियों में ग्रुप डांस करते और बधाई माँगते थे। टोली के गुरु ने दीपाली को देखा और कहा तुम भी हमारी जैसी हो। कभी मन हो तो मिलने आना। और अपना फ़ोन नंबर आपस में शेयर किया । दीपाली कभी कभी उनसे बातें करती और कभी मिलने जाती । धीरे धीरे दीपाली उनके साथ कभी मार्केट तो कभी उनके घर आने जाने लगी। कभी शादी की सीजन में टोली में मेम्बर कम पड़ते तो दीपाली को बुला लेते नाचने और बधाई माँगने जाने। अब दीपाली साड़ी और मेकअप में शादियों में नाचती, ताली बजाती, और बधाई देती। कुछ लोग तारीफ करते, तो कुछ ताने मारते, “हिजड़े आ गए!” कभी-कभी वे ट्रैफिक सिग्नल पर भी जाते, जहाँ लोग पैसे देते, लेकिन गालियाँ भी पड़तीं। दीपाली को ये काम आत्मविश्वास देता। वह कहती, “मैं जो हूँ, उसी में खुश हूँ।”
दीपाली ने कावेरी से दिल की बात कही, “मैं सिर्फ गृहिणी नहीं, बल्कि एक किन्नर की तरह जीना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे छक्का, किन्नर, या बायली के रूप में जानें, न कि सिर्फ एक फेमिनिन पुरुष के रूप में। मुझे टोली के साथ और वक्त बिताना है, उनके साथ फंक्शन्स में जाना है, बधाई माँगना है।” कावेरी ने गले लगाकर कहा, “दीपाली, तू जो है, वही तेरा गर्व है। मैं तुझे पूरी तरह सपोर्ट करूँगी। तू अपनी किन्नर पहचान को गर्व से जियो।”
कावेरी ने टोली की गुरु, रानी माई, से बात की और कहा, “दीपाली को अपने साथ ले जाओ। उसे ढोलक पर डांस, ताली बजाना, और बधाई माँगने की पूरी ट्रेनिंग दो। उसे एक परफेक्ट किन्नर बनने में मदद करो।” रानी माई ने दीपाली को अपना चेला बनाया, और सिमरन गुरु का नाती चेला बनाया। दीपाली अब रोज टोली के साथ ट्रेनिंग के लिए जाने लगी। रानी माई ने उसे ढोलक की थाप पर नाचना, ताली बजाने का अंदाज, बधाई माँगने की कला, और किन्नर समुदाय की परंपराएँ सिखाईं। कावेरी ने एक फंक्शन का आयोजन किया, जिसमें दीपाली को रानी माई का चेला बनाया गया। रानी गुरु ने मेरा नाम निशा किन्नर रखा । निशा ने भारी मेकअप, साड़ी, और गहनों में सजकर रानी माई को गुरु माना। रानी माई ने आशीर्वाद दिया, “तू अब हमारी टोली की किन्नर है। गर्व से जियो। और मूजे नथ पहनाई”
कावेरी ने मोहल्ले की औरतों से कहा, “निशा किन्नरको किट्टी पार्टियों में बुलाओ। उसे बच्चों के जन्मदिन और शादियों में बधाई नाच और आशीर्वाद के लिए बुलाओ। अब से सब उसे ‘बायली’ या ‘किन्नर’ या ‘छक्का’ कहकर बुलाओ, क्योंकि यही उसकी असल पहचान है।” मोहल्ले की कुछ औरतें हिचकिचाईं, लेकिन कावेरी की बात मानकर निशा को किट्टी पार्टियों में शामिल करने लगीं। निशा साड़ी, चूड़ियाँ, और मेकअप में सजकर जाती। लोग उसे “बायली निशा” /“मौसी”/“छक्का” कहकर बुलाने लगे। बच्चों के जन्मदिन और शादियों में उसे खास तौर पर बुलाया जाता। वह ढोलक की थाप पर नाचती, ताली बजाती, और बधाई देती। लोग उसकी कला की तारीफ करते, और निशा को अपनी किन्नर पहचान पर गर्व महसूस होता।
एक दिन, कावेरी ने निशा से कहा, “मेरे बॉस की बर्थडे पार्टी है। तू वहाँ लहंगा-चोली पहनकर आइटम डांस कर। बॉस खुश होंगे, तुझे पैसे मिलेंगे, और मुझे ऑफिस में अच्छा अप्रेजल मिलेगा।” निशा को ये आइडिया पसंद आया। उसने चमकीली हरी लहंगा-चोली पहनी, भारी मेकअप किया, चूड़ियाँ, झुमकियाँ, और माथे पर बिन्दी लगाई। पार्टी में उसने “चिकनी चमेली” और “जलेबी बाई” पर जोरदार डांस किया। ढोलक की थाप पर उसके ठुमके और ताली की गूंज से माहौल झूम उठा। कावेरी का बॉस इतना खुश हुआ कि उसने निशा पर नोटों की बारिश कर दी। लोग चिल्लाए, “वाह, बायली निशा!” वह परफॉर्मेंस पार्टी की शान बन गई। कावेरी को अप्रेजल में फायदा हुआ, और निशा को ढेर सारे पैसे मिले। उसे अपनी किन्नर पहचान को इस तरह चमकते देख दिल से खुशी हुई।
इसके बाद निशा का डांस प्रोग्राम कावेरी की ऑफिस गैदरिंग्स का रिवाज बन गया। कावेरी के ऑफिस के लोग और मोहल्ले वाले उसे शादियों, जन्मदिनों, और ऑफिस पार्टियों में बुलाने लगे। वह लहंगा-चोली या साड़ी में सजकर, ढोलक की थाप पर नाचती, ताली बजाती, और बधाई देती। लोग उसे “हसीना हिजड़ा”, “ब्यूटीफुल बायली”, और “छक्का” कहकर चिढ़ाते, लेकिन निशा को ये नाम अब पसंद थे। वह हँसकर कहती, “हाँ, मैं बायली हूँ, और मुझे इस पर गर्व है!” लोग उसकी बेबाकी और कला की तारीफ करते। कुछ ताने मारते, लेकिन निशा अब इन बातों को हँसकर टाल देती।
ट्रैफिक सिग्नल पर ताली बजाकर बधाई माँगते वक्त कई बार मर्द उसे छेड़ते। कुछ गंदी नजरों से देखते और कहते, “अरे, ये तो प्रॉस्टिट्यूट है!” पहले निशा को ये बातें चुभती थीं, लेकिन अब वह इनका जवाब ताली बजाकर देती, “20 रुपये दे, आशीर्वाद ले! धंधे का टाइम खराब मत कर!” रात को वह कावेरी को बताती, “आज इतने पैसे मिले।” कावेरी उसे हौसला देती, “निशा, तू बहुत हिम्मतवाली है। मुझे तुझ पर गर्व है।”
एक दिन निशा ने कावेरी से कहा, “सिग्नल पर बधाई माँगने और फंक्शन्स में नाचने से इतने पैसे नहीं मिलते कि मैं अपने सपने का घर बना सकूँ। मैं रात को दूसरी किन्नरों के साथ डांस बार में जाना चाहती हूँ। वहाँ कस्टमर बार गर्ल्स को अच्छे पैसे देते हैं।” कावेरी ने गंभीरता से सुना और कहा, “निशा, कोई काम छोटा नहीं होता। अपने सपनों के लिए मेहनत कर। डांस बार में नाचना भी पैसे कमाने का एक रास्ता है। बस प्रोटेक्शन का ध्यान रख।” कावेरी को खुशी थी कि निशा अब पूरी तरह किन्नर की तरह जी रही है और उनकी तरह कमाई कर रही है। निशा अब दिन रात काम करती और पैसे जमा करने लगी। इन पैसों से उसने एक कमरे का रूम लिया कुछ डाउनपेमेंट करके और बाक़ी किश्त करवा ली। पर उस पर बिजली गिरी जब सरकार ने डांस बार में नाचना बंध करवा दिया । अब घर कि किश्त के लिए पैसे कम पड़ने लगे । अब निशा रात को टोली की दूसरी किन्नरों के साथ हाईवे पर जाती, जहाँ वह आत्मविश्वास से काम करती। ट्रक ड्राइवर्स को ट्रक के साइड में ले जाके खुश करती। उसे अच्छी कमाई होने लगी, और वह अपने सपने के करीब पहुँच रही थी।
निशा अब सुबह ससुराल का काम करती, दोपहर को पड़ोस में घरेलू काम, शाम को टोली के साथ फंक्शन्स या सिग्नल पर, और रात को हाईवे पर। वह साड़ी, चूड़ियाँ, और मेकअप में चमकती। मोहल्ले के ताने, रिश्तेदारों की हँसी, और अपमान अब उसे कम चुभते। कावेरी का प्यार, ससुराल का सपोर्ट, और टोली की बहनें उसकी ताकत थीं। निशा ने अपनी किन्नर पहचान को पूरे गर्व से अपनाया। वह कावेरी की आज्ञाकारी पत्नी थी, ससुराल की सेवा करती, पड़ोस में काम करती, टोली के साथ नाचती, और हाईवे पर कमाई करती। उसकी कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा बन गई, जो अपनी पहचान छिपाकर जीते हैं। निशा ने सिखाया कि किन्नर होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक गर्व की बात है।
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