रामपुर शहर के एक छोटे से मोहल्ले में सागर और रानू की जोड़ी मशहूर थी। सागर जी वैसे तो सीधे-सादे सरकारी दफ्तर के बाबू थे, लेकिन सागर की दोस्ती रानू के सामने उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम रहती थी। रानू तेज-तर्रार और हमेशा कुछ न कुछ खुराफात सोचने वाली महिला थी। उसकी सबसे पक्की सहेली, पिंकी, शहर के दूसरे कोने में रहती थी और उसकी बेटी की शादी पक्की हुई थी।
पिंकी ने रानू को फोन पर बड़ी चुनौती दी थी, “देख रानू, मेरी बेटी की शादी में नाच-गाने की महफिल जमेगी। तू तो बस ऐसे ही चली आएगी, कुछ धमाकेदार करके दिखा तो जानूं!”
रानू को यह बात लग गई। उसने सागर की तरफ देखा, जो सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। सागर जी कद में थोड़े छोटे थे, लेकिन शरीर से दुबले-पतले थे। रानू के दिमाग में एक बिजली-सा विचार कौंधा। वह मुस्कुराई और सागर के पास जाकर बैठ गई।
“सागर जी, एक बहुत जरूरी काम है,” रानू ने मक्खन लगाते हुए कहा।
सागर ने अखबार से नजरें हटाए बिना कहा, “बोलो, क्या फरमाइश है अब?”
“फरमाइश नहीं, एक बहुत बड़ा नेक काम है। मेरी सहेली पिंकी की बेटी की शादी है, और उसने मुझे चुनौती दी है। आपको बस एक छोटा सा रोल निभाना है,” रानू ने सस्पेंस बनाते हुए कहा।
सागर चौंके, “रोल? कैसा रोल?”
रानू ने फुसफुसाकर कहा, “आपको पिंकी के घर जाकर ‘नाच’ करना है। लेकिन… हिजड़ा बनकर!”
सागर के हाथ से अखबार छूट गया। “क्या! पागल हो गई हो क्या? मैं? हिजड़ा? और वो भी नाचने के लिए? कभी नहीं!”
रानू ने अपना ब्रह्मास्त्र निकाला, “अरे, बस कुछ घंटों की तो बात है। मुंह पर इतना मेकअप होगा, और घूंघट, कि कोई पहचान ही नहीं पाएगा। और तो और, पिंकी के घर में सब महिलाएं ही होंगी। आपको बस ताली बजानी है और थोड़ा मटकना है। अगर आपने यह कर दिया, तो मैं पूरे एक महीने तक आपकी हर बात मानूँगी। कसम से!”
“एक महीने तक?” सागर को लालच आ गया। वो रानू की ‘खिच-खिच’ से थोड़े तंग आ चुके थे।
आधे घंटे की बहस और रानू की कसमों-वादों के बाद, सागर जी आखिरकार राजी हो गए।
शुरू हुई तैयारी। रानू ने अपनी सबसे तड़क-भड़क वाली साड़ी निकाली – चटख लाल रंग की, जिस पर सुनहरी गोटे लगे थे। सागर को साड़ी पहनाना एक बड़ा टास्क् था। रानू कभी पल्लू सही करती, तो कभी प्लेट्स। सागर साड़ी में ऐसे लग रहे थे जैसे कोई खंभा कपड़ों में लिपटा हो।
फिर बारी आई मेकअप की। रानू ने अपने सारे सौंदर्य प्रसाधन सागर के चेहरे पर थोप दिए। आँखों में गाढ़ा काजल, गालों पर गुलाबी रूज, और होंठों पर ऐसी सुर्ख लाल लिपस्टिक कि सागर खुद को आईने में देखकर डर गए। सिर पर विग लगाई गई, जिस पर बड़ा-सा जूड़ा बना था। और सबसे जरूरी – एक लंबी, भारी-भरकम घूंघट वाली ओढ़नी।
“अब ताली बजाना सीखो,” रानू ने निर्देश दिया।
सागर ने धीरे से ताली बजाई, “थप… थप…”
“अरे, ऐसे नहीं! जोर से, मर्दाना अंदाज में! ऐसे!” रानू ने जोर से ताली बजाकर दिखाया, “तड़ाक! तड़ाक!”
सागर ने कोशिश की। कुछ देर की प्रैक्टिस के बाद, सागर – ‘‘विद्या जान’ के रूप में तैयार थे। रानू ने उन्हें एक बड़ा-सा ढोलक भी थमा दिया।
शाम को, रानू अपनी सहेलियों के साथ पिंकी के घर पहुँची। पिंकी का घर रोशनी से जगमगा रहा था और वहां औरतों का हुजूम था। नाच-गाना चालू था।
तभी रानू ने ऐलान किया, “अरे पिंकी, सुन! मैंने कहा था न, कुछ धमाकेदार होगा। ये देख, मैं अपने साथ शहर की सबसे मशहूर ‘‘विद्या जान’ और उनकी टोली को लाई हूँ!”
सबकी नजरें दरवाजे पर टिकीं। वहां ‘‘विद्या जान’ खड़ी थी, सिर से पांव तक ढकी हुई, हाथ में ढोलक थामे। उनके पीछे रानू की कुछ और सहेलियां भी हिजड़ों के वेश में थीं।
पिंकी खुश हो गई, “अरे वाह रानू! तूने तो कमाल कर दिया! आइए, ‘विद्या जान, आइए!”
‘‘विद्या जान’ ने अपनी भारी आवाज में (जो घूंघट के कारण और भी दबी हुई लग रही थी) कहा, “बधाई हो, बधाई हो! पिंकी बहन, बधाई हो!”
रानू कोने में खड़ी होकर अपनी ‘कलाकारी’ देख रही थी और अपनी हंसी दबाने की कोशिश कर रही थी।
ढोलक बजना शुरू हुआ। ‘विद्या जान’ ने नाचना शुरू किया। सागर ने साड़ी में संतुलन बनाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनके कदम लड़खड़ा रहे थे। वो अजीब तरह से मटक रहे थे, जैसे कोई ऊंट डांस कर रहा हो। कभी उनका घूंघट खिसक जाता, तो रानू की सहेलियां दौड़कर उसे सही करतीं।
“वाह! ‘विद्या जान क्या नाचती है!” पिंकी की चाची ने तारीफ की, “थोड़ा और मटक के दिखाओ ना!”
‘‘विद्या जान’ ने और जोर से ताली बजाई, “तड़ाक! तड़ाक!” और गोल-गोल घूमने लगी। उनकी साड़ी का पल्लू हवा में लहराने लगा। एक बार तो वो घूमते-घूमते पिंकी के पति से टकराते-टकराते बचीं, जो गलती से उस कमरे में आ गए थे।
पिंकी के पति ने विद्या जान’ को देखा और सहम गए। “अरे बाप रे! ये कौन है?”
“अरे, ये विद्या जान’ है, नाचने आई है,” पिंकी ने हंसते हुए कहा।
‘‘विद्या जान’ ने पिंकी के पति की तरफ देखकर आंख मारी (जो घूंघट के कारण किसी को दिखी नहीं, सिर्फ सागर को लगा कि उन्होंने आंख मारी है)।
महफिल पूरी शबाब पर थी। रानू अपनी सहेलियों के साथ ‘‘विद्या जान’ के डांस का मजा ले रही थी। सागर पूरी जान लगाकर नाच रहे थे, इस उम्मीद में कि यह सब जल्दी खत्म हो और वो घर जाकर साड़ी उतार सकें।
तभी, नाचते-नाचते ‘‘विद्या जान’ का पैर एक दरी में फंस गया और वो सीधे फर्श पर धड़ाम से गिर पड़ीं!
सब सन्न रह गए। “अरे! विद्या जान!”
रानू का दिल हलक में आ गया। ‘अगर घूंघट उठ गया तो सब खत्म!’
रानू दौड़कर ‘‘विद्या जान’ के पास पहुँची। उसने विद्या जान’ को उठाने का नाटक किया और धीरे से फुसफुसाया, “गिर गए? लगे रहो, लगे रहो! राज नहीं खुलना चाहिए!”
सागर ने दर्द से कराहते हुए भी ‘‘विद्या जान’ का किरदार नहीं छोड़ा। वो उठकर बैठीं और ताली बजाते हुए बोलीं, “अरे, ये तो हमारी खुशी का तरीका है! नाचते-नाचते गिरना, फिर उठना! यही तो जिंदगी है!”
सबने तालियां बजाईं। “वाह! क्या बात है ‘‘विद्या जान’!”
कुछ देर और नाच-गाना चला। ‘‘विद्या जान’ ने दूल्हे-दुल्हन को दुआएं दीं और नेग (पैसे) मांगे। पिंकी ने उन्हें दिल खोलकर पैसे दिए।
आखिरकार, प्रोग्राम खत्म हुआ। रानू और ‘‘विद्या जान’ (सागर) घर वापस आए।
घर में घुसते ही ‘‘विद्या जान’ ने सबसे पहले विग उतारी और साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा पोंछा। लिपस्टिक पूरे चेहरे पर फैल गई थी, जिससे वो किसी जोकर से कम नहीं लग रहे थे।
“ओह गॉड! मेरी कमर टूट गई सागर सोफे पर गिरते हुए बोले।
रानू हंसते-हंसते लोटपोट हो रही थी। “मान गए! क्या नाच था! पिंकी तो एकदम फिदा हो गई विद्या जान पर।”
सागर ने मेकअप से सना चेहरा ऊपर उठाया, “विद्या जान न तो ठीक है, लेकिन अब मेरी शर्त का क्या? एक महीने तक मेरी हर बात मानोगी?”
रानू ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल! ‘विद्या जान’ की हर बात सिर आँखों पर। लेकिन पहले जाओ और ये भूत जैसा चेहरा धोकर आओ।”
सागर आईने की तरफ बढ़े और अपने ‘विद्या जान’ वाले रूप को देखकर खुद भी मुस्कुरा दिए। यह एक ऐसा कारनामा था, जो रामपुर के इतिहास में तो नहीं, लेकिन सागर और रानू की जिंदगी में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। पिंकी के घर में किसी को भी कभी भनक नहीं लगी कि वो ‘विद्या जान’ असल में रानू के सीधे-सादे दोस्त, सागर जी थे।
Lover · Hindi
सागर से विद्या जान हिजड़ा बनना
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