Girlfriend · Hindi

मेरा मीठा बदला

In Progress | Part 2 of 2 | 0 Likes

Part 2

उस अंधेरी गली की नमी और सड़न मेरी इंद्रियों को और ज्यादा उत्तेजित कर रही थी। उस दाढ़ी वाले शख्स ने मेरा हाथ इतनी जोर से पकड़ा था कि मेरी कलाई पर उसकी उंगलियों के निशान छप गए थे। मुझे वह दर्द पसंद आ रहा था। मैं अब वो ladka नहीं था, वह सीधा-सादा लड़का मर चुका था। अब मैं अंकिता थी—एक ऐसी औरत जिसकी रगों में वासना का ज़हर दौड़ रहा था। मेरी रेशमी साड़ी का पल्लू पूरी तरह गिर चुका था, और मेरा भारी सीना उस ढीले ब्लाउज के अंदर छटपटा रहा था।
उसने मुझे दीवार से सटा दिया। उसकी सांसों की गर्म भाप मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी आंखों में एक ऐसा भूखापन था जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
"तुम जानती हो तुम कितना बड़ा पाप कर रही हो? इस वक्त, इस जगह?" उसकी आवाज़ भारी थी, जैसे कोई पत्थर घिस रहा हो।
मैंने अपनी कमर को उसके कूल्हों से सटाया और अपनी गीली चूत की रगड़ उसे महसूस करवाई। मैंने उसके कान के पास जाकर धीरे से फुसफुसाया।
"पाप में ही तो असली मज़ा है, जनाब। क्या आपकी इबादत आपको इस प्यास से बचा पाएगी?"
उसने बिना एक पल गंवाए मेरा चेहरा अपने हाथों में जकड़ा और मेरे होंठों को ऐसे चूम लिया जैसे वह उन्हें निगल जाना चाहता हो। उसकी ज़बान मेरी ज़बान से टकराई, और लार का एक चिपचिपा तार हमारे बीच बन गया। वह मुझे बुरी तरह चूस रहा था, और मैं उसकी इस आक्रामकता में डूबती जा रही थी। उसने मेरा हाथ नीचे ले जाकर अपनी पैंट के उभार पर रखा। उसका लंड पत्थर की तरह सख्त हो चुका था, जो कपड़े के अंदर भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था।
"ओह खुदा... यह कितना बड़ा है," मैंने आह भरते हुए कहा।
उसने एक झटके से मेरी साड़ी नीचे खींच दी। मेरे पैर कांप रहे थे। उसने मेरी जांघों के बीच अपना हाथ डाला और मेरी चूत की गीलेपन को महसूस किया। वह इतना गीला था कि उसकी उंगलियां वहां फिसल रही थीं।
"तुम तो पूरी तरह से भीगी हुई हो, अंकिता। क्या तुम इतनी ही भूखी हो?" उसने शरारत से पूछा।
"मुझे बस आपका वह बड़ा लंड चाहिए। मुझे अंदर तक भर दीजिए," मैंने कराहते हुए कहा।
उसने अपनी पैंट उतारी और उसका वह विशाल, काला और नसदार लंड बाहर कूद गया। वह सच में अद्भुत था। उसकी लंबाई और मोटाई देखकर मेरी सांसें थम गईं। मैंने झुककर उसके लंड के ऊपरी हिस्से को अपनी जीभ से चाटा। प्री-कम का नमकीन स्वाद मेरी जीभ पर फैला। मैंने उसे अपने मुंह में लिया, और उसका मोटा सर मेरे गले के पिछले हिस्से तक जा पहुंचा।
"उह्ह... अंकिता! तुम तो कमाल की रंडी हो," उसने मेरी जुल्फों को खींचते हुए कहा।
मैंने उसका लंड पूरी ताकत से चूसना शुरू किया। सक्शन की आवाज़ें—श्लूप, श्लूप—पूरी गली में गूँज रही थीं। उसने मुझे अचानक ऊपर उठाया और मेरी टांगों को अपने कंधों पर रख दिया। उसने एक ही जोरदार झटके के साथ अपना मोटा लंड मेरी चूत के अंदर उतार दिया।
"आह्ह्ह्ह!" मैं चीख पड़ी।
वह इतना बड़ा था कि मुझे लगा मेरी चूत फट जाएगी। वह मेरे गर्भाशय के मुहाने, मेरे सर्विक्स से जोर से टकराया। वह अहसास इतना तीव्र था कि मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। वह बिना रुके, जानवरों की तरह मुझमें घुसने लगा। हर धक्के के साथ मेरी जांघें हिल रही थीं और हमारे शरीर के टकराने की आवाज—थप, थप, थप—एक लय बना रही थी।
"कहो, कैसा लग रहा है? इस मुस्लिम लंड की गर्मी कैसी है?" उसने हांफते हुए पूछा।
"बहुत... बहुत शानदार! मुझे और जोर से मारो! मुझे पूरी तरह से भर दो!" मैं पागलों की तरह चिल्ला रही थी।
वह पूरी ताकत से मुझमें धंस रहा था। उसकी अंडकोश मेरी खाल पर जोर-जोर से थप्पड़ मार रहे थे। चूत के अंदर लंड के घिसने की आवाज़—स्क्वेल्च, स्क्वेल्च—साफ सुनाई दे रही थी। जब वह अपनी पूरी लंबाई अंदर डालता, तो मुझे ऐसा लगता जैसे मैं पूरी की पूरी भर गई हूँ। अचानक, उसने मेरी कमर को कसकर पकड़ा और एक आखिरी, गहरे धक्के के साथ अपने सारे गर्म वीर्य की धार मेरी चूत के अंदर छोड़ दी।
"उह्ह्ह... आआह्ह!" वह तड़प कर रुक गया।
मैं भी चरम सुख की लहरों में डूबी हुई थी। मेरी चूत उसके वीर्य से लथपथ होकर बाहर बह रही थी। वह लंड धीरे-धीरे बाहर निकला, जिससे एक वैक्यूम की आवाज़ आई। मैं दीवार के सहारे धीरे से नीचे फिसल गई, मेरी सांसें अभी भी तेज थीं।
उसने अपनी पैंट ठीक की और मेरी ओर देखकर एक कुटिल मुस्कान दी।
"तुम वाकई एक नशे जैसी हो, अंकिता।"
मैंने उसकी आंखों में देखा और अपनी उंगली से अपने होंठों को सहलाया।
"अभी तो शुरुआत है। मुझे अभी और भूख लगी है।"
जब मैं उस गली से बाहर निकली, तो मेरी चाल में एक अलग ही नशा था। मेरी जांघों के बीच अभी भी वह गर्म वीर्य धीरे-धीरे बह रहा था। मैंने महसूस किया कि मैं अब उस लत का शिकार हो चुकी हूँ। मुझे समझ आया कि छवि क्यों उन मुस्लिम लंडों की दीवानी थी। उनमें एक अलग ही मर्दानगी, एक अलग ही ताकत होती है जो एक औरत को—या मुझ जैसे पूर्व-पुरुष को—पूरी तरह से गुलाम बना लेती है।
मैं वापस उसी कसाई की दुकान की ओर बढ़ी। वह अभी भी वहां था, अपनी कुल्हाड़ी से मांस काट रहा था। उसकी गठीली बाहें और पसीने से तरबतर शरीर मुझे अपनी ओर खींच रहा था। खून की महक और उस आदमी की मर्दाना गंध का मिश्रण मुझे उत्तेजित कर रहा था।
मैं उसकी दुकान के काउंटर पर चढ़ गई, अपनी साड़ी को इस तरह खिसकाया कि मेरी आधी चूत उसे साफ़ दिखाई दे।
"क्या हुआ कसाई मियां? अभी भी भूख बाकी है?" मैंने अपनी जीभ से अपने होंठ चाटते हुए पूछा।
कसाई ने अपनी कुल्हाड़ी पटकी और उसकी आंखों में एक हिंसक चमक आ गई।
"तूने तो मेरा चैन छीन लिया है, रंडी। अब तुझे मैं ऐसा मजा दूंगा कि तू यह शहर भूल जाएगी।"
उसने मुझे खींचकर दुकान के पीछे वाले कमरे में ले गया। वहां चारों तरफ कच्चे मांस के टुकड़े लटके हुए थे और फर्श पर खून जमा था। उसने मुझे एक लकड़ी की मेज पर लिटा दिया। उसने बिना किसी औपचारिकता के अपनी धोती उतारी और उसका मोटा, सख़्त लंड बाहर आ गया। वह पहले वाले शख्स से अलग था, यह और भी ज़्यादा मोटा और गहरा था।
"तेरी चूत कितनी लाल है," उसने मेरी जांघों को फैलाते हुए कहा।
"इसे और लाल कर दो... इसे फाड़ डालो," मैंने कराहते हुए जवाब दिया।
उसने बिना किसी लुब्रिकेंट के, सीधे अपने लंड को मेरी चूत के छेद में घुसा दिया। दर्द और सुख का एक ऐसा मिश्रण था कि मेरी चीख निकल गई। वह बहुत रफ था। वह मुझे मेज पर पटक-पटक कर सेक्स कर रहा था। मेज हिल रही थी और ऊपर लटके मांस के टुकड़े झूल रहे थे।
"श्लिक, श्लिक, श्लिक!"
हमारी चूत और लंड के बीच घर्षण इतना ज्यादा था कि वहां से झाग जैसा सफेद तरल निकलने लगा। वह मेरे स्तनों को जोर-जोर से मसल रहा था, उसकी उंगलियां मेरे निप्पल्स को बुरी तरह मरोड़ रही थीं।
"कहो, किसका लंड सबसे अच्छा है?" उसने मेरी गर्दन को दबाते हुए पूछा।
"तुम्हारा... तुम्हारा यह गंदा, मोटा लंड! मुझे पागल कर रहा है!" मैं तड़प रही थी।
उसने मेरी एक टांग ऊपर उठाई और अपनी पूरी ताकत से अंदर धंस गया। उसकी बॉल मेरी खाल से टकरा रही थीं। वह इतना हिंसक था कि मुझे लगा वह मुझे चीर देगा, लेकिन यही वह एहसास था जिसे मैं ढूंढ रही थी। जब उसने अपना चरम पाया, तो उसने मेरे पेट पर अपने वीर्य की फुहारें छोड़ दीं। सफेद गाढ़ा वीर्य मेरे गोरे पेट पर फैल गया, जो उस कमरे के खून और मांस की गंध के बीच बहुत कामुक लग रहा था।
मैं मेज पर पड़ी हांफ रही थी। मेरा शरीर पसीने से तरबतर था। मैं अब पूरी तरह से इस नए जीवन में ढल चुकी थी। मैं अब केवल एक शरीर नहीं थी, मैं एक ऐसी प्यास बन गई थी जिसे सिर्फ ये बड़े लंड ही बुझा सकते थे।
बाहर निकलते ही मैंने देखा कि चौक पर कुछ लोग इकट्ठा थे। वहां चाय की एक छोटी सी दुकान थी जहाँ कुछ मुस्लिम नौजवान बैठे हुक्का पी रहे थे। उनकी गहरी आँखें और उनके चेहरों की वह बेबाकी मुझे अपनी ओर खींच रही थी। मैं जानती थी कि वे सब मुझे देख रहे हैं। मेरी साड़ी अब अस्त-व्यस्त थी, मेरे बाल बिखरे हुए थे, और मेरे चेहरे पर अभी भी सेक्स की लालिमा थी।
मैं उनके पास गई और जानबूझकर एक नौजवान के कंधे पर अपना हाथ रखा।
"यहाँ की चाय बहुत मशहूर है, सुना है?" मैंने अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना कामुक बनाया।
उस नौजवान ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी नज़रें मेरे भारी स्तनों और मेरी कमर के घुमाव पर टिकी थीं। उसने एक कुटिल मुस्कान दी।
"चाय तो अच्छी है, लेकिन हम कुछ और ज्यादा गर्म चीज़ों के शौकीन हैं," उसने धीमी आवाज़ में कहा।
उसके साथ बैठे दो और लड़कों ने भी अपनी नज़रें मुझ पर गड़ा दीं। उनके बीच एक खामोश सहमति हुई।
"क्या तुम हमें दिखाओगी कि तुम कितनी 'गर्म' हो?" दूसरे लड़के ने पूछा।
मैंने एक शरारती मुस्कान दी और उन्हें इशारा किया कि वे मेरे साथ चलें। वे मुझे एक पुरानी, खंडहर जैसी इमारत की ओर ले गए जहाँ अंधेरा और सन्नाटा था। जैसे ही हम अंदर घुसे, उन तीनों ने मुझे घेर लिया।
एक ने मेरे कपड़ों को फाड़ना शुरू किया। मेरी रेशमी साड़ी के टुकड़े जमीन पर गिर गए। अब मैं पूरी तरह नग्न थी, सिवाय उस छोटे से अंडरवियर के जिसे उन्होंने एक झटके में खींचकर फाड़ दिया।
"वाह! क्या लाजवाब चूत है!" एक ने चिल्लाकर कहा।
एक लड़के ने मुझे घुटनों के बल बैठा दिया और अपना लंड मेरे मुंह के सामने ले आया। वह काफी लंबा और सीधा था। मैंने बिना देर किए उसे अपनी जीभ से सहलाया और फिर उसे पूरी तरह अपने गले में उतार लिया। मेरा गला घुट रहा था, लेकिन वह सुख मुझे पागल कर रहा था।
उधर, दूसरे लड़के ने मुझे पीछे से पकड़ा और अपनी उंगलियों को मेरी गांड़ के छेद में डालना शुरू किया।
"आह्ह्ह! नहीं... वहां नहीं!" मैं नाटक करते हुए चिल्लाई, लेकिन असल में मुझे वह दबाव बहुत पसंद आ रहा था।
तीसरे लड़के ने मेरे सामने अपनी पोजीशन बनाई और अपना लंड मेरी चूत के द्वार पर रगड़ने लगा।
"अब तुम्हारी बारी है, अंकिता। हमें अपनी चूत का मज़ा चखने दो।"
उसने एक झटके से अपना लंड मेरे अंदर उतार दिया। उसी पल, पीछे वाले लड़के ने भी अपना लंड मेरी गांड़ के रास्ते अंदर धकेल दिया।
"ओह माय गॉड! एक साथ दो...!" मैं चीख पड़ी।
मैं अब एक सैंडविच की तरह उनके बीच फंसी हुई थी। सामने से एक लंड मेरी चूत को फाड़ रहा था और पीछे से दूसरा मेरी गांड़ को। और ऊपर से वह तीसरा लड़का मेरे स्तनों को चूस रहा था।
"स्क्वेल्च... श्लिक... थप!"
तीनों की अलग-अलग लय थी। मेरी चूत और गांड़ दोनों ही पूरी तरह से भर चुके थे। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरा शरीर फट जाएगा, लेकिन वह दर्द ही मेरा असली सुख था।
"तुम कितनी गंदी रंडी हो, अंकिता! तुम्हें तो बस लंड चाहिए!" सामने वाला लड़का हांफते हुए बोला।
"हाँ! मुझे लंड चाहिए! मुझे और ज्यादा... और जोर से!" मैं पागलों की तरह चिल्ला रही थी।
वे तीनों बारी-बारी से मुझमें अपना हुनर दिखा रहे थे। जब एक बाहर निकलता, तो दूसरा उसकी जगह ले लेता। मेरा मुंह, मेरी चूत और मेरी गांड़—तीनों जगह अब वीर्य और लार का मिश्रण था। कमरे में पसीने, वीर्य और सेक्स की एक भारी गंध फैल गई थी।
अंत में, उन तीनों ने एक साथ अपना चरम पाया। एक ने मेरी चूत में, एक ने मेरी गांड़ में और एक ने मेरे चेहरे पर अपने वीर्य की बारिश कर दी।
मैं फर्श पर ढेर हो गई। मेरा शरीर पूरी तरह से टूट चुका था, लेकिन मेरी रूह तृप्त थी। मैं लेटी हुई छत को देख रही थी और सोच रही थी कि अनिकेत कितना बोरिंग इंसान था। वह प्यार और भावनाओं के पीछे भागता था, जबकि असली सुख तो इस गंदगी, इस बेबाकी और इस वासना में था।
मुझे अब समझ आया कि यह जादू मेरे लिए श्राप नहीं, बल्कि एक वरदान था। मुझे एक पुरुष के अहंकार से आज़ाद करके एक ऐसी औरत बना दिया गया था जो केवल आनंद के लिए जीती थी।
मैं उठी और अपने बिखरे हुए कपड़ों को समेटते हुए आईने में अपना अक्स देखा। मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—एक ऐसी चमक जो केवल उन लोगों में होती है जिन्होंने अपनी मर्यादा और शर्म को पूरी तरह त्याग दिया हो।
"मैं इस शहर की सबसे हसीन रंडी हूँ," मैंने खुद से कहा।
मैं बाहर निकली, जहाँ सूरज ढल रहा था और मस्जिद की अज़ान गूँज रही थी। उस आवाज़ ने मुझे और भी ज्यादा उत्तेजित कर दिया। मुझे पता था कि अब और भी कई मर्द होंगे जो अपनी इबादत के बाद अपनी वासना को शांत करने की जगह ढूंढेंगे।
और मैं वहीं होऊंगी—उनके लिए एक खुला निमंत्रण, एक ऐसा दरिया जिसमें वे डूबना चाहेंगे।
मैं धीरे-धीरे चलते हुए एक और गली की ओर मुड़ गई, जहाँ कुछ और भारी मूँछों वाले लोग खड़े थे। मैंने अपनी साड़ी का पल्लू फिर से कंधे से खिसकाया और एक मादक मुस्कान के साथ उनकी ओर बढ़ी।
"जनाब... क्या आप मुझे अपनी दुनिया की गहराई दिखाएंगे?"
मेरी आवाज़ में वही पुराना नशा था, और उन मर्दों की आँखों में वही पुराना लालच। यह खेल अभी खत्म नहीं हुआ था; यह तो बस शुरू हुआ था। मुझे अब हर उस लंड की तलाश थी जो मुझे यह महसूस करा सके कि मैं ज़िंदा हूँ, कि मैं अंकिता हूँ।

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