Family · Hindi

हमशक्ल भाभी

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Part 2

गृहप्रवेश
भाभी ने पूछा कैसी हो विद्या सब ठीक है। मेरा भाई कैसा लगेगा और मेरी छोटी बहन वो थोड़ा मज़ाक करती है। बाकी भारत सब संभल लेगा और जल्द ही तुम पूरी औरत बन जाओगी।
सुबह की हल्की सुनहरी किरणों के साथ भरत की कार उसके पैतृक घर के सामने आकर रुकी। पूरे आँगन को आम और अशोक के पत्तों की बंदनवार, गेंदे के फूलों और रंग-बिरंगी रंगोली से सजाया गया था। घर के बाहर ढोलक की थाप पर महिलाएँ मंगलगीत गा रही थीं।
"दुल्हन आ गई... दुल्हन आ गई..." बच्चों की खुशी पूरे आँगन में गूँज उठी।
भारत की माँ, सरस्वती देवी, आरती की थाली लेकर दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके चेहरे पर वर्षों की प्रतीक्षा पूरी होने की चमक थी।
उन्होंने पहले भारत की आरती उतारी, फिर विद्या की। मुस्कुराकर बोलीं,
"बेटी, आज से यह घर तुम्हारा है। इसे अपने प्यार से भर देना।"
विद्या ने झुककर उनके चरण स्पर्श किए।
घर के मुख्य द्वार पर चावल से भरा कलश रखा था। सरस्वती देवी ने कहा,
"बेटी, दाहिने पैर से इस कलश को धीरे से आगे बढ़ाओ। यह समृद्धि और शुभता का प्रतीक है।"
विद्या ने धीरे से कलश को आगे बढ़ाया। चावल पूरे आँगन में बिखर गए, मानो घर में खुशियाँ प्रवेश कर रही हों।
इसके बाद लाल रंग से भरी थाली में पैर रखकर उसने घर के भीतर कदम रखा। उसके पैरों की लाल छाप फर्श पर बनती चली गई। सभी रिश्तेदार बोले,
"शुभ हो... मंगल हो..."
नया परिवार
बैठक में सभी रिश्तेदार एक-एक करके विद्या से मिलने लगे।
भारत के पिता, रामप्रसाद, गंभीर स्वभाव के थे, लेकिन दिल से बहुत सरल। उन्होंने विद्या के सिर पर हाथ रखकर कहा,
"बेटी, इस घर में कभी अपने-पराए का भेद मत समझना।"
भारत की छोटी बहन, पूजा, हँसते हुए बोली,
"भाभी, अब तो मेरा साथ देना पड़ेगा। भैया मुझे बहुत डाँटते हैं।"
पूरे कमरे में हँसी गूँज उठी।
भारत ने मुस्कुराकर कहा,
"देख लेना, दो दिन में मेरी सारी शिकायतें शुरू हो जाएँगी।"
विद्या पहली बार खुलकर हँसी।
पहली रसोई
अगले दिन विद्या की पहली रसोई की रस्म थी।
सुबह-सुबह वह स्नान करके रसोई में पहुँची। सरस्वती देवी ने उसे रसोई दिखाई और प्यार से कहा,
"बेटी, पहली बार अपने हाथों से कुछ मीठा बनाना शुभ माना जाता है।"
विद्या ने खीर बनाने का निर्णय लिया।
दूध उबल रहा था। उसमें चावल, चीनी, इलायची और सूखे मेवे डालते समय उसके मन में हल्की घबराहट थी।
भारत चुपके से रसोई के दरवाज़े तक आया।
"अगर मदद चाहिए तो बता देना।"
विद्या मुस्कुराई।
"आपकी मदद से कहीं खीर नमकीन न बन जाए।"
दोनों हँस पड़े।
थोड़ी देर बाद खीर तैयार हो गई।
जब पूरे परिवार ने खीर चखी तो सरस्वती देवी की आँखें खुशी से भर आईं।
"आज मुझे अपनी बहू नहीं, अपनी बेटी के हाथों का स्वाद मिला है।"
रामप्रसाद ने भी मुस्कुराते हुए कहा,
"बहुत बढ़िया।"
विद्या के चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया।
पहली परीक्षा
शाम को कुछ रिश्तेदार विदा होने लगे।
एक दूर की चाची ने धीरे से ताना मारा,
"आजकल की लड़कियाँ कहाँ घर सँभाल पाती हैं? देखो, आगे क्या होता है।"
विद्या ने सब सुन लिया, लेकिन कुछ नहीं बोली।
भारत ने उसकी आँखों में हल्की उदासी देख ली।
रात को कमरे में उसने पूछा,
"तुम परेशान हो?"
विद्या ने धीमे स्वर में कहा,
"मैं बस इतना चाहती हूँ कि सबका विश्वास जीत सकूँ।"
भारत ने उत्तर दिया,
"तुम्हें किसी को साबित करने की ज़रूरत नहीं है। बस जैसी हो, वैसी ही रहो। समय खुद सबको जवाब देगा।"
विद्या ने पहली बार महसूस किया कि उसे केवल एक पति ही नहीं, बल्कि एक सच्चा मित्र भी मिला है।
उस रात दोनों देर तक अपने सपनों के बारे में बातें करते रहे—एक छोटे-से घर का सपना, खुशहाल परिवार का सपना और ऐसा जीवन जिसमें सम्मान कभी कम न हो।
उन्हें पता नहीं था कि आने वाले दिनों में उनकी परीक्षा अभी शुरू ही हुई थी।
सूरज की पहली किरण खिड़की से होकर कमरे में आई। पक्षियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि ने पूरे घर का वातावरण पवित्र बना दिया।
विद्या की आँख खुली। कुछ पल के लिए वह भूल गई कि अब वह अपने मायके में नहीं, बल्कि अपने नए घर में है। उसने चारों ओर देखा, फिर हल्की मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।
भारत अभी गहरी नींद में था।
विद्या धीरे से उठी ताकि उसकी नींद न टूटे। उसने अलमारी से साड़ी निकाली, स्नान किया और भगवान के सामने दीपक जलाकर हाथ जोड़ लिए।
उसने मन ही मन प्रार्थना की—
"हे प्रभु, मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं इस परिवार का विश्वास कभी न तोड़ूँ।"
इतने में पीछे से आवाज़ आई—
"इतनी सुबह उठने की आदत है क्या?"
विद्या ने पीछे मुड़कर देखा। भारत मुस्कुराते हुए दरवाज़े पर खड़ा था।
"हाँ... माँ कहती थीं कि सुबह की शुरुआत भगवान के नाम से हो तो पूरा दिन अच्छा जाता है।"
भारत ने मुस्कुराकर कहा—
"तो आज से मैं भी यही नियम अपनाऊँगा।"
दोनों साथ में मंदिर गए। सरस्वती देवी उन्हें देखकर प्रसन्न हो उठीं।
"भगवान तुम दोनों की जोड़ी हमेशा सलामत रखे।"
घर की दिनचर्या
नाश्ते के समय पूरा परिवार एक साथ बैठा।
रामप्रसाद अख़बार पढ़ रहे थे। पूजा कॉलेज जाने की तैयारी कर रही थी। सरस्वती देवी रसोई में व्यस्त थीं।
विद्या तुरंत उनकी मदद करने चली गई।
"माँजी, मैं क्या करूँ?"
सरस्वती देवी ने प्यार से कहा—
"पहले अपने लिए चाय बना लो। बहुएँ सेवा करती हैं, लेकिन अपना ध्यान रखना भी सीखना चाहिए।"
विद्या मुस्कुरा दी।
पहला साथ
नाश्ते के बाद भारत को काम पर जाना था।
विद्या ने उसके लिए टिफ़िन तैयार किया।
भारत ने टिफ़िन लेते हुए कहा—
"इतनी जल्दी मेरी आदतें सीख लीं?"
विद्या बोली—
"जीवनसाथी की पसंद जानना भी तो रिश्ते का हिस्सा है।"
भारत ने पहली बार उसकी आँखों में देखकर कहा—
"तुम सच में इस घर की खुशियों का कारण बनोगी।"
यह सुनकर विद्या हल्का-सा शर्माकर मुस्कुरा दी।
छोटी-सी चुनौती
दोपहर में अचानक बिजली चली गई।
रसोई में खाना बनाते समय गर्मी बहुत बढ़ गई। ऊपर से गैस भी अचानक खत्म हो गई।
विद्या कुछ पल के लिए घबरा गई।
उसे लगा कि कहीं पहली बार में ही सबको निराश न कर दे।
तभी सरस्वती देवी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"बेटी, घर चलाने का मतलब हर काम अकेले करना नहीं होता। मिलकर काम करने से ही परिवार बनता है।"
उन्होंने मिट्टी का पुराना चूल्हा निकलवाया।
पूजा लकड़ियाँ ले आई।
रामप्रसाद ने चूल्हा तैयार कर दिया।
थोड़ी ही देर में पूरा परिवार मिलकर खाना बनाने लगा।
जब भारत शाम को घर लौटा, तो उसने आँगन में सबको हँसते हुए देखा।
"लगता है आज कोई त्योहार है!"
पूजा हँसते हुए बोली—
"त्योहार नहीं भैया... गैस खत्म हो गई थी।"
सब ज़ोर से हँस पड़े।
भारत ने विद्या की ओर देखा।
"घबरा गई थीं?"
विद्या ने मुस्कुराकर कहा—
"थोड़ी-सी... लेकिन अब समझ गई हूँ कि इस घर में कोई अकेला नहीं है।"
रात की बातचीत
रात को छत पर ठंडी हवा चल रही थी।
दोनों आसमान में चमकते तारों को देख रहे थे।
भारत ने पूछा—
"तुम्हारा कोई सपना है?"
विद्या कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
"मैं चाहती हूँ कि हमारा घर ऐसा हो जहाँ कभी किसी की आँख आँसुओं से न भरे।"
भारत ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
"और मेरा सपना है कि चाहे कितनी भी मुश्किल आए, हम कभी एक-दूसरे का हाथ न छोड़ें।"
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। बिना कुछ कहे जैसे एक नया वादा उनके बीच जन्म ले चुका था।
लेकिन किस्मत ने उनके लिए एक ऐसी परीक्षा तैयार कर रखी थी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी...
रात के लगभग दस बज चुके थे। घर में सभी सोने की तैयारी कर रहे थे। तभी भारत के मोबाइल पर आए उस अनजान फ़ोन ने पूरे परिवार की उत्सुकता बढ़ा दी।
भारत ने कॉल समाप्त की और कुछ क्षण तक चुपचाप खड़ा रहा।
विद्या ने धीरे से पूछा,
"क्या बात है?"
भारत ने गहरी साँस लेते हुए कहा,
"शहर की एक बड़ी कंपनी में मैंने कुछ दिन पहले आवेदन दिया था। उन्होंने मेरा इंटरव्यू तय किया है। कल सुबह दस बजे बुलाया है।"
यह सुनते ही विद्या के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
"देखा, मैंने कहा था न कि भगवान मेहनत का फल ज़रूर देते हैं।"
सरस्वती देवी ने भगवान के सामने दीप जलाया और बोलीं,
"हे प्रभु, मेरे बेटे की मेहनत सफल करना।"
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नई उम्मीद
अगली सुबह विद्या ने भारत की पसंद का नाश्ता बनाया। उसने सफेद शर्ट को अच्छी तरह प्रेस किया और टिफ़िन तैयार करते हुए कहा,
"आज घबराइए मत। जैसे आप घर में सच्चे हैं, वैसे ही वहाँ भी रहिए।"
भारत मुस्कुराया।
"अगर नौकरी मिल गई तो सबसे पहले तुम्हें धन्यवाद दूँगा।"
विद्या ने हल्के से सिर हिलाया।
"धन्यवाद नहीं... बस वादा कीजिए कि हर खुशी और हर परेशानी मुझसे साझा करेंगे।"
भारत ने बिना देर किए कहा,
"यह वादा रहा।"
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इंटरव्यू
कंपनी का दफ़्तर बहुत बड़ा था।
भारत ने आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू दिया। उसके अनुभव, ईमानदारी और व्यवहार से अधिकारी प्रभावित हुए।
कुछ देर बाद प्रबंधक ने कहा,
"भारत जी, हमें आपकी कार्यशैली पसंद आई है। लेकिन इस नौकरी में अक्सर दूसरे शहरों की यात्राएँ करनी पड़ेंगी। कभी-कभी एक-एक सप्ताह तक घर से दूर रहना होगा। क्या आप तैयार हैं?"
भारत कुछ पल सोचने लगा।
उसे विद्या और परिवार का चेहरा याद आया।
फिर उसने शांत स्वर में कहा,
"अगर परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए यह ज़रूरी है, तो मैं तैयार हूँ।"
प्रबंधक मुस्कुराया।
"बधाई हो, आप चयनित हो गए हैं।"
भारत की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
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खुशियों की वापसी
शाम को भारत मिठाई का डिब्बा लेकर घर पहुँचा।
जैसे ही उसने कहा,
"मुझे नौकरी मिल गई!"
पूरा घर खुशी से झूम उठा।
सरस्वती देवी ने भगवान का धन्यवाद किया।
रामप्रसाद ने बेटे को गले लगा लिया।
पूजा खुशी से उछल पड़ी।
लेकिन सबसे ज़्यादा खुशी विद्या की आँखों में दिखाई दे रही थी।
भारत ने सबके सामने कहा,
"अगर विद्या मेरा हौसला न बढ़ाती, तो शायद मैं हार मान चुका होता।"
विद्या मुस्कुराकर बोली,
"पति-पत्नी एक-दूसरे की ताकत होते हैं, बोझ नहीं।"
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पहली दूरी
नौकरी शुरू हुए कुछ ही दिन हुए थे कि कंपनी ने भारत को पाँच दिनों के लिए जयपुर भेजने का आदेश दिया।
यह शादी के बाद पहली बार था जब दोनों इतने दिनों के लिए अलग रहने वाले थे।
रात को सामान पैक करते समय विद्या ने पूछा,
"इतने दिनों तक अकेले कैसे रहूँगी?"
भारत ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
"दूरी केवल रास्तों की होती है, दिलों की नहीं।"
अगले दिन भारत चला गया।
हर रात दोनों फ़ोन पर बात करते।
विद्या घर की छोटी-छोटी बातें बताती, और भारत अपने नए काम के अनुभव साझा करता।
उनका विश्वास हर दिन और मजबूत होता जा रहा था।

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