विद्या की जानकी से मुलाकात रात गहरी हो चुकी थी। सागर ने आईने में खुद को देखा। अब वह सागर की तरह नहीं, बल्कि अपने पिछले जन्म की विद्या के रूप में तैयार था। उसके मन में डर भी था और एक अजीब-सी खिंचाव भी। उसे केवल एक ही बात पता थी— जानकी अभी भी जीवित थी। पुरानी डायरी में मिले पते के सहारे वह शहर से दूर एक पुराने घर के सामने पहुँचा। घर के चारों ओर चमेली और रातरानी के पौधे लगे थे। हवा में उनकी खुशबू फैली हुई थी, लेकिन उस सुनसान रात में वही खुशबू कुछ रहस्यमय लग रही थी। सागर ने दरवाज़ा खटखटाया। ठक... ठक... ठक... कुछ क्षण बाद दरवाज़ा खुला। सामने सफेद बालों वाली एक वृद्ध महिला खड़ी थी। उसकी नजर सागर पर पड़ी और वह अचानक बिल्कुल शांत हो गई। उसके हाथ से दीपक लगभग गिर गया। “विद्या...?” सागर की आँखें नम हो गईं। “जानकी...” जानकी कुछ क्षण तक उसे देखती रही। फिर उसने काँपते हाथ से सागर के चेहरे को छुआ। “तुम्हें आने में बहुत देर हो गई, विद्या।” सागर के शरीर में सिहरन दौड़ गई। “आपने मुझे पहचान लिया?” जानकी की आँखों में आँसू आ गए। “चेहरा बदल सकता है... आवाज़ बदल सकती है... जन्म बदल सकता है... लेकिन किसी अपने को पहचानने वाली आँखें नहीं बदलतीं।” वह सागर को अंदर ले गई। कमरे में एक पुराना संदूक रखा था। जानकी ने उसे खोला। अंदर विद्या की पुरानी साड़ी, कुछ सूखे हुए फूल, एक चाँदी की बिंदी और एक पुराना पत्र रखा था। सागर ने काँपते हाथों से पत्र उठाया। “यह क्या है?” जानकी ने कहा— “तुमने इसे मुझे उसी रात दिया था।” “उस रात क्या हुआ था?” जानकी कुछ देर चुप रही। फिर उसने दरवाज़ा बंद कर दिया। “जो मैं बताने जा रही हूँ, वह सुनकर तुम्हें अपने पिछले जन्म का सबसे डरावना सच याद आ जाएगा।” सागर ने धीरे से पूछा— “क्या तुमने मुझे उस रात मरते हुए देखा था?” जानकी ने सिर हिलाया। “नहीं।” सागर चौंक गया। जानकी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “विद्या उस रात मरी नहीं थी। उसे गायब किया गया था।” कमरे की हवा जैसे अचानक ठंडी हो गई। “किसने?” जानकी ने उत्तर देने के बजाय पुरानी तस्वीर निकाली। तस्वीर में विद्या और जानकी के साथ एक तीसरा व्यक्ति खड़ा था। सागर ने तस्वीर देखते ही उसे पहचान लिया। वह वही व्यक्ति था जो वर्तमान में भी उनके आसपास था। जानकी ने फुसफुसाकर कहा— “वही व्यक्ति तुम्हारे पिछले जन्म के रहस्य को आज तक छिपाए हुए है।” सागर के हाथ काँपने लगे। तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी। ठक... ठक... ठक... जानकी का चेहरा अचानक भय से भर गया। उसने सागर का हाथ कसकर पकड़ लिया। “वह आ गया...” “कौन?” जानकी ने दरवाज़े की ओर देखा और फुसफुसाई— “जिससे बचाने के लिए मैंने तुम्हें इतने वर्षों तक इंतज़ार किया था।” दरवाज़े की कुंडी धीरे-धीरे हिलने लगी। और बाहर से एक परिचित आवाज़ आई— “विद्या... मुझे पता था तुम जानकी तक जरूर पहुँचोगी।” वह कौन था? दरवाज़े के बाहर वही आवाज़ दोबारा सुनाई दी— “विद्या... दरवाज़ा खोलो।” सागर ने जानकी की ओर देखा। जानकी का चेहरा पीला पड़ चुका था। “कौन है?” जानकी ने काँपती आवाज़ में कहा— “जिसे तुमने अपने पिछले जन्म में अपना सबसे करीबी समझा था... वही तुम्हारा सबसे बड़ा राज़ जानता है।” दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। ठक... ठक... ठक... सागर ने धीरे से पूछा, “उसका नाम?” जानकी ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, लेकिन तभी घर की सारी लाइटें बुझ गईं। अँधेरे में जानकी ने सागर का हाथ पकड़ लिया। “अभी दरवाज़ा मत खोलना।” कुछ सेकंड बाद बाहर कदमों की आवाज़ दूर चली गई। जानकी ने संदूक से एक पुरानी तस्वीर निकाली और सागर के सामने रख दी। तस्वीर में विद्या और जानकी के बीच एक युवक खड़ा था। उसके गले में वही चाँदी का लॉकेट था, जो सागर ने वर्तमान में एक व्यक्ति के गले में देखा था। सागर के चेहरे पर डर छा गया। “यह... यह तो वही लॉकेट है।” जानकी ने सिर हिलाया। “हाँ। वह आदमी पिछले जन्म में विवान था।” “और अब?” जानकी ने उत्तर नहीं दिया। उसने एक पुरानी डायरी खोली। उसमें विवान की तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी। वही तारीख... जिस दिन विद्या गायब हुई थी। फिर जानकी ने कहा— “विवान ने तुम्हें नुकसान पहुँचाने की कोशिश नहीं की थी। वह तुम्हें बचाने आया था। लेकिन उस रात किसी तीसरे व्यक्ति ने सब कुछ बदल दिया।” सागर चौंक गया। “तो असली अपराधी विवान नहीं था?” “नहीं।” “फिर कौन?” जानकी ने कमरे के कोने में रखे पुराने आईने की ओर देखा। “इसका जवाब उसी आईने के पीछे है।” सागर आईने के पास गया। उसने पीछे छिपा छोटा-सा कागज़ निकाला। उस पर लिखा था— “जिस पर विद्या ने सबसे अधिक भरोसा किया, उसी ने उसे गायब होने पर मजबूर किया।” सागर की साँस रुक गई। “जानकी... तुम जानती हो वह कौन है?” जानकी की आँखों में आँसू आ गए। “हाँ।” “कौन?” जानकी ने धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर देखा। फिर बोली— “वह कोई बाहर का व्यक्ति नहीं था।” सागर के चेहरे पर डर उतर आया। जानकी ने काँपती आवाज़ में कहा— “विद्या, तुम्हारे साथ धोखा तुम्हारे अपने घर के अंदर से हुआ था।” उसी समय दरवाज़ा अपने आप खुल गया। बाहर कोई नहीं था। लेकिन फर्श पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी। सागर ने तस्वीर उठाई। तस्वीर के पीछे केवल एक वाक्य लिखा था— “अगर सच जानना है, तो विद्या के घर वापस जाओ।” अब सागर को समझ आ गया था कि अगला सुराग उसी पुराने घर में छिपा था, जहाँ उसके पिछले जन्म की आखिरी रात शुरू हुई थी। और सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था— विद्या को अपने ही घर से किसने भागने पर मजबूर किया था? विद्या का पुराना घर जानकी के घर से निकलते समय रात और भी गहरी हो चुकी थी। सागर ने पुरानी तस्वीर अपनी जेब में रख ली। अब उसके सामने सिर्फ एक रास्ता था— विद्या के पुराने घर में वापस जाना। वही घर जहाँ उसके पिछले जन्म की आखिरी रात शुरू हुई थी। सड़क सुनसान थी। हवा में पेड़ों की सरसराहट थी और दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। जब सागर उस पुराने घर के सामने पहुँचा, तो उसकी धड़कन तेज़ हो गई। घर बिल्कुल वैसा ही था जैसा उसकी धुंधली यादों में दिखाई देता था। जंग लगा फाटक... सूखे हुए पेड़... और खिड़की पर लटका हुआ पुराना पर्दा। सागर ने दरवाज़े को छुआ। दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अंदर घुप्प अँधेरा था। उसने मोबाइल की रोशनी जलाई। दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर देखकर वह रुक गया। तस्वीर में विद्या खड़ी थी। उसके बगल में जानकी थी। और तीसरा व्यक्ति... विवान। लेकिन तस्वीर के पीछे एक और चेहरा आधा दिखाई दे रहा था। सागर ने तस्वीर दीवार से उतारी। उसी क्षण उसके सिर में तेज़ दर्द उठा। और उसकी आँखों के सामने पिछले जन्म का दृश्य फिर से जीवित हो गया। विद्या इसी कमरे में खड़ी थी। वह किसी से कह रही थी— “मैंने तुम्हारा रहस्य जान लिया है।” सामने खड़ा व्यक्ति बोला— “अगर तुमने यह बात किसी को बताई, तो सब खत्म हो जाएगा।” विद्या ने जवाब दिया— “मैं डरने वाली नहीं हूँ।” दृश्य अचानक टूट गया। सागर ने आँखें खोल दीं। कमरे की दीवार पर वही घड़ी लगी थी। उसकी सुइयाँ रुकी हुई थीं— 12:13 पर। तभी ऊपर की मंज़िल से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। धड़ाम! सागर धीरे-धीरे सीढ़ियों की ओर बढ़ा। हर कदम के साथ फर्श चरमराता जा रहा था। ऊपर पहुँचकर उसने देखा कि एक कमरा आधा खुला था। दरवाज़े के अंदर विद्या की पुरानी अलमारी थी। सागर ने उसे खोला। अंदर कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का छोटा डिब्बा मिला। उस पर लिखा था— “जानकी के अलावा किसी को मत दिखाना।” सागर ने डिब्बा खोला। अंदर एक पुराना पत्र था। उसने काँपते हाथों से पत्र खोला। पहली पंक्ति पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई— “जानकी, अगर तुम यह पत्र पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि मुझे अपने ही घर में किसी पर भरोसा नहीं रहा।” अगली पंक्ति में लिखा था— “जिस व्यक्ति को मैं अपना भाई समझती हूँ, वही इस पूरे रहस्य की शुरुआत है।” सागर स्तब्ध रह गया। उसे याद आया कि वर्तमान जीवन में भी उसके आसपास एक ऐसा व्यक्ति था, जिसकी शक्ल उसे बार-बार अपने पिछले जन्म की तस्वीरों में दिखाई देती थी। तभी नीचे से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। धड़ाम! सागर ने सीढ़ियों की ओर देखा। कोई घर के अंदर आ चुका था। फिर एक आवाज़ आई— “विद्या... तुम वापस आ ही गई।” सागर धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरा। सामने अँधेरे में एक आदमी खड़ा था। उसने रोशनी की तरफ कदम बढ़ाया। सागर उसे देखते ही जम गया। क्योंकि वह चेहरा उसके लिए बिल्कुल अनजान नहीं था। वह वही व्यक्ति था, जिसे सागर वर्तमान जीवन में अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त समझता था। उसने मुस्कुराकर कहा— “अब तुम्हें सब याद आ जाएगा।” विद्या की पूरी स्मृति वह आदमी सीढ़ियों के नीचे खड़ा मुस्कुरा रहा था। “अब तुम्हें सब याद आ जाएगा।” उसकी आवाज़ सुनते ही सागर के सिर में तेज़ दर्द होने लगा। उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। अचानक घर की सारी आवाज़ें गायब हो गईं। न हवा... न घड़ी की टिक-टिक... न बाहर के पेड़ों की सरसराहट। सिर्फ एक आवाज़— “विद्या...” सागर की आँखें बंद हो गईं। और फिर उसकी स्मृतियों का दरवाज़ा खुल गया। उसे अपना पिछला जन्म पूरी तरह याद आने लगा। वह सागर नहीं था। वह विद्या थी। उसे याद आया कि बचपन से ही उसे इस घर से अजीब लगाव था। उसे फूलों, बारिश और पुराने आईनों से विशेष लगाव था। उसकी सबसे करीबी सहेली जानकी थी, जिसे वह अपनी हर बात बताती थी। उसे विवान भी याद आया—वह व्यक्ति जो हमेशा उसकी रक्षा करने की कोशिश करता था। फिर उसे वह रात याद आई। विद्या को पता चला था कि उसके अपने घर में छिपे एक रहस्य के कारण कई लोगों की जिंदगी खतरे में थी। उसने सारे सबूत अपनी डायरी में लिखे और जानकी को सुरक्षित रखने के लिए दे दिए। लेकिन उसी रात उसे पता चल गया कि घर में कोई उसकी बातें सुन रहा है। वह पीछे मुड़ी। दरवाज़े पर उसका अपना भाई खड़ा था। विद्या की साँस रुक गई। “तुम?” उसके भाई ने कहा— “तुम्हें यह सब पता नहीं चलना चाहिए था।” विद्या ने डायरी अपने पीछे छिपा ली। “मैं सच सबके सामने लाऊँगी।” उस रात विद्या ने अकेले भागने के बजाय एक योजना बनाई। उसने अपनी मौत का भ्रम पैदा किया और सारे सबूत गुप्त कमरे में छिपा दिए। लेकिन जाते समय उसने आईने के सामने खड़े होकर एक वादा किया— “अगर मैं इस जन्म में सच पूरा नहीं कर सकी, तो अगले जन्म में वापस आऊँगी।” फिर उसे सब कुछ याद आया। जानकी... विवान... पुराना घर... गुप्त कमरा... और वह व्यक्ति जिसने उसे धोखा दिया था। सागर ने अचानक आँखें खोल दीं। अब उसकी आँखों में डर नहीं था। उसके सामने खड़ा व्यक्ति पीछे हट गया। “तुम्हें याद आ गया?” सागर ने दृढ़ आवाज़ में कहा— “हाँ। मुझे सब याद आ गया।” उसने आगे बढ़कर कहा— “तुम मुझे सागर समझते रहे। लेकिन मैं जानता हूँ कि पिछली बार क्या हुआ था।” वह आदमी चुप रहा। सागर ने कहा— “मैं विद्या थी। जानकी मेरी सहेली थी। विवान मुझे बचाने आया था। और तुमने मुझे इस घर से भागने पर मजबूर किया था।” अचानक ऊपर की दीवार पर लगा पुराना आईना टूटने के बजाय चमकने लगा। उसमें विद्या का चेहरा दिखाई दिया। सागर ने आईने की ओर देखा। उसे लगा जैसे उसका पिछला और वर्तमान जीवन एक ही क्षण में जुड़ गए हों। आईने पर धीरे-धीरे शब्द उभरे— “स्मृति लौट आई। अब अधूरा वादा पूरा करो।” सागर समझ गया। विद्या की यादें वापस आना अंत नहीं था। अब उसे उस रहस्य का अंतिम सच दुनिया के सामने लाना था, जिसके कारण विद्या का पिछला जन्म अधूरा रह गया था। विद्या का अधूरा वादा आईने पर लिखे शब्द चमक रहे थे— “अधूरा वादा पूरा करो।” सागर कुछ क्षण तक आईने को देखता रहा। फिर उसे विद्या की आखिरी आवाज़ याद आई— “अगर मैं सच को इस जन्म में पूरा नहीं कर सकी, तो अगले जन्म में वापस आऊँगी।” अब उसे समझ आ गया था। विद्या का वादा कोई और नहीं, सागर ही पूरा करेगा। लेकिन उसे यह काम अकेले नहीं करना था। जानकी उसके पास आई और बोली— “विद्या ने मुझसे कहा था कि जिस दिन उसे सब कुछ याद आ जाएगा, उसी दिन हमें वह आखिरी काम करना होगा।” सागर ने पूछा— “कौन-सा काम?” जानकी ने पुरानी डायरी उसके हाथ में रख दी। “विद्या ने इस डायरी में पूरे रहस्य के सबूत लिखे थे। उसने चाहा था कि सच छिपा न रहे।” सागर ने डायरी खोली। अंतिम पन्ने पर लिखा था— “मेरा वादा है कि एक दिन मेरा सच सामने आएगा। अगर मैं नहीं रही, तो मेरा अगला जन्म इसे पूरा करेगा।” सागर की आँखें नम हो गईं। उसने डायरी बंद की और कहा— “आज वही दिन है।” घड़ी में रात के 12:13 बज रहे थे। यही वह समय था जब पिछली जिंदगी में विद्या की कहानी अधूरी हुई थी। लेकिन इस बार कहानी अधूरी नहीं रहने वाली थी। सागर, जानकी और विवान ने मिलकर पुराने गुप्त कमरे से सारे सबूत निकाले। सुबह होते ही वे उन्हें उन लोगों तक पहुँचाने निकल पड़े जो सच को सामने ला सकते थे। सागर ने आखिरी बार पुराने घर की ओर देखा। आईने में उसे विद्या दिखाई दी। विद्या मुस्कुरा रही थी। उसने धीरे से कहा— “अब मैं मुक्त हूँ।” आईने की चमक धीरे-धीरे खत्म हो गई। सागर समझ गया कि वर्षों से चला आ रहा अधूरा वादा आखिर पूरा हो चुका था। विद्या का वादा सागर ने पूरा किया—उसी रात, उसी घर में, उसी आईने के सामने जहाँ उसका पिछला जीवन अधूरा रह गया था। सागर का पूर्ण परिवर्तन विद्या का अधूरा वादा पूरा हो चुका था। पुराने घर में फैला अँधेरा धीरे-धीरे शांत होने लगा। आईने की चमक भी कम हो गई। लेकिन सागर के लिए उस रात के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा। वह आईने के सामने खड़ा था। उसने अपने चेहरे को देखा। अब उसे अपने भीतर केवल सागर दिखाई नहीं दे रहा था। उसे विद्या दिखाई दे रही थी। उसके मन में पिछले जन्म की यादें अब धुंधली तस्वीरों की तरह नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी की तरह मौजूद थीं—बचपन, जानकी के साथ बिताए दिन, प्रकृति के प्रति उसका प्रेम, उसकी पसंद-नापसंद, उसके सपने और उसकी अधूरी कहानी। सागर ने आँखें बंद कीं। उसे लगा जैसे उसके भीतर दो अलग-अलग जीवन एक-दूसरे में मिल रहे हों। कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा— “मैं सागर भी हूँ... और विद्या भी।” लेकिन आईने में दिखाई देने वाली स्त्री की छवि अब अलग थी। वह केवल एक कल्पना नहीं लग रही थी। सागर के लिए विद्या की पहचान अब उसके अस्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी। उसका व्यवहार बदल गया था। उसकी आवाज़ में पहले से अधिक कोमलता आ गई थी। वह खुद को पहले की तरह नहीं देखता था। महिलाओं की सुंदरता और उनके जीवन के अनुभवों को अब वह बाहर से देखने वाला व्यक्ति नहीं रहा था। उसे अपने पिछले जन्म की भावनाएँ भीतर से महसूस होने लगी थीं। जानकी ने उसके पास आकर पूछा— “अब तुम कौन हो?” सागर कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने आईने में देखते हुए कहा— “मैं वह हूँ जिसका वादा अधूरा था।” जानकी की आँखों में आँसू आ गए। “विद्या...” सागर ने पहली बार बिना झिझक अपना सिर उठाया। “हाँ, जानकी। मैं लौट आई हूँ।” उस क्षण उसे लगा कि उसके भीतर का डर समाप्त हो गया है। उसने विद्या की तरह साड़ी को ठीक किया, आईने में स्वयं को देखा और मुस्कुरा दी। अब यह किसी भेष की तरह महसूस नहीं हो रहा था। उसके लिए यह उसके जीवन की नई पहचान थी। सागर का पुराना जीवन उसकी स्मृतियों में सुरक्षित था, लेकिन उसके मन में विद्या की पहचान पूरी तरह जाग चुकी थी। शरीर ने एक नया रूप स्वीकार किया था, मन ने विद्या की स्मृतियों को और आत्मा ने उसके अधूरे वादे को। सुबह होने लगी। खिड़की से सूर्य की पहली किरण अंदर आई और उसके चेहरे पर पड़ी। विद्या ने बाहर बगीचे में खिले चमेली के फूलों को देखा। हल्की हवा चली। उसे ऐसा लगा जैसे प्रकृति स्वयं उसका स्वागत कर रही हो। जानकी ने मुस्कुराकर कहा— “अब तुम्हारी कहानी खत्म नहीं हुई।” विद्या ने उत्तर दिया— “नहीं। अब मेरी नई जिंदगी शुरू हुई है।” विद्या के नए जीवन का प्रेम विद्या के जीवन में अब शांति लौट आई थी। पुराने रहस्य का अंत हो चुका था और वह अपने नए जीवन को समझने की कोशिश कर रही थी। वह अक्सर शहर के बाहर बने उसी खूबसूरत बगीचे में जाती, जहाँ फूलों की खुशबू और ठंडी हवा उसे अपने पुराने जीवन की याद दिलाती थी। एक दिन वहीं उसकी मुलाकात अभय से हुई। अभय पास के स्कूल में संगीत सिखाता था। उसे प्रकृति से बहुत प्रेम था और वह अक्सर बगीचे में बैठकर बाँसुरी बजाया करता था। पहली मुलाकात में ही विद्या कुछ क्षण के लिए उसकी धुन सुनती रह गई। अभय ने मुस्कुराकर पूछा— “आपको यह धुन पसंद आई?” विद्या ने कहा— “बहुत। ऐसा लगा जैसे मैंने इसे पहले कभी सुना है।” अभय हँस पड़ा। “शायद कुछ धुनें पहली बार नहीं मिलतीं... वे बस हमें याद दिलाती हैं कि हम उन्हें पहले से जानते हैं।” यह बात विद्या के दिल को छू गई। धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं। वे फूलों, बारिश, संगीत और जिंदगी के बारे में बातें करते। अभय को विद्या की सादगी और आत्मविश्वास पसंद था। विद्या को अभय का शांत स्वभाव और उसकी संवेदनशीलता। एक दिन अभय ने पूछा— “तुम्हारी आँखों में कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे तुम बहुत पुरानी कोई कहानी याद कर रही हो।” विद्या मुस्कुराई। “शायद मेरी जिंदगी में एक कहानी सचमुच बहुत पुरानी है।” “क्या तुम मुझे कभी सुनाओगी?” विद्या ने उसकी ओर देखा। “जब तुम्हें सुनने का साहस होगा।” अभय ने मुस्कुराकर कहा— “तुम्हारी कहानी चाहे जितनी रहस्यमय हो, मैं सुनना चाहता हूँ।” विद्या के मन में पहली बार एक अजीब-सी गर्माहट पैदा हुई। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि अभय से उसकी मुलाकात भी केवल संयोग नहीं थी। एक शाम अभय ने उसे एक पुराना चाँदी का लॉकेट दिखाया। विद्या उसे देखते ही स्तब्ध रह गई। उस लॉकेट पर वही निशान बना था जो उसने अपने पिछले जन्म की डायरी में देखा था। “यह तुम्हारे पास कहाँ से आया?” अभय ने कहा— “यह मुझे मेरे परिवार की पुरानी चीज़ों में मिला था।” विद्या ने लॉकेट को हाथ में लिया। उसे अचानक एक धुंधली स्मृति दिखाई दी— विद्या का पिछला जन्म... वही बगीचा... वही बाँसुरी की धुन... और एक युवक जो उससे कह रहा था— “एक जन्म में कहानी अधूरी रह गई तो क्या हुआ... मैं तुम्हें अगले जन्म में भी ढूँढ लूँगा।” विद्या ने धीरे-धीरे अभय की ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे। अभय ने पूछा— “क्या हुआ?” विद्या ने बस इतना कहा— “शायद तुम मुझे पहले भी जानते थे।” और उस दिन से विद्या को एहसास होने लगा कि उसका नया प्रेम शायद उसके पिछले जन्म की अधूरी कहानी से भी जुड़ा हुआ था। विद्या की नई पहचान विद्या के जीवन में एक और रहस्यमय परिवर्तन हुआ। एक सुबह उसने अपने पुराने दस्तावेज़ों की फाइल खोली। वह यह देखकर स्तब्ध रह गई कि जिन कागज़ों पर कभी उसकी पहचान पुरुष के रूप में दर्ज थी, अब उन सभी पर उसका नाम विद्या और लिंग महिला दर्ज था। पहचान-पत्र, बैंक रिकॉर्ड, शैक्षणिक प्रमाण-पत्र और दूसरे आधिकारिक कागज़—हर जगह उसकी नई पहचान दर्ज थी। विद्या ने काँपते हाथों से एक दस्तावेज़ उठाया। “यह कैसे हो सकता है?” जानकी ने दस्तावेज़ देखकर कहा— “शायद तुम्हारे लौटने के साथ केवल तुम्हारी यादें नहीं लौटीं... तुम्हारी पूरी पहचान भी बदल गई।” विद्या ने आईने में खुद को देखा। अब उसके लिए यह केवल किसी पुराने रहस्य का परिणाम नहीं था। उसके वर्तमान जीवन में उसकी पहचान पूरी तरह विद्या के रूप में स्थापित हो चुकी थी। उसने धीरे से कहा— “तो अब मेरे पुराने जीवन का कोई निशान नहीं बचा?” जानकी मुस्कुराई। “पुराना जीवन मिटा नहीं है। वह तुम्हारी यादों में है। लेकिन तुम्हें अब अपनी जिंदगी आगे बढ़ानी है।” विद्या ने सारे दस्तावेज़ वापस फाइल में रख दिए। अब उसके सामने एक नया जीवन था—अपनी नई पहचान, अपने सपने, जानकी जैसी पुरानी आत्मीयता और अभय जैसा नया प्रेम। उसने खिड़की खोली। बाहर सुबह की धूप में फूल खिले हुए थे। विद्या मुस्कुराई और बोली— “अब मैं अपने अतीत से भागूँगी नहीं। मैं उसे अपनी कहानी का हिस्सा बनाकर आगे बढ़ूँगी।”
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