नई ज़िंदगी की शुरुआत
सुबह मेरी सास ने मुझे जगाया और कहा, “आज हमारी शादी है।”
मैंने उनींदी आँखों से उनकी ओर देखा। कुछ पल तक मुझे समझ ही नहीं आया कि वह क्या कह रही हैं। फिर अचानक सब याद आ गया—आंटी का मुझे अपनी बहू के रूप में स्वीकार करना, मंदिर जाना, गहने बनवाना और अपनी होने वाली पत्नी का घर लौटना।
मैं उठकर बैठ गई। “आज?”
“हाँ, आज। अब देर मत करो, बहुत काम है।”
मैंने धीरे से कहा, “लेकिन आंटी, मुझे थोड़ा डर लग रहा है।”
वह मेरे पास बैठ गईं। “डर किस बात का?”
“पता नहीं... सब कुछ इतना जल्दी हो रहा है। मैं खुश हूँ, लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इस नई ज़िंदगी के लिए तैयार हूँ या नहीं।”
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। “तैयार होने का मतलब यह नहीं कि तुम्हें हर बात का जवाब पहले से पता हो। तुमने बहुत कुछ बदला है, बहुत कुछ सीखा है। लेकिन सबसे ज़रूरी बात यह है कि तुम अपनी खुशी और अपनी इच्छा को भी समझो।”
उनकी बात सुनकर मुझे थोड़ी राहत मिली।
“और एक बात,” उन्होंने कहा, “आज तुम जैसी हो, वैसी ही रहना। किसी के लिए खुद को जबरदस्ती बदलने की ज़रूरत नहीं है।”
मैंने उनकी ओर देखा। “लेकिन आपने तो कहा था कि शादी के बाद मुझे पारंपरिक बहू की तरह रहना होगा।”
वह मुस्कुराईं। “हाँ, साड़ी पहनना, गहने पहनना, घर के काम सीखना—ये सब हमारी परंपराएँ हैं। लेकिन तुम्हारी पहचान सिर्फ इन चीज़ों से नहीं बनती। तुम मेरी बहू बनोगी, पर तुम खुद भी रहोगी।”
उनकी बात मेरे दिल में उतर गई।
थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे तैयार करना शुरू किया। उन्होंने मेरी साड़ी निकाली, ब्लाउज़ ठीक किया और फिर मेरे बाल सँवारने लगीं। मैं आईने के सामने बैठी थी और उन्हें देख रही थी।
“आंटी,” मैंने धीरे से कहा, “आपने मेरे लिए इतना कुछ किया है। मुझे कभी-कभी लगता है कि मैं आपके बिना कुछ भी नहीं कर पाती।”
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। “ऐसा मत सोचो। मैंने तुम्हें रास्ता दिखाया है, लेकिन चलना तुमने सीखा है।”
मैं मुस्कुरा दी।
उन्होंने मेरी नथ उठाई और पूछा, “आज पहनोगी?”
मैंने नथ को देखा। पहले मुझे उसे पहनकर बहुत खुशी हुई थी, लेकिन अब उसके साथ कई भावनाएँ जुड़ गई थीं। मैंने कहा, “हाँ, लेकिन अगर मुझे असहज लगे तो मैं इसे उतार दूँगी।”
“बिल्कुल,” उन्होंने कहा। “तुम्हारी मर्ज़ी सबसे ज़रूरी है।”
यह सुनकर मुझे लगा कि शायद मैं सचमुच अपनी नई ज़िंदगी के लिए तैयार हो रही हूँ।
दोपहर तक घर में शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कुछ रिश्तेदार आए, घर में हँसी-मज़ाक होने लगा और मैं रसोई में आंटी की मदद करने लगी। वह बार-बार मुझे आराम करने को कहतीं, लेकिन मैं भी इस दिन का हिस्सा बनना चाहती थी।
शाम को मेरी होने वाली पत्नी घर आई। उसने मुझे देखते ही मुस्कुराकर कहा, “तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो।”
मैंने शरमाकर कहा, “सच?”
“हाँ। लेकिन आज तुम थोड़ी घबराई हुई भी लग रही हो।”
मैंने सिर हिलाया। “थोड़ी।”
वह मेरे पास आई और बोली, “अगर तुम्हें किसी बात की चिंता है, तो मुझे बता सकती हो।”
मैंने कुछ पल सोचा, फिर कहा, “मुझे डर है कि शादी के बाद सब कुछ बदल जाएगा। मैं तुम्हें खुश करना चाहती हूँ, लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे समझो भी।”
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “मैं तुम्हें समझना चाहती हूँ। और हम दोनों मिलकर अपनी ज़िंदगी तय करेंगे। तुम्हें किसी चीज़ के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।”
मैंने उसकी ओर देखा। उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं।
“तुम रो क्यों रही हो?” उसने पूछा।
मैंने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि मुझे पहली बार लग रहा है कि मैं सचमुच अपनी ज़िंदगी के बारे में खुद भी फैसला कर सकती हूँ।”
उसने मुझे गले लगा लिया।
शादी की रस्में शुरू हुईं। मैं साड़ी में बैठी थी, सिर पर पल्लू था और आंटी मेरे पास ही थीं। जब उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया, तो मुझे अपने पुराने दिनों की याद आ गई—वह छोटा-सा कमरा, मेरी परेशानियाँ और वह दिन जब मैंने पहली बार उनसे अपने मन की बात कही थी।
तब मुझे लगता था कि किसी और जैसा बनना ही मेरी खुशी का रास्ता है।
लेकिन आज मुझे समझ आ रहा था कि किसी से प्रेरणा लेना और अपनी पहचान खो देना, दोनों अलग बातें हैं।
मैं आंटी जैसी बनना चाहती थी, क्योंकि वह मुझे खूबसूरत, आत्मविश्वासी और स्नेही लगती थीं। लेकिन अब मैं यह भी समझ रही थी कि मैं अपनी तरह से भी खूबसूरत हो सकती हूँ।
रस्में पूरी होने के बाद आंटी ने मुझे गले लगाया।
“अब तुम सचमुच मेरी बहू हो,” उन्होंने कहा।
मैंने उनकी आँखों में देखा। “और आप हमेशा मेरी आंटी रहेंगी।”
वह हँस पड़ीं। “अब आंटी नहीं, सास कहो।”
मैं भी हँस दी। “ठीक है, सासू माँ।”
रात को जब सब लोग चले गए, तो मैं अपने कमरे में बैठी थी। मेरी पत्नी मेरे पास आई और बोली, “आज का दिन कैसा लगा?”
मैंने कहा, “बहुत अच्छा। लेकिन थोड़ा अजीब भी।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे लगता है कि मैं एक नई ज़िंदगी में आ गई हूँ। लेकिन मैं चाहती हूँ कि यह ज़िंदगी मेरी भी हो।”
उसने सिर हिलाया। “तो फिर हम इसे मिलकर बनाएँगे।”
मैंने उसकी ओर देखा। “और अगर मैं कभी साड़ी न पहनना चाहूँ?”
वह मुस्कुराई। “तो मत पहनना।”
“और अगर मैं कभी अपने पुराने कपड़े पहनना चाहूँ?”
“तो पहनना।”
“और अगर मुझे कभी अपने बारे में कुछ नया समझ आए?”
“तो मुझे बताना। मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
उस रात मुझे पहली बार लगा कि मैं किसी और की तरह बनने की कोशिश नहीं कर रही थी। मैं बस अपनी ज़िंदगी को एक नए तरीके से समझ रही थी—और इस बार, अपनी इच्छा और अपनी खुशी के साथ।
नई ज़िंदगी की शुरुआत हो चुकी थी।
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