अगले साल जब उसी कॉलेज ने फिर से चैरिटी गेम्स फेस्टिवल की घोषणा की, तो इस बार राम ने मुझे पहले ही चेतावनी दे दी।
“देख, इस बार मैं कोई मैच नहीं हारने वाला,” उसने हँसते हुए कहा, “पिछली बार तुम लोगों ने जो तमाशा किया था, वह दोबारा नहीं होने दूँगा।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “इतना भरोसा है अपने खेल पर?”
राम ने सिर हिलाया, “पूरा।”
लेकिन इस बार किस्मत कुछ और ही लिख चुकी थी।
फाइनल से ठीक पहले राम की टीम एक मुश्किल मुकाबले में हार गई। नियम साफ था—हारने वाले सभी लड़कों को आखिरी शाम के कार्यक्रम में लड़कियों के पारंपरिक कपड़े पहनने थे।
जब मैंने राम को यह बताया, तो वह कुछ क्षण चुप रहा।
“मतलब... मुझे भी?”
“बिल्कुल,” मैंने हँसते हुए कहा।
शाम को तैयार होने के लिए अलग कमरा दिया गया। वहाँ बाकी लड़के पहले से ही आधी-साड़ी और पारंपरिक गहनों में तैयार हो रहे थे। राम दरवाज़े पर खड़ा होकर सबको देख रहा था, जैसे अभी भी उम्मीद कर रहा हो कि कोई उसे इस नियम से बचा लेगा।
आखिरकार उसने हार मान ली।
कुछ देर बाद जब वह बाहर आया, तो मैं उसे देखकर कुछ पल के लिए हँसी रोक ही नहीं पाया। उसने साड़ी ठीक तरह से पहनी थी, बालों को सलीके से बाँधा गया था और हाथों में चूड़ियाँ थीं। उसके चेहरे पर झेंप और बनावटी गंभीरता का ऐसा मिश्रण था कि आसपास खड़े लोग भी मुस्कुराने लगे।
“एक शब्द भी मत बोलना,” राम ने मुझे घूरते हुए कहा।
मैंने कहा, “मैं तो बस सोच रहा हूँ कि पिछले साल तुमने क्या मिस किया था।”
राम ने अपनी चूड़ियों की तरफ देखा और फिर बोला, “अब समझ आया।”
फोटो-शूट के समय इस बार मैं उसके पीछे नहीं, बल्कि उसके साथ खड़ा था। कैमरा सामने आया तो राम ने पहले संकोच किया, लेकिन फिर उसने खुद ही साड़ी का पल्लू ठीक किया और मुस्कुराते हुए पोज़ दे दिया।
फोटोग्राफर ने कहा, “बहुत बढ़िया! अब थोड़ा आत्मविश्वास से।”
राम ने मेरी ओर देखा और धीमे से बोला, “लगता है अब मुझे इस भूमिका में भी पास होना पड़ेगा।”
मैं हँस पड़ा।
उस शाम राम को पहली बार एहसास हुआ कि यह केवल हारने की सज़ा नहीं थी। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव बन गया था जिसे वह शायद कभी भूल नहीं पाएगा।
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