शाम ढल चुकी थी और मैदान के बीच बने खुले मंच पर रंगीन रोशनियाँ जल उठी थीं। चैरिटी फेस्टिवल का अंतिम कार्यक्रम अब अपने सबसे मनोरंजक हिस्से में प्रवेश कर रहा था—नाटक।
घोषक ने माइक संभालकर कहा, “अब प्रस्तुत है आज की विशेष नाट्य प्रस्तुति!”
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पर्दा खुला।
सबसे पहले रमेश मंच पर आया। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और पूरी गंभीरता से अपना संवाद बोला। दर्शकों को उसका अंदाज़ इतना मज़ेदार लगा कि शुरुआत से ही हँसी और तालियाँ सुनाई देने लगीं।
इसके बाद राम मंच पर आया। शुरुआत में उसके चेहरे पर हल्की झिझक थी, लेकिन जैसे ही उसने अपना संवाद बोला, उसका आत्मविश्वास बढ़ गया। अब वह अपने किरदार में पूरी तरह शामिल हो चुका था।
कुछ क्षण बाद सिद्धार्थ की बारी आई। उसने एक परिपक्व और गरिमामयी महिला का किरदार निभाते हुए मंच पर प्रवेश किया। उसकी चाल, संवाद बोलने का अंदाज़ और गंभीर हाव-भाव देखकर दर्शक कुछ पल के लिए शांत हो गए—फिर जोरदार तालियाँ बज उठीं।
मंच के पीछे खड़े होकर मैं तीनों को देख रहा था। कुछ देर पहले तक जो तीनों दोस्त अपने पहनावे को लेकर झिझक रहे थे, वे अब पूरे आत्मविश्वास से अपने-अपने किरदार निभा रहे थे।
नाटक का पहला दृश्य शुरू हुआ।
राम ने संवाद कहा, “लगता है आज हमारे घर में कोई बड़ा राज़ खुलने वाला है।”
रमेश ने तुरंत जवाब दिया, “राज़ तो खुलेगा, लेकिन पहले चाय कौन बनाएगा?”
दर्शकों में ठहाका गूँज उठा।
सिद्धार्थ ने दोनों को देखते हुए अपने किरदार की गंभीर आवाज़ में कहा, “तुम दोनों पहले बहस बंद करो और मेरी बात ध्यान से सुनो।”
मंच पर तीनों के बीच की नोकझोंक शुरू हो गई और दर्शक पूरे ध्यान से नाटक देखने लगे।
अब यह सिर्फ एक कॉस्ट्यूम कार्यक्रम नहीं रह गया था। तीनों दोस्त सचमुच अपने किरदारों में उतर चुके थे—और असली कहानी अभी शुरू ही हुई थी।
नाटक का अगला दृश्य शुरू हुआ तो माहौल अचानक थोड़ा शांत और भावुक हो गया। अब कहानी में तीनों किरदारों के बीच दोस्ती के साथ-साथ एक हल्का-सा रोमांटिक प्रसंग भी था।
राम ने मंच पर मेरी ओर देखते हुए अपने संवाद में कहा, “कुछ लोग हमारे जीवन में अचानक आते हैं, लेकिन फिर उनकी मौजूदगी खास लगने लगती है।”
दर्शकों के बीच हल्की तालियाँ बज उठीं।
रमेश ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “तो क्या यह वही एहसास है जिसे लोग प्यार कहते हैं?”
राम कुछ पल के लिए चुप रहा, फिर मुस्कुराया।
सिद्धार्थ ने अपने परिपक्व किरदार में दोनों को देखते हुए कहा, “प्यार सिर्फ बड़े-बड़े वादों का नाम नहीं है। कभी-कभी किसी के साथ खड़े होकर उसका साथ देना ही काफी होता है।”
यह संवाद सुनकर माहौल पहले से कहीं ज्यादा भावुक हो गया।
अगले दृश्य में राम और रमेश आमने-सामने खड़े थे। दोनों के किरदारों के बीच मज़ाक और हल्की छेड़छाड़ चल रही थी, जबकि सिद्धार्थ बीच-बीच में उन्हें समझाने वाले किरदार की भूमिका निभा रहा था।
अंत में तीनों किरदार मंच के बीच आ गए। रोशनी धीमी हुई और पीछे धीमा संगीत बजने लगा।
मैं पर्दे के पीछे खड़ा यह सब देख रहा था। मुझे लगा कि जो नाटक कुछ घंटे पहले सिर्फ मनोरंजन के लिए शुरू हुआ था, वह अब दोस्ती, अपनापन और भावनाओं की एक खूबसूरत कहानी बन चुका था।
पर्दा गिरते ही दर्शकों ने जोरदार तालियाँ बजाईं। राम, रमेश और सिद्धार्थ ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कुराए—उन्हें पता था कि उनका सबसे यादगार मंचीय अनुभव अभी खत्म नहीं हुआ था।
नाटक के अगले दृश्य में मंच पर सिर्फ राम और मेरा किरदार रह गया। बाकी कलाकार पर्दे के पीछे चले गए और रोशनी केवल हम दोनों पर केंद्रित हो गई।
राम ने धीमे स्वर में अपना संवाद कहा, “इतने लोगों के बीच भी मुझे हमेशा तुम्हारी मौजूदगी ही सबसे पहले दिखाई देती है।”
मैं मुस्कुराया। “शायद इसलिए क्योंकि हम इतने अच्छे दोस्त हैं।”
राम कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “शायद बात सिर्फ दोस्ती की नहीं है।”
मंच के सामने बैठे दर्शक शांत होकर दृश्य देख रहे थे। यह नाटक का सबसे भावुक क्षण था।
मैंने उसकी ओर देखकर कहा, “तो फिर आज पहली बार अपने दिल की बात कह दो।”
राम मुस्कुराया। “तुम मेरे लिए बहुत खास हो।”
पीछे से धीमा संगीत शुरू हुआ। दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे की ओर देखते रहे। फिर राम ने हाथ आगे बढ़ाया और मैंने उसका हाथ थाम लिया।
पर्दा धीरे-धीरे गिरने लगा और दर्शकों की तालियाँ पूरे मैदान में गूँज उठीं।
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