भाग 1: खाकी, खामोशी और आईना
रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। थाने के बाहर बूंदाबांदी हो रही थी और पुरानी ट्यूबलाइट की नीली रोशनी मेज पर रखी फाइलों पर रेंग रही थी। स्टेशन का माहौल एकदम शांत था, लेकिन उस सन्नाटे में भी एक तनाव तैर रहा था।
इन्स्पेक्टर समीर सिंह अपनी मेज पर टिका बैठा था। छह फुट का कसरती जिस्म, चौड़ी छाती पर कसी हुई खाकी वर्दी, कंधे पर चमकते तीन सितारे और चेहरे पर वह सख्त मिज़ाज जिससे पूरे इलाके के मुजरिम कांपते थे।
तभी हवलदार रामदीन कांपते हाथों में चाय का कुल्हड़ लेकर अंदर आया।
"साहब... चाय। रात बहुत हो गई है, आप सुबह आठ बजे से लगातार ड्यूटी पर हैं। कहिए तो गाड़ी निकलवाऊँ?" रामदीन ने बहुत अदब और थोड़े डर के साथ पूछा।
समीर ने अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए भारी और कड़क आवाज में कहा, "जब तक यह केस खत्म नहीं होता रामदीन, मेरे लिए दिन और रात में कोई फर्क नहीं है। बाहर गश्त बढ़ा दो और रात की पेट्रोलिंग टीम को कहो कि कोई भी संदिग्ध दिखे तो तुरंत लॉक-अप में डालें।"
"जी साहब!" रामदीन ने तुरंत रीढ़ सीधी करके सलाम ठोका और उलटे कदमों बाहर निकल गया।
दरवाजा बंद होते ही समीर ने चाय का कुल्हड़ मेज पर रखा और एक लंबी सांस ली। उसने खिड़की के काले कांच में दिख रहे अपने अक्स को देखा। कांच पर खाकी वर्दी, कड़क मूंछें और अनुशासन से भरा चेहरा दिख रहा था।
लेकिन समीर की आँखों में एक गहरा दर्द था। उसने मन ही मन खुद से कहा, ‘दुनिया जिसे इन्स्पेक्टर समीर सिंह कहती है, वह सिर्फ एक नकाब है। यह कड़कड़ाती खाकी, यह भारी आवाज़... सब एक कवच है, जिसे मैंने अपनी असलियत को दुनिया की नज़रों से बचाने के लिए पहन रखा है।’
समीर का बचपन आम लड़कों जैसा कभी नहीं रहा। जब उसके उम्र के बच्चे गलियों में कंचे या क्रिकेट खेलते थे, तब आठ साल का समीर अपने घर की खिड़की पर बैठकर अपनी माँ और बहनों को देखता था। उसे खिलौनों या बंदूकों में कभी दिलचस्पी नहीं रही; उसे खींचती थी रेशमी साड़ियों की सरसराहट, हाथों में छनकती चूड़ियाँ, और आईने के सामने बैठकर खुद को संवारने की वह कोमल अदा।
जब भी घर खाली होता, समीर चुपके से अपनी बहन के कमरे में जाता। वह उसका लाल या गुलाबी रेशमी दुपट्टा उठाता, उसे अपने कंधों पर साड़ी के पल्लू की तरह लपेटता, और आईने के सामने खड़ा हो जाता। उस पल, उस छोटे से बच्चे को लगता कि वह वही है जो वह अंदर से महसूस करता है—एक सुंदर, नाजुक लड़की।
लेकिन यह सुकून ज़्यादा दिन नहीं टिक सका।
एक दिन उसके पिता—जो खुद पुलिस विभाग में एक बेहद सख्त अफसर थे—ने समीर को कमरे में दुपट्टा लपेटे और होठों पर हल्का सा रंग लगाए देख लिया। पिता की गरजती हुई आवाज़ आज भी समीर की रूह को कँपा देती थी:
"यह क्या नीच हरकत है समीर?! तुम मर्द के बच्चे हो! यह औरतों के घटिया चोचले हमारे घर में नहीं चलेंगे!"
उस दिन उसके पिता ने समीर को बेल्ट से इतना मारा था कि उसकी पीठ पर नीले निशान पड़ गए थे। अगले ही दिन उसका दाखिला कुश्ती के अखाड़े और जिम में करा दिया गया।
"मर्द बनो समीर! सीना तानकर चलना सीखो! दुनिया में कड़क बनकर जिओ!" पिता हर रोज़ यही दोहराते।
समीर ने समाज और पिता के डर से खुद को बदल लिया। उसने घंटों पसीना बहाकर अपने जिस्म को फौलाद जैसा बनाया, अपनी आवाज़ को भारी किया, और पुलिस की परीक्षा पास करके वही खाकी वर्दी पहन ली जो उसके पिता चाहते थे। उसने अपने अंदर की उस कोमल स्त्री को दिल के सबसे अंधेरे कोने में कैद कर दिया।
रात के 12:30 बजे समीर अपने सरकारी आवास पर पहुँचा। घर में सन्नाटा था। उसकी शादी सिर्फ एक सामाजिक औपचारिकता बनकर रह गई थी; पत्नी के साथ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था, क्योंकि समीर कभी अपनी असली पहचान उजागर नहीं कर सकता था।
समीर सीधे अपने बेडरूम से जुड़े प्राइवेट ड्रेसिंग रूम में गया और अंदर से भारी कुंडी लगा दी।
उसने एक गहरी सांस ली। खाकी वर्दी के बटन खोले, बेल्ट उतारी, और भारी बूट्स फर्श पर छोड़ दिए।
उसने अलमारी के निचले हिस्से में गुप्त रूप से बने एक चोर-खाने को खोला। उस दराज़ के अंदर एक अलग ही दुनिया बसी थी—रेशमी साड़ियाँ, मैचिंग ब्लाउज़, हाइ हील्स, तरह-तरह की विग्स (Wigs), महंगे मेकअप किट्स, इत्र की बोतलें और गहने।
समीर ने आईने के सामने खड़े होकर अपनी कड़क मूछों को देखा। उसने ट्रिमर और रेजर उठाकर अपनी मूछों और दाढ़ी को पूरी तरह साफ (clean-shave) कर दिया। चेहरे का हर बाल हटने के साथ ही उसकी सख्त रेखाएँ ढीली पड़ने लगीं।
उसने चेहरे पर क्लींजिंग मिल्क लगाया, फिर बड़े सलीके से फाउंडेशन, कंसीलर और कंटूरिंग का इस्तेमाल करके अपने चेहरे के सख्त नैन-नक्श को एक कोमल, ढले हुए स्त्री रूप में बदला। आँखों पर काजल, आईलाइनर और मस्कारा लगाते ही उसकी आँखों की चमक बदल गई—अब उनमें पुलिस अफसर का खौफ नहीं, बल्कि एक गहरी नजाकत थी। होठों पर उसने गहरे मैरून रंग की लिपस्टिक लगाई।
इसके बाद उसने अलमारी से गहरे नीले और सुनहरे बॉर्डर वाली एक बनारसी रेशमी साड़ी निकाली। ब्लाउज़ पहनकर, उसने साड़ी की प्लीट्स (चुन्नटें) बहुत ही सलीके से बनाईं और पल्लू को अपने कंधे पर पिन किया। उसने लंबे, घने और घुंघराले काले बालों वाली विग लगाई। कानों में झुमके, गले में बारीक हार और हाथों में कंगन पहनकर उसने पैरों में तीन इंच की पेंसिल हील्स पहनीं।
जब उसने पूरे मेकअप और लिबास के साथ आईने में देखा, तो वहाँ कोई इन्स्पेक्टर समीर नहीं था।
आईने में खड़ी थी—सौम्या।
वह आईने के सामने खड़ी होकर धीरे से मुस्कुराई। उसकी शारीरिक भाषा पूरी तरह बदल चुकी थी। जो कंधे खाकी में तने रहते थे, अब उनमें एक अजीब सी नजाकत थी। उसकी चाल में हील्स की 'टक-टक' के साथ एक लचक आ गई थी।
उसने अपनी उंगलियों से साड़ी के पल्लू को छुआ और खुद से धीमी, कोमल आवाज़ में फुसफुसाकर कहा, "नमस्ते सौम्या... तुम्हें देखकर आज फिर इस दिल को सांस आई है।"
वह जानती थी कि यह रूप, यह सुंदरता और यह पहचान ही उसकी असली रूह है। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र कमरे के कोने में टंगी उस खाकी वर्दी पर पड़ती, उसका दिल दहल जाता।
उसे पता था कि बाहर की दुनिया बहुत बेरहम है। अगर पुलिस महकमे, मीडिया या समाज को ज़रा सा भी पता चल गया कि शहर का सबसे जाबांज़ और सख्त इन्स्पेक्टर बंद कमरों में 'सौम्या' बनकर जीता है, तो लोग उसकी सारी काबिलियत, उसकी बहादुरी और उसके वजूद को मज़ाक बनाकर रख देंगे।
सौम्या ने आईने में अपने अक्स को देखा, उसकी आँखों में एक साथ दो अहसास थे—अपनी असली पहचान को जीने की खुशी, और कल सुबह फिर से खाकी का कड़ा नकाब ओढ़ने का खौफनाक डर।
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