भाग 2: सीक्रेट अपार्टमेंट और कबीर का प्रवेश
पहल तड़के के चार बज रहे थे।
सौम्या ने ड्रेसिंग टेबल के आईने में अपने अक्स को एक आखिरी बार शांत और भरे दिल से देखा। उसने हाथों से रेशमी पल्लू को ढीला छोड़ा, कानों के भारी झुमके, गले का हार और हाथों की कांच की चूड़ियां उतारकर एक लकड़ी की नक्काशीदार पेटी में सहेजकर रख दीं। कॉटन पैड पर क्लींजिंग मिल्क लगाकर उसने चेहरे का मेकअप, होंठों की मैरून लाली और आंखों का गहरा काजल धीरे-धीरे पोंछ दिया।
जैसे-जैसे मेकअप उतर रहा था, आईने से 'सौम्या' धीरे-धीरे ओझल होती जा रही थी, और उसकी जगह इन्स्पेक्टर समीर का कड़क, तना हुआ चेहरा उभर रहा था।
उसने विग को संभालकर बॉक्स में रखा, बनारसी साड़ी की चुन्नटें समेटकर अलमारी के गुप्त चोर-खाने को बंद किया और चाबी अपनी जेब में डाल ली। खाकी पैंट, कड़क छाती वाला शर्ट, भारी पुलिस बूट और सिर पर खाकी कैप।
कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर निकलते वक्त उसके चाल की नाज़ुक लचक गायब हो चुकी थी; अब उसकी जगह एक सख्त पुलिस अफसर के भारी बूटों की धमक गूंज रही थी।
समीर की दोहरी जिंदगी में दो अलग-अलग दुनिया थीं। उसकी शादीशुदा जिंदगी सिर्फ एक छत के नीचे रहने वाले दो अजनबियों की कहानी बनकर रह गई थी।
"समीर, आज भी रात को थाने में ही रुकने का इरादा है?" सुबह नाश्ते की मेज पर चाय का कप रखते हुए उसकी पत्नी सुनीता ने रूखे स्वर में पूछा।
समीर ने अखबार से नजरें हटाए बिना कड़क आवाज में कहा, "शहर में अपराध बढ़ रहा है सुनीता। जब तक केस हल नहीं होता, मेरे समय पर घर आने की उम्मीद मत रखो।"
सुनीता ने एक ठंडी सांस भरी और रसोई में चली गई। समीर के दिल में एक अजीब सा दर्द उभरा। वह चाहता था कि अपनी पत्नी को सब सच बता दे... लेकिन क्या बताता? कि उसका पति, जो शहर का सबसे धाकड़ इंस्पेक्टर माना जाता है, वह अंदर से एक औरत की रूह रखता है? यह सच इस समाज और उसकी पत्नी के लिए बर्दाश्त से बाहर था।
इस घुटन से बचने के लिए ही समीर ने शहर के दूसरे कोने में एक पुरानी इमारत में एक 3BHK फ्लैट किराए पर ले रखा था। उस फ्लैट की खबर उसने अपने खास हवालदार तक को नहीं होने दी थी। वह उसका 'सीक्रेट ठिकाना' था—जहाँ समीर का वजूद खत्म हो जाता था और केवल 'सौम्या' सांस लेती थी।
शनिवार की शाम थी। समीर ने नाइट गश्त का बहाना बनाया और सीधे अपने सीक्रेट फ्लैट पर पहुंचा। दरवाजे को अंदर से दोहरे ताले लगाए और अपनी खाकी वर्दी उतारकर फेंक दी।
आज उसने हल्के जामुनी (Lavender) रंग की जॉर्जेट साड़ी पहनी थी। लंबे काले बालों वाली विग के साथ हल्का, कुदरती मेकअप किया था। आईने के सामने खड़े होकर जब सौम्या ने खुद को देखा, तो उसके चेहरे पर एक ऐसी सच्ची और मासूम मुस्कान आ गई, जो इन्स्पेक्टर समीर के चेहरे पर सालों से किसी ने नहीं देखी थी।
सौम्या को ताजी हवा में सांस लेने का मन हुआ। उस इमारत की छत पर एक छोटा सा टेरेस गार्डन था, जहाँ आम तौर पर सन्नाटा रहता था।
उसने पैरों में हल्की चप्पल पहनी और सधे हुए कदमों से छत की तरफ बढ़ गई।
छत पर ठंडी हवा चल रही थी। सौम्या ने आंखें मूंदकर उस हवा को अपने चेहरे पर महसूस किया। उसकी साड़ी का पल्लू हवा में धीरे-धीरे लहरा रहा था।
"बहुत खूबसूरत शाम है ना?" अचानक पीछे से एक शांत और सुरीली आवाज आई।
सौम्या चौंक गई! उसने घबराकर पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ लगभग 32 साल का एक नौजवान खड़ा था। साधारण शर्ट, आंखों पर चश्मा, हाथों में एक स्केचबुक और चेहरे पर बेहद सौम्य मुस्कान।
सौम्या का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसके भीतर पुलिसिया खौफ जाग उठा—‘क्या इसने मुझे पहचान लिया? क्या इसे मेरी हकीकत का पता चल गया?’
सौम्या ने खुद को संभालते हुए, साड़ी का पल्लू सीने पर सही किया और अपनी आवाज को कोमल बनाकर कहा, "हां... काफी शांति है यहां।"
"मैं कबीर," उस लड़के ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। "मैं दो महीने पहले ही फ्लैट 402 में शिफ्ट हुआ हूं। एक इंटीरियर डिजाइनर हूं। आपको यहां पहले कभी नहीं देखा?"
सौम्या ने उसके हाथ की तरफ देखा, पर हाथ मिलाने के बजाय शालीनता से नमस्ते किया, "मैं... मैं सौम्या हूं। मैं यहां कभी-कभी ही आती हूं।"
कबीर ने उसकी हिचकिचाहट को समझा और आदर से हंसा, "अरे, आई एम सॉरी। हाय सौम्या! सच कहूं तो मैं रोज शाम को यहां स्केचिंग करने आता हूं, लेकिन आज की शाम वाकई बहुत खास लग रही है।"
कबीर की आंखों में कोई हवस या अजीब नजर नहीं थी। उसमें सिर्फ एक कलाकार की कद्र और आदर था। समीर, जिसने जिंदगी भर सिर्फ डांट, मार और नफरत झेली थी, उसे पहली बार किसी इंसान की बातों में इतनी गर्माहट महसूस हुई।
"आप क्या डिजाइन करते हैं?" सौम्या ने कबीर से बातचीत जारी रखी, क्योंकि उसे कबीर की मौजूदगी में एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।
"मैं घरों का इंटीरियर बनाता हूं," कबीर छत की बाउंड्री से टिककर खड़ा हो गया। "लेकिन मुझे इंसानों के चेहरे और उनके छिपे हुए भाव स्केच करना ज्यादा पसंद है। जैसे... आपके चेहरे पर एक बहुत खूबसूरत, लेकिन कोई गहरी उदासी छिपी है।"
कबीर की यह बात सुनते ही सौम्या की सांसें थम गईं।
‘इस इंसान ने एक ही मुलाकात में मेरे अंदर के संघर्ष को कैसे भांप लिया?’ उसने मन ही मन सोचा।
"आपकी नजर बहुत तेज है," सौम्या धीमे से मुस्कुराई।
"कलाकार की नजर ऐसी ही होती है," कबीर ने स्केचबुक खोली। "अगर आपको ऐतराज न हो, तो क्या मैं आपका एक स्केच बना सकता हूं? सिर्फ पांच मिनट लगेंगे।"
सौम्या पल भर के लिए हिचकिचाई, लेकिन उसके अंदर की औरत एक कलाकार के नजरिए से अपनी खूबसूरती को देखना चाहती थी। उसने चुपचाप हां में सिर हिला दिया।
कबीर ने पेन्सिल उठाई और तेजी से कागज पर रेखाएं खींचने लगा। चांदनी रात में सौम्या शांत खड़ी थी, हवा उसके बालों को छूकर गुजर रही थी।
पाँच मिनट बाद कबीर ने स्केचबुक सौम्या के सामने कर दी।
कागज पर पेन्सिल के शेड्स से उकेरी गई 'सौम्या' बेहद असीम और खूबसूरत लग रही थी! कबीर ने उसकी आंखों का दर्द, उसकी नजाकत और उसकी खामोशी को हूबहू उतार दिया था। स्केच के नीचे लिखा था: 'अथांग शांति – सौम्या'।
उस स्केच को देखकर सौम्या की आंखों से एक आंसू की बूंद फिसलकर गाल पर आ गिरी।
"अरे... क्या हुआ? आपको स्केच पसंद नहीं आया?" कबीर ने फिक्र से पूछा।
"नहीं कबीर..." सौम्या ने आंसू पोंछते हुए कहा, "यह बहुत... बहुत खूबसूरत है। आज तक किसी ने मुझे इतने सुंदर नजरिए से नहीं देखा।"
कबीर ने उसे देखा और बेहद नरमी से बोला, "सौम्या, जो खूबसूरत होता है, वह दिखता ही है। बस देखने वाली आंखें होनी चाहिए।"
उस रात छत पर कबीर और सौम्या के बीच एक अनजाने, खूबसूरत रिश्ते की बुनियाद पड़ चुकी थी।
सौम्या अपने फ्लैट में लौटी, लेकिन उसका दिल अभी भी उसी छत पर अटका हुआ था। उसने उस स्केच को अपने तकिए के पास रखा।
लेकिन अगले ही पल उसकी नजर कमरे के कोने में टंगी उस कड़क खाकी वर्दी पर पड़ी, और उसका सपना पल भर में चकनाचूर हो गया।
‘यह मैं क्या कर रही हूं?’ समीर ने अपने माथे पर हाथ रख लिया। ‘कबीर जिस 'सौम्या' की खूबसूरती पर मुग्ध है, वह असल में कोई औरत नहीं, बल्कि शहर का एक सख्त मर्द पुलिस अफसर है! अगर कबीर को यह सच पता चला, तो वह मुझसे नफरत करेगा... और अगर दुनिया को पता चला, तो मेरा वजूद ही मिट जाएगा!’
समीर एक ऐसी दलदल में फंसता जा रहा था, जहाँ एक तरफ उसकी रूह की आजादी थी और दूसरी तरफ उसके खाकी वर्दी की सच्चाई।
Part 2
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