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लड़कियों की पिकनिक

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Part 2

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रंजीत जितनी तेज़ दौड़ सकता था, दौड़ता रहा। जंगल का रास्ता उसे पहले कभी इतना लंबा नहीं लगा था। गुलाबी ड्रेस उसके लिए शर्मिंदगी की निशानी बन चुकी थी, लेकिन उस समय उसके मन में सिर्फ़ एक बात थी—उसे किसी सुरक्षित जगह पहुँचना है।

कुछ दूर जाने के बाद उसे एक छोटी-सी पगडंडी दिखाई दी, जो मुख्य सड़क की ओर जाती थी। वह वहीं रुककर कुछ देर हाँफता रहा। उसकी आँखों में आँसू थे और मन में गुस्सा।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसने उन लड़कियों का क्या बिगाड़ा था। उसने तो बस रास्ते में उन्हें देखा था और आगे बढ़ जाना चाहता था।

तभी पीछे से हँसी की आवाज़ सुनाई दी।

रंजीत घबरा गया।

उसे लगा कि शायद वे लड़कियाँ उसके पीछे आ रही हैं। वह तुरंत झाड़ियों के पीछे छिप गया। कुछ क्षण बाद दो लड़कियाँ पगडंडी से गुज़रीं, लेकिन वे दूसरी दिशा में चली गईं।

रंजीत ने राहत की साँस ली।

उसने तय किया कि वह सीधे गाँव नहीं जाएगा। पहले वह जंगल के किनारे रहने वाले बूढ़े मास्टरजी के घर जाएगा। मास्टरजी उसे बचपन से जानते थे और गाँव के उन गिने-चुने लोगों में थे जिन पर वह भरोसा करता था।

करीब आधे घंटे बाद वह उनके घर पहुँचा।

दरवाज़ा खटखटाते ही मास्टरजी बाहर आए। रंजीत को उस हालत में देखकर वे कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत रह गए।

“रंजीत? यह क्या हुआ?”

रंजीत ने जवाब देने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।

मास्टरजी ने कोई सवाल नहीं किया। उन्होंने उसे अंदर बुलाया, एक चादर दी और कहा, “पहले बैठो। जो हुआ है, वह बाद में बताना।”

कुछ देर बाद रंजीत ने पूरी घटना बताई।

मास्टरजी ध्यान से सुनते रहे। जब रंजीत की बात खत्म हुई तो उन्होंने गंभीर होकर कहा, “तुम्हारे साथ जो हुआ, उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

पहली बार रंजीत को लगा कि शायद वह अकेला नहीं है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।

अगली सुबह गाँव में खबर फैल चुकी थी कि जंगल में कुछ लड़कियों ने एक लड़के को परेशान किया था। रंजीत को डर था कि लोग उसका मज़ाक उड़ाएँगे। मगर मास्टरजी ने उसे समझाया कि चुप रहना ही हमेशा समाधान नहीं होता।

उन्होंने कहा, “अगर तुम चाहो तो हम उन लोगों के खिलाफ़ शिकायत कर सकते हैं। फैसला तुम्हारा होगा।”

रंजीत ने काफी देर तक सोचा।

फिर उसने सिर उठाया।

“हाँ,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “मैं चाहता हूँ कि उन्हें पता चले कि उन्होंने गलत किया है।”

उस दिन रंजीत ने पहली बार डर के बजाय अपने लिए आवाज़ उठाने का फैसला किया।

और उसे पता नहीं था कि उस फैसले के बाद उसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदलने वाली थी।
अगली सुबह रंजीत के दरवाज़े के नीचे एक कागज़ मिला।

उस पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—

“अगर तुमने किसी को कुछ बताया, तो अगली बार बात सिर्फ़ धमकी तक नहीं रहेगी।”

रंजीत कुछ देर तक उस कागज़ को देखता रहा। इस बार वह घबराकर अकेला नहीं बैठा। उसने तुरंत मास्टरजी को बुलाया और उन्हें कागज़ दिखाया।

मास्टरजी ने उसे सुरक्षित रख लिया।

“अब यह बात और गंभीर है,” उन्होंने कहा। “हमें इसकी सूचना देनी चाहिए।”

रंजीत ने डरते हुए सिर हिलाया।

उसे मालूम था कि आगे मुश्किलें आने वाली थीं, लेकिन इस बार उसने तय कर लिया था कि वह डरकर चुप नहीं रहेगा।
अगले दिन रंजीत मास्टरजी के साथ गाँव की ओर जा रहा था। रास्ता सुनसान था और दोनों ओर घने पेड़ थे।

अचानक आगे से तीन लड़कियाँ निकलकर रास्ते के बीच खड़ी हो गईं।

रंजीत के कदम रुक गए।

उनमें से एक ने कहा, “हमने तुम्हें समझाया था कि यह बात यहीं खत्म कर दो।”

रंजीत ने पीछे देखा। वहाँ भी दो लड़कियाँ खड़ी थीं।

अब उसे समझ आया कि उसे चारों तरफ़ से घेर लिया गया है।

मास्टरजी ने शांत स्वर में कहा, “रास्ता छोड़ दो। हमें जाने दो।”

कुछ क्षण तक कोई नहीं बोला।

फिर उनमें से एक लड़की ने आगे बढ़कर कहा, “तुमने शिकायत करने की हिम्मत कैसे की?”

रंजीत डर रहा था, लेकिन इस बार उसने नज़रें नहीं झुकाईं।

“क्योंकि जो हुआ, वह गलत था।”

लड़की कुछ कहने ही वाली थी कि दूर से किसी वाहन के आने की आवाज़ सुनाई दी।

सभी लड़कियाँ अचानक पीछे हट गईं।

रंजीत ने सड़क की ओर देखा। एक पुलिस जीप उनकी तरफ़ आ रही थी।

मास्टरजी ने धीरे से कहा, “अब तुम अकेले नहीं हो।”

जीप उनके पास आकर रुकी। अंदर से अधिकारी बाहर निकले और उन्होंने सबको अलग-अलग खड़े होने को कहा।

रंजीत ने गहरी साँस ली।

उसे पता था कि असली कहानी अब शुरू होने वाली थी—क्योंकि अब धमकियों और डर के बजाय, सच की जाँच होने वाली थी।
पुलिस के सामने पूरी घटना की जाँच शुरू हुई। रंजीत ने बिना कुछ छिपाए जो हुआ था, वह बता दिया। मास्टरजी ने भी उसके साथ हुई धमकियों और रास्ता रोकने की घटना के बारे में जानकारी दी।

जाँच के बाद उन लड़कियों के परिवारों और स्कूल प्रशासन को मामले की जानकारी दी गई। उन्हें समझाया गया कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध परेशान करना या धमकाना मज़ाक नहीं है।

कुछ दिनों बाद रंजीत उसी जंगल के रास्ते से फिर गुज़रा।

वही पेड़ थे। वही पगडंडी थी। लेकिन इस बार उसके कदमों में पहले जैसा डर नहीं था।

वह कुछ देर रुका और पीछे मुड़कर उस जगह को देखा जहाँ उसके साथ वह घटना हुई थी।

मास्टरजी ने पूछा, “पुरानी बात याद आ रही है?”

रंजीत ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “हाँ। लेकिन अब वह सिर्फ़ मेरी ज़िंदगी का एक बुरा दिन है। मेरी पूरी ज़िंदगी नहीं।”

दोनों आगे बढ़ गए।

रंजीत जानता था कि उस घटना को वह कभी पूरी तरह भूल नहीं पाएगा। लेकिन उसने यह भी सीख लिया था कि डर के कारण अपनी आवाज़ खो देना समाधान नहीं है।

उस दिन जंगल के उस रास्ते से गुजरते हुए उसने पहली बार महसूस किया कि वह उस घटना से भाग नहीं रहा था।

वह उससे आगे निकल चुका था।

समाप्त।

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