अध्याय 1: एक चिंगारी
शाम का सुनहरा प्रकाश रिया के बालों में खेल रहा था, जब वह अपने फ्लैट में पिहू के सामने बैठी हुई थी। उसके चेहरे पर एक शर्मीली, लेकिन गहरी खुशी थी।
"पिहू... मैं मानव से शादी करने वाली हूँ," रिया ने धीरे से कहा, आँखें नीची किए हुए।
एक पल की खामोशी। फिर जैसे बारूद में चिंगारी लग गई हो। पिहू का चेहरा तमतमा गया। उसकी आँखों में आग-सी लपक उठी।
"क्या? वही मानव? वो फीका-सा, चुपचाप रहने वाला लड़का? रिया, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?" पिहू का स्वर तीखा और कटु था। उसे लगा, जैसे उसकी एकमात्र सहेली, उसकी बंधुत्व की पहचान, किसी और के हाथों में चली जा रही है। उसकी दुनिया का एक टुकड़ा टूट रहा है।
"वह फीका नहीं है, पिहू। वह शांत है। कोमल है। उसकी मासूमियत... उसकी नेकनीयती मुझे अच्छी लगती है," रिया ने अपने विश्वास के साथ जवाब दिया, लेकिन आवाज़ में एक डर भी था – पिहू के गुस्से का डर।
"नेकनीयती? ये सब ढोंग होता है! मर्द सब एक जैसे होते हैं। वक्त आने पर अपना असली रंग दिखा देते हैं। तुम उसके पीछे अंधी हो रही हो, और मैं तुम्हें बचाने की कोशिश कर रही हूँ!" पिहू चिल्लाई।
यह पहली बहस नहीं थी, और न ही आखिरी। अगले कुछ हफ्तों में, जैसे-जैसे रिया मानव के साथ ज्यादा वक्त बिताने लगी, पिहू और रिया के बीच की दूरी बढ़ती गई। तीखे ताने, चुप्पियाँ, और फिर जोरदार झगड़े... दोस्ती के बंधन में दरारें पड़ने लगीं।
अध्याय 2: शांत तूफान
एक शाम, जब रिया और पिहू के बीच एक विशेष रूप से कड़वा विवाद हुआ था, मानव स्वयं पिहू के दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ। उसकी मुद्रा में कोई आक्रामकता नहीं थी, बस एक शांत दृढ़ता थी।
"पिहू, क्या मैं अंदर आ सकता हूँ? बस कुछ मिनटों के लिए," उसकी आवाज़ इतनी मृदु थी कि पिहू का गुस्सा भी एक पल के लिए ठहर गया। उसने दरवाज़ा खोला, आँखों में चुनौती भरी नज़र से देखते हुए।
शुरुआत में पिहू ने उसे घेरा। "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? तुम्हीं की वजह से रिया और मेरे बीच दूरियाँ आ रही हैं!"
मानव ने बिना किसी प्रतिक्रिया के उसकी बात सुनी। फिर धीरे से बोला, "मैं यहाँ तुमसे लड़ने नहीं आया हूँ, पिहू। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि मैं रिया से प्यार करता हूँ। और मैं यह भी जानता हूँ कि तुम उसकी सबसे अच्छी दोस्त हो। मैं उसकी जिंदगी से तुम्हें नहीं निकालना चाहता। बल्कि, मैं चाहता हूँ कि तुम हम दोनों की जिंदगी में बनी रहो।"
उसकी बातों में कोई झूठ नहीं था, कोई छल नहीं था। वह सीधा और ईमानदार था। पिहू का रोष धीरे-धीरे कम होने लगा। मानव ने रिया के साथ अपने पहले मुलाकात के किस्से सुनाए, उसकी हँसी के बारे में बताया, और यह भी कि कैसे पिहू का नाम रिया हर दूसरे वाक्य में लेती है। वह बोलता गया, अपने शांत, समझदार अंदाज़ में। और तब हुआ कुछ अप्रत्याशित।
पिहू के होंठों पर एक मुस्कान खेलने लगी। फिर वह मुस्कुराई। और फिर एक हल्की सी हँसी निकल पड़ी। मानव की सादगी और उसकी बेवकूफी भरी ईमानदारी इतनी संक्रामक थी कि पिहू का सारा गुस्सा भाप बनकर उड़ गया।
वह रिया की तरफ मुड़ी, जो एक कोने में चुपचाप खड़ी सब देख रही थी। पिहू की आँखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "वाह! क्या चॉइस है, रिया!"
सबको लगा, संघर्ष समाप्त हो गया। शांति लौट आई है। रिया राहत की साँस लेती है। मानव मुस्कुराता है। पिहू सबके साथ हँसती-बतियाती है।
लेकिन कोई नहीं जानता था कि पिहू के दिमाग के पिछले हिस्से में एक योजना धीरे-धीरे जन्म ले रही थी। उस मुस्कान के पीछे एक ठंडी, गणनापूर्ण चिंगारी सुलग रही थी। वह 'वाह' सिर्फ वाह नहीं था... वह एक शुरुआत थी।
अध्याय 3: विवाह और एक विचित्र रात
कुछ महीनों बाद, मानव और रिया का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ। सब कुछ परी कथा जैसा लग रहा था। शाम ढल चुकी थी, और दुल्हन का कमरा गुलाबी रोशनी और फूलों की खुशबू से भरा हुआ था।
रिया का दिल धड़क रहा था। वह अपने पति, अपने 'मानव' के आने का इंतज़ार कर रही थी। उसने एक आदर्श, प्यार भरी शादीशुदा जिंदगी के सपने देखे थे। वह दरवाज़े की आहट सुनकर मुस्कुरा उठी।
मानव अंदर आया। लेकिन वह मानव नहीं लग रहा था जिसे रिया जानती थी। उसके कदम झिझक भरे थे। उसकी नज़रें फर्श पर चिपकी हुई थीं। उसके हाथ काँप रहे थे। रिया के पास आकर, वह बिस्तर के किनारे बैठ गया, एक गहरी, कंपकंपी भरी साँस ली।
"रिया... मैं..." उसकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट थी।
रिया ने उसका हाथ थामा, "डरो मत, मानव। सब ठीक है।"
लेकिन जैसे-जैसे पल बीतते गए, मानव का व्यवहार और भी विचित्र होता गया। वह आत्मविश्वासहीन, अत्यंत संकोची और आज्ञाकारी व्यवहार करने लगा। वह एक पति की तरह नहीं, बल्कि एक डरे हुए बच्चे की तरह लग रहा था। रिया की उम्मीदें, उसके सपने, एक-एक करके चकनाचूर होते जा रहे थे। हैरानी और उलझन धीरे-धीरे गुस्से और गहरी निराशा में बदलने लगी।
"यह क्या है, मानव?" रिया की आवाज़ कर्कश हो गई, "तुम... तुम ऐसे क्यों हो? मैंने तो सोचा था..."
गुस्से के आवेग में, रिया ने अपनी हाथों से लाल चूड़ियाँ उतारीं और मानव की तरफ फेंक दीं। "ये लो! पहन लो इसे! तुम नामर्द निकले! अगर मुझे पता होता... मैं शादी ही नहीं करती!"
चूड़ियाँ मानव के सीने से टकराकर फर्श पर बिखर गईं। उसका चेहरा शर्म और दर्द से विकृत हो गया। एक आँसू उसकी आँख से फिसलकर गाल पर आ गिरा। बिना एक शब्द कहे, वह उठा और कमरे से बाहर चला गया।
रिया, सिसकियों और गुस्से के बीच फँसी, खिड़की से बाहर झाँककर देखती रही। मानव हॉल के सोफे पर जाकर लेट गया। उसके कंधे हल्के-हल्के हिल रहे थे। वह रो रहा था। और फिर, थकान और दुख के मारे, वहीं सो गया।
रिया का गुस्सा अचानक खत्म हो गया। उसकी जगह एक खालीपन ने ले ली। वह समझ नहीं पा रही थी। क्या हुआ? उसने क्या कर दिया? उसने फोन उठाया। एकमात्र व्यक्ति जिससे वह अब बात कर सकती थी – पिहू।
अध्याय 4: जहरबुझी योजना का जन्म
"पिहू... सब गड़बड़ हो गया," रिया ने फुसफुसाते हुए सारी बात बताई। उसकी आवाज़ में हताशा थी।
फोन के दूसरी तरफ एक लंबी खामोशी थी। ऐसी खामोशी जैसे पिहू को पहले से सब कुछ पता हो। फिर उसकी आवाज़ आई, ठंडी और गणनापूर्ण, एक सर्जन की तरह जो ऑपरेशन की योजना बना रहा हो।
"रिया, सुनो। गुस्सा करने से कुछ नहीं होगा। तुम्हें इस स्थिति का फायदा उठाना चाहिए।"
"फायदा? कैसा फायदा?" रिया हैरान थी।
"सोचो! यह साला नामर्द... अगर वह मर्द बनकर नहीं रह सकता, तो औरत बनकर रहेगा। वह तुम्हारी नौकरानी बनकर रह सकता है। उसकी प्रॉपर्टी, उसकी संपत्ति... सब तुम्हारे नाम। तुम उसे घर का काम करने वाली नौकरानी बनाकर रखो। और फिर... तुम दूसरी शादी कर लेना। कोई असली मर्द।"
यह विचार इतना अप्रत्याशित, इतना क्रूर, और इतना स्पष्ट था कि रिया के दिमाग में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर, धीरे-धीरे, एक अजीब सी राहत, एक विकृत संतुष्टि ने जगह ली। हाँ... शायद पिहू सही कह रही है। अगर वह पति नहीं बन सकता, तो कुछ और बन जाए।
"हाँ... हाँ, शायद तुम सही हो," रिया ने धीरे से कहा।
अध्याय 5: मीठा जहर
अगले कुछ दिनों तक रिया ने सामान्य व्यवहार किया। फिर, वह मानव के पास गई। उसकी आवाज़ में वही पुरानी मिठास लौट आई थी, लेकिन अब उसमें एक नकली चमक थी।
"मानव... मुझे माफ़ कर दो। मैंने उस रात... बहुत बुरा कह दिया। मैं गुस्से में थी," रिया ने उसका हाथ थामते हुए कहा।
मानव की आँखों में राहत की चमक दौड़ गई। "नहीं रिया... गलती मेरी थी। मैं तुम्हें निराश कर दिया। मैं कमज़ोर निकला। मुझे माफ़ कर दो।"
"सब ठीक है। सब भूल जाओ," रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, और उसे गले लगा लिया। मानव को लगा, बादल छंट गए हैं।
धीरे-धीरे, रिया ने अपना खेल शुरू किया। एक दिन हँसी-मज़ाक में, उसने अपनी एक रेशमी साड़ी निकाली और मानव के कंधों पर डाल दी। "वाह! तुम कितने सुंदर लग रहे हो! इसे पहनो ना!"
मानव हँस दिया। "अरे, यह क्या कर रही हो?"
"मज़ाक है, बेवकूफ! तुम तो मेरे पति हो, मेरी रानी नहीं," रिया ने कहा, और दोनों हँस पड़े।
लेकिन यह मज़ाक बार-बार दोहराया जाने लगा। दो-तीन दिन बाद, रिया ने गंभीर होकर पूछा, "याद है? शादी की रात, मैंने तुम्हें अपनी चूड़ियाँ पहनने को कहा था।"
मानव ने शर्म से सिर झुका लिया। "हाँ... याद है।"
"अगर मैं अभी कहूँ... तो पहनोगे? अगर तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो... तो पहनोगे?" रिया की आवाज़ में एक अजीब सी मिठास और दबाव था।
मानव ने एक पल के लिए सोचा। वह रिया को खुश करना चाहता था। उस दर्दनाक रात की याद दूर करना चाहता था। उसने हाँ में सिर हिला दिया। "हाँ, रिया। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।"
रिया की आँखों में जीत की एक चमक कौंध गई। उसने तुरंत अपनी चूड़ियाँ निकालीं और मानव के पतले हाथों में पहना दीं। फिर उसने अपनी दुपट्टा निकालकर उसके सिर पर ओढ़ दिया। मानव अजीब सा लग रहा था – एक दुबला-पतला लड़का, साड़ी और चूड़ियों में।
"मुस्कुराओ तो!" रिया ने कहा, और अपने फोन से एक तस्वीर खींच ली। उसने तुरंत तस्वीर पिहू को भेज दी।
कुछ ही सेकंड में पिहू का जवाब आ गया: "वाह रे! तूने तो अपने पति को औरत बना दिया! बेचारा चक्का! 😂"
रिया जोर से हँस पड़ी। मानव ने भी झिझकते हुए मुस्कुरा दिया, यह सोचकर कि यह सब एक मासूम मज़ाक है।
अध्याय 6: 'मानवी' का जन्म
योजना अब पूरी तरह से तैयार थी। एक दिन, रिया ने मानव को अपने कमरे में बुलाया। "चलो, आज कुछ अलग करते हैं। एक गेम खेलते हैं।"
मानव ने सहमति में सिर हिलाया। रिया ने एक गुलाबी रंग की साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट निकाला। फिर एक ब्रा और पैंटी। "इसे पहनो।"
"रिया, यह..." मानव हिचकिचाया।
"अरे, बस गेम है ना! मैं तुम्हारी पत्नी बनूँगी, और तुम मेरी पत्नी बनोगे। देखते हैं कैसा लगता है," रिया ने मीठी जबरदस्ती की।
धीरे-धीरे, मानव ने सब कुछ पहन लिया। रिया ने उस पर मेकअप किया – आँखों में काजल, होंठों पर लिपस्टिक। आखिरी टच के रूप में, उसने मानव के सिर पर एक लंबे बालों वाला विग लगा दिया।
शीशे के सामने खड़ा मानव अपनी ही परछाई को देखकर हैरान रह गया। वह एकदम स्त्री लग रहा था। पतला चेहरा, मेकअप, साड़ी... और वह विग। वह सुंदर लग रहा था। एक अजीब, भ्रम पैदा करने वाली सुंदरता।
ठीक उसी समय, दरवाज़े की घंटी बजी। पिहू अंदर आई। उसने 'मानवी' को देखा। एक पल के लिए उसकी आँखें चौंधिया गईं। फिर, वह जोर से हँसने लगी।
"बहुत खूब! बहुत खूब! नमस्ते, भाभी! कैसी हो आप?" पिहू ने मानव की तरफ मुड़कर कहा।
'भाभी' शब्द सुनकर मानव स्तब्ध रह गया। लेकिन पिहू ने सामान्य भाव से कहा, "अरे, आपने तो साड़ी पहनी है ना? तो फिर भाभी ही तो हुईं।" फिर वह रिया की तरफ मुड़ी, "हमारी भाभी का कोई नाम भी है कि नहीं?"
रिया की आँखों में एक शैतानी चमक थी। वह मानव के पास गई और उसका हाथ थाम लिया। "हाँ, नाम है। 'मानवी'। मेरी पत्नी, मानवी।" और वह जोर से हँस पड़ी। "ये है मेरी पत्नी, और मैं इनका पति।"
तीनों हँसने लगे। मानव भी, इस अजीब मज़ाक में शामिल होकर, झिझकते हुए हँस दिया। उसे लगा, यह सब एक हंसी-मज़ाक है। उसने 'मानवी' की भूमिका निभानी शुरू कर दी।
रिया ने 'पति' की तरह आदेश देना शुरू कर दिया। "मानवी, जरा चाय बना दो। किचन साफ कर दो।"
और मानव... नहीं, मानवी... वह सब करने लगा। साड़ी सँभालते हुए, चूड़ियाँ खनखनाते हुए। वह किचन में चाय बनाने लगा, यह सोचकर कि यह सब एक नाटक है, एक गेम है। उसे अहसास नहीं था कि यह नाटक धीरे-धीरे उसकी वास्तविकता बनता जा रहा है। और पिहू, एक कोने में बैठी, उस पूरे दृश्य को अपनी ठंडी, संतुष्ट आँखों से देख रही थी। उसकी योजना पहले चरण में सफल हो चुकी थी।
लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। 'मानवी' की कहानी अभी आगे बढ़नी थी... और पिहू की योजना का अगला चरण और भी गहरा, और भी अंधेरा होने वाला था।
(कहानी जारी रहेगी...)
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