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दोस्त की पत्नी

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In Progress | Part 6 of 6 | 0 Likes

Part 6

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राज के मन में सवाल उठा, “हमने तो यह सब एक मजबूरी में शुरू किया था, लेकिन अब इससे बाहर निकलना इतना आसान नहीं होगा।”
विद्या ने प्रमाण-पत्र की ओर देखा और उसके मन में भी वही दुविधा गहरी हो गई। परिवार की नजरों में वह पहले ही राज की पत्नी थी, और अब सरकारी रिकॉर्ड में भी उनका विवाह दर्ज हो चुका था।
जगमोहन को उनकी उलझन का अंदाज़ा नहीं था। वे खुशी से बोले, “अब तुम दोनों को अपने नए जीवन की शुरुआत करनी चाहिए।”
जब सुमित्रा को पता चला कि उसके भाई जगमोहन ने राज और विद्या का विवाह प्रमाण-पत्र भी बनवा दिया है, तो वह बहुत खुश हुईं।
उन्होंने प्रमाण-पत्र अपने हाथ में लेकर खुशी से कहा, “अब मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि मेरी बहू विद्या हमेशा के लिए हमारे परिवार का हिस्सा बन गई है।”
सुमित्रा ने विद्या को अपने पास बुलाया और प्यार से उसका हाथ पकड़ लिया। “बेटी, अब तुम्हें इस घर में किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है। तुम हमारे लिए सिर्फ बहू नहीं, हमारी बेटी हो।”
विद्या ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसके मन में हलचल मची हुई थी। सुमित्रा का इतना स्नेह देखकर उसे अपने छिपे हुए सच का बोझ और भारी महसूस होने लगा।
पास खड़ा राज भी अपनी माँ को देखकर चुप था। उसे एहसास हो रहा था कि जिस योजना को उसने एक छोटी-सी मदद के रूप में शुरू किया था, उसने पूरे परिवार की भावनाओं को अपने साथ जोड़ लिया था।
जैसे ही सुमित्रा ने विवाह प्रमाण-पत्र अपने हाथ में लिया, उनके चेहरे पर खुशी साफ झलक उठी। उन्होंने कागज़ को ध्यान से देखा और फिर खुशी से अपने भाई जगमोहन की ओर देखकर बोलीं, “भैया, आपने तो मेरा मन ही खुश कर दिया! अब मेरे बेटे की शादी पूरी तरह से पक्की हो गई है।”
उनकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने प्रमाण-पत्र को माथे से लगाया और फिर विद्या की ओर बढ़ीं।
“बेटी, इधर आओ।”
विद्या उनके पास आई तो सुमित्रा ने उसे गले लगा लिया। प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “अब तुम सिर्फ राज की पत्नी नहीं हो, तुम इस घर की बेटी हो। भगवान तुम्हारी और राज की जोड़ी हमेशा खुश रखे।”
सोनिया भी खुशी से उछलती हुई वहाँ आ गई। उसने हँसकर कहा, “माँ, अब तो मेरी भाभी कहीं नहीं जाने वाली!”
सुमित्रा हँस पड़ीं और बोलीं, “हाँ बेटी, अब हमारी विद्या इसी घर की है।”
घर में मौजूद रिश्तेदार भी मुस्कुराने लगे। किसी ने मिठाई का डिब्बा खोला तो किसी ने विद्या को बधाई दी। कुछ ही पलों में पूरा घर हँसी और खुशियों से भर गया।
विद्या सबके बीच मुस्कुराती रही, लेकिन सुमित्रा का उसे गले लगाना उसके दिल को भीतर तक छू गया। उसे लगा जैसे जिस रिश्ते की शुरुआत एक मजबूरी से हुई थी, वह अब इस परिवार के लिए सचमुच भावनाओं से जुड़ चुका था।
दूसरी ओर राज चुपचाप यह सब देख रहा था। माँ की खुशी देखकर उसके चेहरे पर भी मुस्कान आई
जैसे ही सुमित्रा ने विवाह प्रमाण-पत्र अपने हाथ में लिया, उनकी आँखें खुशी से चमक उठीं। उन्होंने कागज़ को दोबारा ध्यान से देखा, फिर अचानक अपने भाई जगमोहन की ओर देखकर दोनों हाथ जोड़ दिए।
“भैया, आपने आज मेरी सबसे बड़ी चिंता दूर कर दी। अब मेरा मन बिल्कुल निश्चिंत हो गया है।”
उनकी आवाज़ में खुशी साफ झलक रही थी। उन्होंने प्रमाण-पत्र को अपने सीने से लगा लिया और भावुक होकर बोलीं, “मेरे राज का घर बस गया… भगवान का लाख-लाख शुक्र है!”
इतना कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने जल्दी से आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए विद्या को अपने पास बुलाया।
“विद्या बेटी, इधर आओ।”
विद्या जैसे ही उनके पास पहुँची, सुमित्रा ने उसे दोनों हाथों से पकड़कर अपने गले से लगा लिया।
“तुम्हें पता है बेटी, जिस दिन से तुम इस घर में आई हो, मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे घर में फिर से रौनक लौट आई हो।”
विद्या चुप रही। सुमित्रा ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “अब यह मत सोचना कि तुम यहाँ अकेली हो। मैं तुम्हारी सास नहीं, तुम्हारी माँ हूँ। जब भी कोई परेशानी हो, सबसे पहले मेरे पास आना।”
पास खड़ी सोनिया खुशी से ताली बजाते हुए बोली, “माँ, अब तो भाभी सच में हमारी हो गईं!”
सुमित्रा हँस पड़ीं। उन्होंने सोनिया के सिर पर हल्की-सी चपत लगाते हुए कहा, “अरे शरारती! पहले अपनी भाभी को आराम तो करने दे।”
फिर उन्होंने राज की ओर देखा और मुस्कुराकर बोलीं, “राज, अब समझ आया कि शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं होती। दो परिवार भी जुड़ते हैं। अपनी पत्नी का हमेशा सम्मान करना और उसका साथ देना।”
राज ने सिर झुकाकर कहा, “जी माँ।”
सुमित्रा ने संतोष से सिर हिलाया। घर में मिठाई बाँटी जाने लगी और रिश्तेदार बधाइयाँ देने लगे। सोनिया विद्या का हाथ पकड़कर उसे सबके बीच ले गई।
विद्या मुस्कुराती रही, लेकिन सुमित्रा के शब्द उसके मन में गूँज रहे थे—“मैं तुम्हारी सास नहीं, तुम्हारी माँ हूँ।”

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