Kiran to kaamini

Kaminee6

  | August 28, 2025


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Part 6

राजश्री कई दिनों से बेचैन थी। किरण की इच्छा ने उसे झकझोर दिया था।
“क्या यह सिर्फ़ उसका मन है, या उसके शरीर में भी कोई बदलाव है?”
आख़िरकार, उसने किरण को लेकर एक मनोचिकित्सक (psychiatrist) से परामर्श लेने का निर्णय लिया।

जाँच-पड़ताल और बातचीत के बाद डॉक्टर ने धीरे से कहा –
“आपका बेटा… नहीं, आपका बच्चा, लगभग 75% महिला हार्मोन लिए हुए है। यानी उसके अंदर स्त्रीत्व सिर्फ़ मानसिक नहीं, शारीरिक रूप से भी गहरा है। यह कोई बीमारी नहीं है, यह उसकी असली पहचान है।”

राजश्री के कानों में यह शब्द गूंजते रहे। बाहर निकलकर वह लंबे समय तक चुप रही। उसके मन में डर भी था, समाज की चिंता भी… पर साथ ही एक गहरी करुणा भी।
“मेरा किरण… उसे कितनी मुश्किलें झेलनी होंगी। यह रास्ता कठिन है। पर अगर मैं ही उसके साथ न रही तो वह अकेला पड़ जाएगा।”

उस रात उसने किरण को पास बुलाया।
“किरण,” उसने आँखों में आँसू लिए कहा, “मुझे अब सब समझ में आ रहा है। तेरे लिए ज़िंदगी आसान नहीं होगी… लेकिन मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी। अगर तू लड़की बनकर जीना चाहता है, तो मैं तेरे साथ रहूँगी।”

किरण की आँखें भर आईं। उसने माँ को कसकर गले लगा लिया।
“माँ, तुमने मुझे स्वीकार किया… मुझे अब डर नहीं लगता।”

दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उस पल माँ-बेटे का रिश्ता बदलकर माँ-बेटी के गहरे बंधन में ढल गया।

Part 7

किरण को गले लगाने के बाद भी राजश्री का मन शांत नहीं हुआ। वह जानती थी कि यह राह आसान नहीं है।
एक रात उसने किरण को अपने पास बैठाया और गंभीर स्वर में कहा –

“किरण, सुन बेटा… या शायद कहना चाहिए मेरी बेटी… दुनिया इतनी सरल नहीं है। लोग तुझे वैसे स्वीकार करेंगे या नहीं, ये कोई नहीं जानता। तानों, अपमान, हंसी उड़ाने जैसी बातें तुझे सुननी पड़ सकती हैं। मुझे डर है, पर मैं तुझे सच बताना चाहती हूँ।”

किरण ने माँ की ओर देखा। उसकी आँखों में हल्का डर था, लेकिन साथ ही दृढ़ता भी।
“माँ, मुझे पता है यह कठिन है… लेकिन यही मेरी सच्चाई है।”

राजश्री ने गहरी सांस ली।
“ठीक है। अगर तू वाकई यह जीवन चुनना चाहती है, तो मुझे तुझे परखना होगा। आधे-अधूरे फैसले से कुछ नहीं होगा। अगर तू लड़की की तरह जीना चाहती है, तो शुरुआत यहीं से होगी। अपने बाल बढ़ाना शुरू कर। और अब से घर के भीतर तू सिर्फ़ बेटी की तरह ही रहेगी — कपड़ों में, तौर-तरीके में, हर चीज़ में। अगर तू यह निभा पाई, तो मैं तेरा साथ दूँगी चाहे दुनिया कुछ भी कहे।”

किरण ने माँ का हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।
“हाँ माँ, मैं तैयार हूँ।”

उस पल से घर के भीतर नई यात्रा शुरू हुई — अब यह केवल खेल या शौक़ नहीं था, बल्कि पहचान की दिशा में पहला गंभीर कदम।


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