कमरे में गहरी चुप्पी छा गई थी। घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। राजश्री और किरण दोनों मौन थे।
राजश्री ने धीरे से कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा,
“किरण, बेटा… मैं तुझसे नाराज़ नहीं हूँ। लेकिन मुझे सच्चाई जाननी है। तू ये सब क्यों करता है?”
किरण के गले में जैसे शब्द अटक गए। कुछ देर वह काँपती आवाज़ में बोला,
“माँ… मुझे हमेशा से औरतों के कपड़े देखने में खिंचाव लगता है। जब मैं आपकी साड़ी छूता हूँ या पहनता हूँ… तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि मैं पूरा हूँ… मैं असली मैं हूँ।”
राजश्री ध्यान से सुन रही थी। उसका चेहरा गंभीर था, लेकिन आँखों में कोमलता थी।
“तो ये सिर्फ़ खेल नहीं है, है न?” उसने धीरे से पूछा।
किरण ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“नहीं माँ। ये मेरा शौक़… मेरा पैशन है। मैं इससे भाग नहीं सकता। जब मैं साड़ी या सलवार पहनता हूँ तो मुझे अपने अंदर शांति मिलती है।”
राजश्री ने गहरी सांस ली। उसके मन में सवाल भी थे, चिंता भी। लेकिन उसने महसूस किया कि यह उसके बेटे का सच है।
वह पास आई और बोली,
“किरण, अगर ये तेरा पैशन है… तो मुझे तेरी बात सुननी और समझनी होगी। तू मेरा बेटा है, और मैं तुझे कभी खोना नहीं चाहती।”
किरण की आँखों में राहत की चमक आ गई। पहली बार उसने अपना राज़ पूरी तरह माँ से साझा कर दिया था
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