राजश्री कई दिनों से बेचैन थी। किरण की इच्छा ने उसे झकझोर दिया था।
“क्या यह सिर्फ़ उसका मन है, या उसके शरीर में भी कोई बदलाव है?”
आख़िरकार, उसने किरण को लेकर एक मनोचिकित्सक (psychiatrist) से परामर्श लेने का निर्णय लिया।
जाँच-पड़ताल और बातचीत के बाद डॉक्टर ने धीरे से कहा –
“आपका बेटा… नहीं, आपका बच्चा, लगभग 75% महिला हार्मोन लिए हुए है। यानी उसके अंदर स्त्रीत्व सिर्फ़ मानसिक नहीं, शारीरिक रूप से भी गहरा है। यह कोई बीमारी नहीं है, यह उसकी असली पहचान है।”
राजश्री के कानों में यह शब्द गूंजते रहे। बाहर निकलकर वह लंबे समय तक चुप रही। उसके मन में डर भी था, समाज की चिंता भी… पर साथ ही एक गहरी करुणा भी।
“मेरा किरण… उसे कितनी मुश्किलें झेलनी होंगी। यह रास्ता कठिन है। पर अगर मैं ही उसके साथ न रही तो वह अकेला पड़ जाएगा।”
उस रात उसने किरण को पास बुलाया।
“किरण,” उसने आँखों में आँसू लिए कहा, “मुझे अब सब समझ में आ रहा है। तेरे लिए ज़िंदगी आसान नहीं होगी… लेकिन मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी। अगर तू लड़की बनकर जीना चाहता है, तो मैं तेरे साथ रहूँगी।”
किरण की आँखें भर आईं। उसने माँ को कसकर गले लगा लिया।
“माँ, तुमने मुझे स्वीकार किया… मुझे अब डर नहीं लगता।”
दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उस पल माँ-बेटे का रिश्ता बदलकर माँ-बेटी के गहरे बंधन में ढल गया।