रेशमी साड़ी का राज़
किरण पन्द्रह साल का था। माँ-बाप के तलाक़ के बाद उसका घर सूना और चुप-चाप हो गया था। माँ, राजश्री, ने नौकरी करना शुरू कर दिया ताकि घर का खर्च चल सके। सुबह जल्दी वह ऑफिस निकल जाती और देर शाम थकी-हारी लौटती।
खाली घर में अकेला रहते हुए किरण की नज़र अक्सर माँ की आलमारी पर पड़ती। उसमें रंग-बिरंगी साड़ियाँ सजी रहतीं – लाल, हरी, सुनहरी, बैंगनी। रेशम की मुलायम चमक उसे खींचती। पहले तो वह सिर्फ़ हाथ लगाकर देखता, फिर धीरे-धीरे इच्छा बढ़ने लगी।
एक दिन उसने हिम्मत करके माँ की साड़ी पहन ली। आईने में जब उसने खुद को देखा तो उसे एक अजीब-सी शांति मिली। मानो वह असली "खुद" से मिल रहा हो। यह उसका छोटा-सा राज़ बन गया। जब-जब माँ घर पर नहीं होती, वह साड़ी पहन कर आईने के सामने खड़ा हो जाता।
लेकिन एक दिन राज़ टूट गया।
राजश्री को दफ़्तर से जल्दी छुट्टी मिल गई। दरवाज़ा खोला तो कमरे से चूड़ियों की हल्की खनक सुनाई दी। वह भीतर गई और अचानक ठिठक गई।
उसके सामने किरण खड़ा था – नीली साड़ी में, आँखों में काजल, चेहरे पर डर और शर्म।
किरण घबरा गया, "म-माँ… मैं माफ़ी चाहता हूँ…" उसकी आँखों में आँसू आ गए।
राजश्री कुछ पल चुप रही। उसके मन में आश्चर्य और चिंता थी, पर बेटे की आँखों में उसने दर्द भी देखा।
धीरे से बोली, "किरण… यह तुम मुझसे छुपाते क्यों रहे?"
किरण ने सिर झुका लिया। "मुझे अच्छा लगता है माँ… लेकिन मुझे डर था कि आप मुझसे नफ़रत करने लगेंगी।"
राजश्री का दिल पिघल गया। उसने उसके गाल पर हाथ रखा, "बेटा, मैं तुमसे नफ़रत कैसे कर सकती हूँ? तुम मेरे हो… बस तुम्हारी यह चाहत मुझे समझनी होगी।"
किरण की आँखों से राहत के आँसू बह निकले। माँ ने उसे गले से लगा लिया।
उस दिन माँ-बेटे के बीच एक नया रिश्ता बना – भरोसे और स्वीकार का।
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