किरण को गले लगाने के बाद भी राजश्री का मन शांत नहीं हुआ। वह जानती थी कि यह राह आसान नहीं है।
एक रात उसने किरण को अपने पास बैठाया और गंभीर स्वर में कहा –
“किरण, सुन बेटा… या शायद कहना चाहिए मेरी बेटी… दुनिया इतनी सरल नहीं है। लोग तुझे वैसे स्वीकार करेंगे या नहीं, ये कोई नहीं जानता। तानों, अपमान, हंसी उड़ाने जैसी बातें तुझे सुननी पड़ सकती हैं। मुझे डर है, पर मैं तुझे सच बताना चाहती हूँ।”
किरण ने माँ की ओर देखा। उसकी आँखों में हल्का डर था, लेकिन साथ ही दृढ़ता भी।
“माँ, मुझे पता है यह कठिन है… लेकिन यही मेरी सच्चाई है।”
राजश्री ने गहरी सांस ली।
“ठीक है। अगर तू वाकई यह जीवन चुनना चाहती है, तो मुझे तुझे परखना होगा। आधे-अधूरे फैसले से कुछ नहीं होगा। अगर तू लड़की की तरह जीना चाहती है, तो शुरुआत यहीं से होगी। अपने बाल बढ़ाना शुरू कर। और अब से घर के भीतर तू सिर्फ़ बेटी की तरह ही रहेगी — कपड़ों में, तौर-तरीके में, हर चीज़ में। अगर तू यह निभा पाई, तो मैं तेरा साथ दूँगी चाहे दुनिया कुछ भी कहे।”
किरण ने माँ का हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।
“हाँ माँ, मैं तैयार हूँ।”
उस पल से घर के भीतर नई यात्रा शुरू हुई — अब यह केवल खेल या शौक़ नहीं था, बल्कि पहचान की दिशा में पहला गंभीर कदम।
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