शांति देवी का अंगूठा ‘कॉल’ बटन पर जा ही रहा था कि रिया ने एकदम से छींक मार दी—बड़ी जोरदार छींक, जैसे जानबूझकर। “अरे माँ जी… अचानक सर्दी लग गई!” रिया ने नाक रगड़ते हुए कहा और तेजी से आगे बढ़कर शांति देवी का हाथ पकड़ लिया। “अभी राकेश भैया ऑफिस में होंगे न? शाम के छह बज गए हैं। बाद में कॉल कर लीजिए ना। पहले आप थोड़ी देर आराम कर लें, थक गई होंगी रास्ते भर।” शांति देवी ने भौंहें चढ़ाईं। “थकना क्या, बेटा? मैं तो फिट हूँ। और राकेश की तो अभी छुट्टी का समय है। एक बार बात हो जाए तो…” सागर (अमिता) ने तुरंत पल्लू को चेहरे पर और खींच लिया और बहुत शर्मीली आवाज़ में बोला, “माँ जी… मैं… मैं अभी शादी के बारे में नहीं सोच रही। मेरी उम्र अभी छोटी है और… और मेरी नौकरी भी नई-नई है। प्लीज़…” शांति देवी मुस्कुराईं। “अरे बिटिया, उम्र छोटी नहीं होती सुंदर लड़कियों की। और राकेश भी तुम्हारी ही उम्र का है—तेईस-चौबीस का। बैंक में अच्छी पोस्ट है, अपना मकान है। तुम जैसी संस्कारी बहू मिल जाए तो घर की लक्ष्मी बन जाएगी।” रिया ने आँखों से सागर को इशारा किया—‘कुछ करो!’ सागर ने गहरी साँस ली। कॉलेज ड्रामा वाला दिमाग तेजी से काम करने लगा। उसने धीरे से कहा, “माँ जी… असल में… मेरी शादी की बात मेरे गाँव में पहले से चल रही है। मेरे पिताजी ने किसी से बात कर रखी है। मैं अभी कुछ नहीं कह सकती।” शांति देवी का चेहरा थोड़ा उतर गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। “अरे, बात चल रही हो तो क्या हुआ? जब तक रिश्ता पक्का नहीं होता, कुछ भी हो सकता है। ज़रा राकेश से बात तो कर लो। अगर तुम्हें पसंद आए तो मैं तुम्हारे घर वालों से बात करवा दूँगी।” इतने में फोन की घंटी बज उठी। शांति देवी ने स्क्रीन देखा और खुश होकर बोलीं, “अरे देखो! राकेश खुद कॉल कर रहा है। बोला था शाम को कॉल करूँगा।” सागर का दिल धड़कने लगा। रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। शांति देवी ने वीडियो कॉल रिसीव कर लिया। स्क्रीन पर एक साफ-सुथरा, साधारण दिखने वाला युवक दिखाई दिया—राकेश। शर्ट-पेंट में, बाल साइड में कंघी किए हुए। “नमस्ते बुआ जी,” राकेश ने कहा। “राकेश बेटा! सुनो, आज मैं रिया के पास हूँ। उसकी रूममेट अमिता से तुम्हारी मुलाकात करवाती हूँ। बहुत सुशील और सुंदर लड़की है। ज़रा बात कर लो दोनों।” शांति देवी ने फोन घुमाया और कैमरा सीधा सागर की तरफ कर दिया। सागर ने पल्लू को माथे तक खींच रखा था। उसने आँखें झुकाईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोला, “नमस्ते…” राकेश कुछ सेकंड तक चुप रहा। फिर बोला, “नमस्ते… अमिता जी। आप… आप बहुत अच्छी लग रही हैं।” सागर के गाल लाल हो गए—असली शरमाहट नहीं, घबराहट की। उसने और आवाज़ दबाकर कहा, “धन्यवाद… आप भी…” राकेश मुस्कुराया। “आप कहाँ की हैं? और क्या करती हैं?” सागर ने झट से जवाब दिया, “मैं… टीचर हूँ। प्राइमरी स्कूल में। गाँव… यानी लखनऊ के पास के एक छोटे से कस्बे से हूँ।” बातचीत कुछ मिनट चली। राकेश शालीन था, सवाल भी सामान्य ही पूछ रहा था। शांति देवी बीच-बीच में टोक रही थीं, “बेटा, तुम दोनों अच्छे लग रहे हो एक साथ।” अचानक राकेश ने कहा, “बुआ जी, अगर अमिता जी को कोई आपत्ति न हो तो… क्या मैं कल या परसों उनसे मिल सकता हूँ? ऑफिस के बाद?” सागर की साँसें अटक गईं। रिया ने पीछे से उसकी कमर में कोहनी मारी। सागर ने जल्दी से कहा, “जी… मैं… मैं अभी सोचूँगी। मेरी… मेरी कक्षाएँ बहुत व्यस्त हैं।” शांति देवी ने फोन वापस ले लिया। “ठीक है बेटा, बाद में बात करते हैं। तुम आराम करो।” कॉल कट हो गई। जैसे ही फोन रखा, सागर ने रिया की तरफ गुस्से भरी आँखों से देखा। रिया ने दोनों हाथ जोड़ लिए। शांति देवी संतुष्ट होकर बोलीं, “अच्छा हुआ बात हो गई। राकेश को लड़की पसंद आ गई लगती है। अब देखती हूँ आगे क्या होता है।” सागर ने मन ही मन सोचा—‘अब आगे क्या होगा, यही सबसे बड़ा सवाल है।’ रात के खाने के समय शांति देवी ने फिर से वही बात दोहराई। सागर ने मुश्किल से मुस्कान बनाए रखी। खाना खत्म होने के बाद शांति देवी कमरे में आराम करने चली गईं। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, रिया ने सागर का हाथ पकड़ लिया। “सागर जी… माफ़ कीजिए। मैंने सोचा नहीं था कि मामला यहाँ तक पहुँच जाएगा।” सागर ने पल्लू फेंक दिया और अपनी असली भारी आवाज़ में फुसफुसाया, “रिया, तुम्हारी सास मुझे अपने भतीजे से ब्याहने वाली हैं! मैं सुबह तक कैसे निभाऊँगा ये सब?” रिया ने सिर पकड़ लिया। “कल सुबह वो चली जाएँगी। बस रात कट जाए। आप कमरे में सो जाइए, मैं सोफे पर। और अगर कुछ पूछें तो कह देना कि आपको सिरदर्द है।” सागर आईने के सामने गया। साड़ी में बँधा हुआ अपना रूप देखकर उसने सिर हिलाया। “स्वाति को पता चला तो वो हँसी-हँसी कर मर जाएगी।” रात गहराने लगी। शांति देवी सो चुकी थीं। रिया और सागर ड्राइंग रूम में बैठे फुसफुसा रहे थे। तभी अचानक शांति देवी का दरवाज़ा खुला। “अमिता बिटिया…” उनकी आवाज़ आई। “मुझे पानी चाहिए। और साथ में ज़रा बैठ जाओ, मन नहीं लग रहा अकेले।” सागर ने आँखें बंद कीं। रिया ने फुसफुसाया, “जाओ… और आवाज़ याद रखना।” सागर ने पल्लू फिर से ठीक किया, आवाज़ पतली की और कमरे की तरफ बढ़ा। दरवाज़े पर पहुँचकर उसने धीरे से कहा, “जी माँ जी… पानी लाई।” शांति देवी बिस्तर पर बैठी थीं। उन्होंने सागर को पास बुलाया। “बिटिया, तुम सच में बहुत अच्छी हो। रिया को भी तुम्हारी तरह थोड़ी संस्कार सिखा दो। और… राकेश की बात सोचना। वो अच्छा लड़का है।” सागर ने पानी का गिलास पकड़ाया और सिर झुकाए खड़ा रहा। शांति देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया। “तुम्हारे हाथ कितने कोमल हैं… बिल्कुल राजकुमारी जैसे।” सागर की कमर में पसीना छूट गया।
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