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अन्धकार

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Part 12

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पूर्णिमा की रात आखिरकार आ गई।

लेकिन इस बार “अन्धकार” थिएटर जाने के बजाय आर्या और राज ने एक नया रास्ता चुना था।

उन्होंने तय किया कि वे अपने अतीत के रहस्य में नहीं, बल्कि अपने भविष्य में कदम रखेंगे।

विवाह का दिन आया।

मंडप फूलों से सजा था। आर्या दुल्हन के रूप में बेहद सुंदर लग रही थी। उसके चेहरे पर खुशी के साथ एक अजीब-सी शांति थी—मानो उसकी वर्षों पुरानी तलाश आज पूरी हो गई हो।

राज ने उसे मंडप में आते देखा तो कुछ क्षण के लिए उसकी नजरें उसी पर ठहर गईं।

आर्या मुस्कुराई।

राज ने धीमे से कहा,

“आज तुम्हें देखकर लगता है कि अन्धकार ने तुम्हें मुझसे दूर करने के बजाय मेरी जिंदगी तक पहुँचा दिया।”

आर्या ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

“और मुझे लगता है कि मेरी कहानी चाहे जहाँ से शुरू हुई हो, उसका सबसे सुंदर हिस्सा आज से शुरू हो रहा है।”

विवाह की रस्में शुरू हुईं।

आर्या के पास उसका भाई सोनू खड़ा था।

पंडित ने कन्यादान की रस्म के लिए परिवार के सदस्य को आगे आने के लिए कहा।

सोनू आगे बढ़ा।

उसकी आँखों में खुशी और भावुकता दोनों थीं।

उसने आर्या का हाथ राज के हाथ में रखते हुए कहा—

“पिछले जन्म में मैं तुम्हारा दोस्त था। इस जन्म में भगवान ने मुझे तुम्हारा भाई बनाया। आज मैं अपनी बहन का हाथ राज को सौंप रहा हूँ।”

आर्या की आँखों से आँसू बह निकले।

सोनू ने आगे कहा—

“लेकिन यह सिर्फ एक रस्म नहीं है। राज, मेरी बहन को हमेशा सम्मान, विश्वास और साथ देना। और आर्या, तुम भी याद रखना—तुम्हारा भाई हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा।”

राज ने सिर झुकाकर कहा,

“मैं वादा करता हूँ।”

आर्या ने सोनू का हाथ पकड़ लिया।

“तुमने मुझे इस जन्म में भाई बनकर पाया है। इससे बड़ा उपहार मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता।”

सोनू मुस्कुराया।

विवाह की रस्में पूरी हुईं।

राज और आर्या ने एक-दूसरे का हाथ थामकर सात फेरे लिए।

हर फेरे के साथ जैसे अतीत का एक रहस्य पीछे छूटता गया।

आखिरी फेरे के बाद आर्या ने राज की ओर देखा।

अब न सागर का भ्रम था, न अन्धकार का डर और न पिछले जन्म का अधूरापन।

उसके सामने केवल उसका वर्तमान था।

आर्या।

राज का हाथ।

और उनका नया जीवन।

विवाह के बाद सोनू ने वह पुरानी तस्वीर आर्या को दी।

आर्या ने तस्वीर देखी।

जो तस्वीर कभी रहस्य थी, अब उसमें कोई अजनबी भविष्य नहीं था।

तस्वीर के पीछे लिखा अंतिम वाक्य भी बदल चुका था—

“अन्धकार समाप्त। कहानी पूर्ण।”

आर्या ने तस्वीर को मुस्कुराते हुए बंद कर दिया।

राज ने पूछा,

“अब इसे कहाँ रखोगी?”

आर्या ने कहा,

“वहीं, जहाँ इसे होना चाहिए।”

उसने तस्वीर को एक पुराने संदूक में रख दिया।

फिर राज का हाथ थाम लिया।

सोनू उनके पास आकर खड़ा हो गया।

तीनों ने एक-दूसरे को देखा।

सागर के रूप में शुरू हुई यात्रा आर्या के रूप में पूरी हुई थी।

पुराने जन्म का मित्र सोनू इस जन्म में उसका भाई बनकर उसके साथ खड़ा था।

और राज—जो पूरी यात्रा में उसके साथ रहा—अब उसका जीवनसाथी था।

दूर कहीं “अन्धकार” थिएटर की आखिरी रोशनी बुझ गई।

और इस बार सचमुच कहानी समाप्त हो गई।

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