राजश्री को शुरू में लगा था कि यह सिर्फ़ किरण का एक शौक़ है, एक तरह का आकर्षण। लेकिन समय बीतने के साथ उसने कुछ और ही देखा।
जब भी किरण स्त्री-वस्त्र पहनता, उसकी आँखों में चमक आ जाती। जो लड़का हमेशा चुप-चुप और संकोची रहता था, वही साड़ी या सलवार पहनते ही हँसमुख और चंचल बन जाता। उसकी चाल, उसकी बातें, सब बदल जाते। मानो उसके भीतर सोई हुई कोई नई पहचान जाग उठी हो।
राजश्री हैरान होकर उसे देखती रहती।
“ये सिर्फ़ कपड़ों का मामला नहीं है… कपड़े पहनते ही मेरा बेटा बदल क्यों जाता है? क्यों उसकी उदासी मिट जाती है और वह एक खिलखिलाती लड़की बन जाता है?”
धीरे-धीरे राजश्री के मन में भी बदलाव आने लगा। उसने हमेशा एक बेटी की चाह रखी थी, लेकिन किस्मत ने उसे बेटा दिया। अब जब वह किरण को लड़की के रूप में देखती, तो उसे अपनी खोई हुई इच्छा पूरी होती सी लगती।
वह कभी अनजाने में किरण को “बेटी” की तरह बुला देती, कभी उसे चुनरी ठीक करके देती, कभी उसकी चोटी गूँथ देती। पहले जो भ्रम और उलझन थी, उसकी जगह धीरे-धीरे एक स्वीकृति ने ले ली।
राजश्री सोचती, “शायद भगवान ने मुझे बेटी नहीं दी… लेकिन शायद मेरी बेटी मेरे बेटे के अंदर ही छुपी थी।”
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